समय आ गया है कि भारत में एक व्यापक एवं लोकतांत्रिक उद्यम पूंजी कोष व्यवस्था की शुरुआत की जाए। बता रहे हैं अजित बालकृष्णन
सूट-बूट से सुसज्जित विदेशी नजर आ रहा एक लंबा सा व्यक्ति अपनी चौड़ी मुस्कान के साथ भीड़ को चीरता हुआ मेरे पास आया और उसने काफी जोरदार ढंग से हाथ मिलाते हुए कहा, ‘आपकी प्रस्तुति शानदार थी। क्या आप अपने कारोबार में वेंचर कैपिटल का निवेश चाहते हैं?’यह घटना सन 1998 में मुंबई के वर्ली के एक सभागार में घटी थी जहां मैंने अपना 30 मिनट लंबा पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन समाप्त ही किया था।
मैंने अपनी प्रस्तुति में बताया था कि कैसे भविष्य में इंटरनेट के जरिये होने वाले कारोबारों का प्रभुत्व होगा। सभागार में करीब 400 से अधिक लोग मौजूद थे और मेरी प्रस्तुति के बाद वहां पूरी तरह खामोशी का माहौल था। ऐसे में मैं इस बात को लेकर रोमांचित था कि कम से कम एक व्यक्ति तो ऐसा है जिसे मेरी बातें समझदारी भरी और काम की लगीं।
परंतु उस विशिष्ट नजर आ रहे व्यक्ति (शायद एक अमेरिकी) ने ‘वेंचर कैपिटल’ यानी उद्यम पूंजी शब्द का इस्तेमाल किया था और आईआईएम में पढ़े होने तथा व्यापक अध्ययन करने के बावजूद मैं इस बात को लेकर सुनिश्चित नहीं था कि वेंचर कैपिटल इंटरनेट आधारित कारोबार को लेकर मेरी योजनाओं में ठीक बैठेगा या नहीं।
उस दौर में स्टार्टअप शब्द का चलन नहीं था। मैं हक्काबक्का सा खड़ा था और उस व्यक्ति ने मुझसे कहा, ‘क्या मैं कल आपके दफ्तर में आकर आपसे मिल सकता हूं?’ मैंने अत्यंत विनम्रतापूर्वक हां कहा और उन्हें अपना कार्ड देकर 400 वर्गफुट की उस जगह पर बुलाया जिसे मैं अपना दफ्तर कहा करता था।
मैं इस बात को लेकर रोमांचित था कि एक विदेशी व्यक्ति को मेरे इंटरनेट आधारित कारोबार के विचार में दम लगा। आमतौर पर जब मैं भारत में किसी कारोबारी सम्मेलन में ऐसी प्रस्तुति देता और यह कहता कि दुनिया का भविष्य इंटरनेट में निहित है तो लोग मुझे संदेह की दृष्टि से देखा करते थे।
दलाल पथ के एक शीर्ष रैंकिंग वाले निवेशक ने तो एक बार मुझे कोने में बुलाकर मुझसे यह भी कहा था, ‘तुम एक भरोसेमंद और प्रतिभाशाली व्यक्ति हो, हर जगह घूम-घूमकर इंटरनेट-इंटरनेट मत किया करो क्योंकि इसकी वजह से तुम हंसी के पात्र बनते हो।’ उनके चेहरे के मनोभावों के आधार पर मैं समझ सकता था कि वे पूरी गंभीरता से मुझे यह सलाह दे रहे थे।
बहरहाल, चीजें एक के बाद एक जुड़ती गईं। वेंचर कैपिटल की पेशकश करने वाला व्यक्ति (वह एक अमेरिकी ही था जिसका कारोबार सिलिकन वैली में था) मेरे दफ्तर में आया और मुझ पर दबाव बनाया कि मैं अपने कारोबार में एक छोटे से हिस्से के बदले 10 लाख डॉलर के निवेश की पेशकश स्वीकार कर लूं।
अगले दो-तीन वर्षों में वेंचर कैपिटलिस्ट और निजी इक्विटी के निवेशक लगातार आए और मुझ पर यह दबाव बनाया कि मैं उन्हें अपने इंटरनेट कारोबार में निवेश करने दूं।
धीरे-धीरे मुझे पता चला कि एक वेंचर कैपिटल फंड निजी कंपनियों को शेयरों के बदले शुरुआती फंडिंग उपलब्ध कराता है। इसकी शुरुआत अमेरिका से हुई थी जो अभी भी ऐसी कंपनियों का सबसे बड़ा बाजार है। अमेरिकी वेंचर कैपिटल फंड प्राय: 10 वर्ष की अवधि के लिए होते हैं और फंड की अवधि समाप्त होने के पहले उन्हें या तो अपना निवेश बेचना होता है या फिर उसे सार्वजनिक बाजार में पेश करना होता है।
