प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
भारत को 2047 तक विकसित भारत बनाने के लिए हमारे बड़े शहरों को असाधारण रूप से तेज वृद्धि हासिल करनी होगी। परंतु जिन सरकारों को इस वृद्धि को आगे बढ़ाना है उनके पास सीमित वित्तीय गुंजाइश है। कई राज्यों में अधिकांश राजस्व प्राप्तियां वेतन, पेंशन, सब्सिडी और ब्याज आदि में खर्च हो जाती हैं और राजकोषीय जिम्मेदारी की सीमाएं अतिरिक्त निवेश के लिए बहुत कम जगह छोड़ती हैं। वास्तविक समस्या ढांचागत है।
वार्षिक बजट उन निवेशों के लिए उपयुक्त नहीं हैं जो दशकों तक चलते हैं। बंदरगाह, औद्योगिक पार्क, विश्वविद्यालय, सिंचाई परियोजनाएं और ऊर्जा प्रणालियां आदि ऐसे निवेश हैं जिन्हें 20 या 30 वर्षों तक धैर्यपूर्ण पूंजी की आवश्यकता होती है। इन्हें राज्य स्तर पर संचालित होने वाले दीर्घकालिक वित्तीय साधनों में रखा जाना चाहिए जो राज्य की प्राथमिकताओं के अनुरूप हों।
खुशकिस्मती से इन्हीं राज्य सरकारों के पास परिसंपत्तियों की कोई कमी नहीं। उनके पास बहुत बड़ी मात्रा में शहरी जमीन, औद्योगिक क्षेत्र, खनिज अधिकार और कई सरकारी उपक्रमों में हिस्सेदारी होती है जिसके बदले उन्हें नाम मात्र का रिटर्न मिलता है। आगे की राह यही है कि इन सुप्त पड़ी परिसंपत्तियों को दीर्घकालिक वित्तीय क्षमताओं में बदला जा सके। इस प्रक्रिया में तीन तरह के पेशेवर प्रबंधन वाले संस्थान की आवश्यकता होगी: पहला एक परिसंपत्ति प्रबंधन एजेंसी, दूसरा एक स्थायी निधि और एक राज्य निवेश कोष।
पहली संस्था एक वैधानिक परिसंपत्ति प्रबंध एजेंसी होगी। यह राज्य की परिसंपत्तियों का पूरा जियो-टैग्ड रजिस्टर तैयार करेगी जिसमें स्वामित्व, वर्तमान उपयोग और स्वतंत्र रूप से आंकी गई मूल्य सीमा दर्ज होगी। यह लंबी अवधि के पट्टों, पुनर्विकास रियायतों, संयुक्त उपक्रमों, भूमि मूल्य कैप्चर, अचल संपत्ति निवेश न्यास (रीट्स) और अधोसंरचना निवेश न्यास (इनविट्स) के माध्यम से पूंजी जुटाएगी। गैर-रणनीतिक परिसंपत्तियों की सीधी बिक्री केवल खुले ई-नीलामी के जरिये की जाएगी।
मूल्य कहां से आएगा? सरकारी भूमि का लेनदेन भारी छूट पर होता है क्योंकि स्वामित्व अस्पष्ट होता है, कागजात अधूरे होते हैं, उनकी जोनिंग प्रतिबंधात्मक होती है और भूखंड कम मूल्य वाले उपयोगों में फंसे रहते हैं। एजेंसी इन खामियों को दूर करके मूल्य पैदा करती है। साफ, मुकदमों से मुक्त स्वामित्व वास्तविक कीमतें बढ़ाता है। उपयोग में बदलाव और अधिक फ्लोर स्पेस अधिकार निष्क्रिय भूमि को निर्माण योग्य क्षमता में बदल देते हैं।
नई मेट्रो लाइनें, राजमार्ग और कॉरिडोर राज्य-स्वामित्व वाली आसपास की भूमि का मूल्य कई गुना बढ़ा देते हैं। इसके अलावा राज्य उपक्रमों को पेशेवर बनाया जा सकता है, सूचीबद्ध किया जा सकता है या विलय किया जा सकता है, जिससे मृत इक्विटी (ऐसी हिस्सेदारी जिसका कोई आर्थिक मूल्य नहीं मिल रहा हो) को लाभांश देने वाले शेयरों में बदला जा सकता है।
इस तरह सृजित धन को दूसरी संस्था यानी राज्य की स्थायी निधि (एंडोमेंट) में जाना चाहिए जिसे राज्य कानून में लिखे गए विशिष्ट नियमों द्वारा संचालित किया जाएगा। सभी शुद्ध मुद्रीकरण आय राज्य के समेकित कोष में जमा की जाएगी और फिर एंडोमेंट में स्थानांतरित की जाएगी। प्रत्येक वर्ष एंडोमेंट अपने पंचवर्षीय औसत मूल्य का अधिकतम 3 फीसदी वितरित कर सकता है जिससे कोष वास्तविक रूप में सुरक्षित रहे। कोष को धीरे-धीरे भूमि से हटाकर एक विविधीकृत पोर्टफोलियो में स्थानांतरित किया जाएगा जिसे निश्चित अवधि पर पेशेवरों द्वारा प्रबंधित किया जाएगा।
इस बारे में वैश्विक अनुभवों से सीखा जा सकता है। नॉर्वे ने पेट्रोलियम राजस्व को अपने सॉवरिन फंड में स्थानांतरित किया और निकासी को लगभग 3 फीसदी वार्षिक वास्तविक रिटर्न से मार्गदर्शित किया। अब यह फंड 2 लाख करोड़ डॉलर से अधिक है। टेक्सस ने भूमि अनुदानों के माध्यम से अपने पर्मानेंट यूनिवर्सिटी फंड की स्थापना की।