यदि वेंचर कैपिटलिस्ट ने अपने फंड के सातवें वर्ष में आपके कारोबार में निवेश किया है तो आपके पास उसे परिणाम देने के लिए केवल तीन वर्ष का समय रह जाता है। मुझे समझ में आया कि इसी कम समय की वजह से वेंचर कैपिटलिस्ट निरंतर उद्यमियों पर यह दबाव बनाते रहते हैं कि वे तेज वृद्धि का प्रदर्शन करें। भले ही उस दौरान स्थानीय बाजार (उदाहरण के लिए भारत) काफी धीमी गति से विकसित हो रहा हो।
मेरी जिज्ञासा वास्तव में यह थी कि इस पूरे विचार के पीछे वास्तविक सोच कैसा था। यह बात सही है हमारे दौर में जैसा कि कुछ लोग मानते हैं ‘वित्तीयकरण’ उतना ही बुनियादी और लाभदायक है जितना कि 18वीं सदी में ‘औद्योगीकरण’ था। औद्योगीकरण यानी विनिर्माण में मशीनों के इस्तेमाल ने कपड़ों को सबके लिए सस्ता और सुलभ बनाया (एक पल के लिए यह भूल जाएं कि इसने भारतीय बुनकरों आदि को बहुत गरीब बनाया)।
विकिपीडिया की परिभाषा के हिसाब से देखें तो वित्तीयकरण से तात्पर्य है घरेलू और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं में वित्तीय उद्देश्यों, वित्तीय बाजारों, वित्तीय कारकों और वित्तीय संस्थानों की भूमिका का विस्तार।
भारत भी वित्तीयकरण की राह पर बढ़ता नजर आता है। भारतीय मीडिया को यूनिकॉर्न स्टार्टअप की कहानियां कहना पसंद है और वह अक्सर बताता है कि कैसे एक और स्टार्टअप एक अरब डॉलर का मूल्यांकन हासिल कर चुका है। जाहिर है ऐसा इसलिए कि किसी न किसी अमेरिकी फंड ने काफी ऊंची कीमतों में इसका एक हिस्सा खरीदा होता है।
इस लेनदेन को बल किन शक्तियों से मिलता है? एक स्पष्ट बात तो यह है कि ये अमेरिकी फंड ऐसे भविष्य की आकांक्षा कर रहे हैं जिसमें एक अमेरिकी कंपनी अपने निवेश को खरीदकर भारतीय बाजार में प्रवेश कर सकती है: वॉलमार्ट इसका उदाहरण है जिसने दशकों तक भारत में प्रवेश का असफल प्रयास किया और फिर फ्लिपकार्ट को बढ़ी हुई कीमतों को खरीदकर वह इस कोशिश में कामयाब हुआ।
भारत में कारोबार कर रही लगभग सभी वेंचर कैपिटल फर्म अमेरिकी हैं और उनकी योजना भी वॉलमार्ट जैसी ही है। दो या तीन वर्ष तक अपनी भारतीय निवेश वाली कंपनी पर तेज वृद्धि का दबाव और उसके बाद उसका अधिग्रहण करने का प्रयास। वेंचर कैपिटल फंड ने पहले 2000 के दशक में मीडिया में निवेश किया। उसके बाद ई-कॉमर्स और अब वित्तीय सेवाओं में उनका निवेश हो रहा है। परंतु इसका अर्थ यह भी है कि हर चक्र में सीमित स्टार्टअप ही फंड पाते हैं।
क्या भारत में एक अधिक लोकतांत्रिक वेंचर कैपिटल व्यवस्था की कल्पना की जा सकती है? इससे मेरा तात्पर्य है भारत भर में हजारों वेंचर कैपिटल फंड का निर्माण करना जो 20 फीसदी हिस्सेदारी के लिए एक करोड़ रुपये तक का निवेश कर सकें। इससे युवा भारतीय उद्यमियों को कई शानदार विचारों को मूर्त रूप देने में मदद मिलेगी।
देश में ऐसी लोकतांत्रिक वेंचर कैपिटल व्यवस्था बनाने में किस तरह की नीतिगत पहलों की आवश्यकता होगी? पूरी दुनिया पर मंदी का खतरा मंडरा रहा है और आईटी क्षेत्र जैसे रोजगारपरक क्षेत्र अपना आकार कम कर रहे हैं। ऐसे में हम भारतीयों को इस राह पर जल्दी आगे बढ़ना होगा।
(लेखक इंटरनेट उद्यमी हैं)