इसकी 21 लाख एकड़ भूमि आज भी यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सस और टेक्सस एऐंडएम यूनिवर्सिटी सिस्टम को वित्तपोषित करती है। सिंगापुर ने 1974 में राज्य उपक्रमों में अपनी हिस्सेदारी टेमासेक को हस्तांतरित की और पेशेवर प्रबंधकों को उस पूंजी को बढ़ाकर 518 अरब डॉलर के पोर्टफोलियो में बदलने दिया।
चीन की कहानी में जरूर चेतावनी छिपी है। स्थानीय सरकारों ने भूमि उपयोग अधिकार बेचकर अपने शहरों को वित्तपोषित किया जिसकी प्राप्तियां 2021 में लगभग 8.5 लाख करोड़ युआन तक पहुंच गईं। वे संसाधन के रूप में इन प्राप्तियों पर बार-बार निर्भर हो गए और अपेक्षित भूमि मूल्यों के बदले भारी उधार लिया। जब संपत्ति बाजार गिरा तो वे ऋण के बोझ से दबे और बिना एंडोमेंट के रह गए। हमारे राज्यों को चीन की तरह मुद्रीकरण करना चाहिए और नॉर्वे की तरह बचत करनी चाहिए।
भारत में केरल जरूरी मानक पेश करता है। केरल अधोसंरचना निवेश फंड बोर्ड (केआईआईएफबी) ने 88,000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की 1,149 परियोजनाओं को मंजूरी दी है और 2019 में भारत का पहला सब-सॉवरिन मसाला बॉन्ड जारी किया जिससे 2,150 करोड़ रुपये लंदन स्टॉक एक्सचेंज पर जुटाए गए और 2024 में पूरी तरह चुका दिए गए। हालांकि केआईआईएफबी की उधारियां एस्क्रो मोटर वाहन कर और ईंधन उपकर से चुकाई गईं इसलिए सीएजी ने उन्हें बजट से इतर उधारी माना। अब केरल ने उन राजस्वों को कोषागार में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव रखा है।
राज्य की एंडोमेंट निधि को राज्य-स्तरीय राष्ट्रीय निवेश एवं अधोसंरचना कोष (एनआईआईएफ) में निवेश करना चाहिए जिसे राष्ट्रीय एनआईआईएफ की तरह ही संचालित किया जाए। भारत सरकार निवेश प्रबंधक की 49 फीसदी हिस्सेदारी रखती है। निवेश समितियां सभी निर्णय व्यावसायिक मानदंडों पर लेती हैं। वे सरकार के निर्देशों से मुक्त रहती हैं।
इसके अलावा पेशेवर प्रबंधकों को बाजार दर पर पारिश्रमिक दिया जाता है। इस व्यवस्था ने अबू धाबी निवेश प्राधिकरण, कनाडा पेंशन योजना निवेश और टेमासेक जैसे निवेशकों को आकर्षित किया है और केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अपनी प्रतिबद्धता को दोगुना कर 60,000 करोड़ रुपये कर दिया।
इस डिजाइन पर आधारित राज्य एनआईआईएफ पूंजीगत परिसंपत्तियों का वित्तपोषण करेगा जिसका लक्ष्य यह होगा कि राज्य की प्रत्येक 1 रुपये इक्विटी पर 4 रुपये संस्थागत पूंजी जुटाई जाए। इसकी पोर्टफोलियो कंपनियां, परियोजना विशेष प्रयोजन साधन (एसपीवी) और इनविट्स ऋण जुटा सकते हैं और बॉन्ड जारी कर सकते हैं जिन्हें राज्य बजट के बजाय परियोजना-विशिष्ट नकदी प्रवाह से चुकाया जाएगा।
इन तीनों संस्थाओं की निगरानी एक राज्य विकास पूंजी परिषद द्वारा की जा सकती है जिसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री करें और वित्त मंत्री उपाध्यक्ष होंगे। परिषद स्वतंत्र नामांकन प्रक्रिया के माध्यम से बोर्ड नियुक्त करेगी, नीति तय करेगी और सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन की समीक्षा करेगी। यह व्यक्तिगत मूल्यांकन, लेनदेन या निवेश में कोई भूमिका नहीं निभाएगी और बोर्ड सदस्य क्रमिक कार्यकाल में सेवा देंगे जिन्हें केवल परिभाषित कारणों से हटाया जा सकेगा।
जो राज्य अभी कदम उठाएंगे वे शीघ्र ही पूंजीगत परिसंपत्तियों का वित्तपोषण करने और अधिक निजी पूंजी आकर्षित करने की क्षमता विकसित करेंगे। वे आधुनिक शहरों, राजमार्गों, बिजली संयंत्रों, अस्पतालों, विश्वविद्यालयों, बंदरगाहों और अन्य परिसंपत्तियों का निर्माण करेंगे जो सतत समृद्धि के लिए आवश्यक हैं।
(लेखक एवरस्टोन समूह के अध्यक्ष और लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में विजिटिंग प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस हैं। ये उनके निजी विचार हैं)