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दो दशक बाद गांधी परिवार के बाहर का अध्यक्ष

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Last Updated- December 11, 2022 | 2:05 PM IST

कांग्रेस में पूर्णकालिक कांग्रेस अध्यक्ष के लिए जी-23 का अभियान अपने अंजाम तक पहुंचता दिख रहा है। यह अभियान कांग्रेस में चुनिंदा नेताओं के समूह ने अगस्त 2020 में  शुरू किया था।
जी-23 के कुछ सदस्य कांग्रेस छोड़ चुके हैं और यह सिमट चुका है। इस समूह के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘हमने कांग्रेस अध्यक्ष को पत्र लिखकर मांग की थी कि सक्रिय पूर्णकालिक अध्यक्ष के लिए चुनाव की प्रक्रिया शीघ्र पूरी की जाए। हम देख रहे हैं कि अब चुनाव हो रहे हैं। लिहाजा आप कह सकते हैं कि हमने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया है।’
उन्होंने कहा,’असल परीक्षा कांग्रेस कार्यकारी समिति (सीडब्ल्यूसी) के चुनाव में होगी। इसके बाद सीडब्ल्यूसी का चुनाव हो सकता है।’ औपचारिक रूप से चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गई है और कांग्रेस की पुरानी मशीनरी सक्रिय हो गई है। हालांकि चुनाव से जुड़े कुछ मामलों में अस्पष्टता कायम है। कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए नामांकन पत्रों की जांच करने की अंतिम तिथि 1 अक्टूबर थी। दल की चुनाव समिति के प्रमुख मधुसूदन मिस्त्री ने घोषणा की थी कि चुनाव की दौड़ में दो प्रत्याशी : वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और पूर्व केंद्रीय मंत्री व सांसद शशि थरूर दौड़ में बचे।
 हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि क्यों झारखंड के पूर्व मंत्री के एन त्रिपाठी का नामांकन पत्र खारिज किया गया था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी प्रत्याशी आधिकारिक या अनौपचारिक रूप से गांधी परिवार की पसंद नहीं है। उन्होंने कहा, ‘ये प्रत्याशी अपने बलबूते चुनाव लड़ रहे हैं। गांधी परिवार ने किसी का समर्थन नहीं किया है।’
 कुछ प्रमाण यह भी मिले हैं कि गांधी परिवार के दबदबे के बावजूद यह चुनाव कुछ ‘सामान्य’ ढंग हो रहा है। अभियान के कुछ मुद्दे तय होने लगे हैं। थरूर ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘मेरे अनुसार यदि आप कांग्रेस के काम करने के तरीके से संतुष्ट हैं तो खड़गे साहब को वोट दें। यदि आप बदलाव चाहते हैं तो मैं चुनाव में खड़ा हूं। हम दोनों के बीच विचारधारा के स्तर पर कोई भेदभाव नहीं है।’
खड़गे ने कहा,’ मुझे चुनाव लड़ने के लिए प्रमुख राज्यों के सभी नेताओं, पार्टी कार्यकर्ताओं और प्रतिनिधियों ने प्रेरित किया। मेरे नामांकन पत्र भरने के दौरान जो लोग उपस्थित थे, मैं उनका धन्यवाद देता हूं। ‘ थरूर के समर्थन में आए जनसमर्थन के बारे में खड़गे ने दबी जुबान में कहा, ‘केरल प्रमुख राज्य नहीं है? ‘
सीडब्ल्यूसी का चुनाव कब
इस चुनाव की रंगत अलग है। बीते चुनावों में तत्कालीन प्रधानमंत्री व पार्टी प्रमुख के पसंद के प्रत्याशी येन-केन प्रकरण  से चुनाव जीत जाते थे। इसका एक अच्छा उदाहरण तिरुपति में 1992 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का सत्र था। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव और कांग्रेस अध्यक्ष को ऐसी पार्टी की जरूरत थी जो उनका सम्मान करे और उनका आदेश माने। उनको कांग्रेस कार्यकारी समिति पर नियंत्रण करने की जरूरत थी।
कांग्रेस में सीडब्ल्यूसी सबसे उच्च कार्यकारी समिति है। कांग्रेस के संविधान के अनुसार पार्टी के अध्यक्ष तथा सत्ता में होने पर प्रधानमंत्री के अलावा 23 सदस्य होते हैं।  इनमें 12 सदस्यों का चुनाव अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य करते हैं। बाकी सदस्यों का सदस्यों का नामांकन पार्टी अध्यक्ष करता है। हाल के समय में सीडब्ल्यूसी का चुनाव केवल दो बार हुआ है।
तिरुपति के सत्र और सीडब्ल्यूसी के चुनाव में राव के खिलाफ विरोध का बिगुल फूंकने वाले दो प्रमुख विरोधी उजागर हुए : अर्जुन सिंह और शरद पवार। राव को लगा कि  यदि ये दो नेता फैसले लेने वाली सर्वोच्च संस्था में चुने जाते तो वे हर फैसले पर सवाल व रोड़ा अटका सकते हैं। 
राव ने घोषणा की थी कि इस चुनाव में किसी भी अनुसूचित जाति व जनजाति के प्रतिनिधि को चुना नहीं गया। सीडब्ल्यूसी में किसी महिला भी चुनाव नहीं गया। इनका चुनाव नहीं होने पर राव ने शर्मिंदगी जाहिर की। इस दलील के आधार पर उन्होंने सीडब्ल्यूसी के सदस्यों (जो चुने गए थे) को पद से इस्तीफा देने के लिए कहा गया। हालांकि कांग्रेस के मनोनीत सदस्यों को पद पर बरकरार रखा गया।
साल 1997 में कांग्रेस के अध्यक्ष सीताराम केसरी थे, उस समय कलकत्ता में सीडब्ल्यूसी का चुनाव हुआ था। इस चुनाव में अहमद पटेल, माधव राव सिंधिया और प्रणब मुखर्जी सीडब्ल्यूसी के सदस्य बने। कांग्रेस 1996 का लोकसभा चुनाव हार चुकी थी। इसलिए इस चुनाव पर कोई सवाल नहीं उठाया गया। इसके बाद साल 1997 में सोनिया गांधी औपचारिक रूप से कांग्रेस में शामिल हुईं। केसरी को मार्च 1998 में संदेश भेजे गए कि उन्हें सोनिया गांधी के लिए पद छोड़ना होगा।
सीडब्ल्यूसी ने सोनिया गांधी को पार्टी का अध्यक्ष बनाने के लिए प्रस्ताव पारित किया। केसरी ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। सोनिया गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया। इससे पहले सोनिया गांधी ने एक भी चुनाव नहीं लड़ा था।
साल 1999 तक सोनिया गांधी का सिक्का पार्टी में चलता रहा। थोड़ा आश्चर्य तब हुआ जब राजीव गांधी व बाद में नरसिंह राव के पूर्व राजनीतिक सचिव जितेंद्र प्रसाद ने कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़ा और उसमें बुरी तरह से हार गए थे। इस चुनाव में सोनिया को 7,000 से अधिक मत मिले थे लेकिन प्रसाद को 100 से कम वोट मिले थे। 
सीडब्ल्यूसी ने प्रस्ताव पारित कर सोनिया गांधी को  सीडब्ल्यूसी में बदलाव करने की शक्ति प्रदान की। इसके बाद दल में किसी भी पद के लिए कोई चुनाव नहीं हुआ। साल 2017 में आम सहमति के आधार पर राहुल गांधी का चुनाव हुआ था।
जी 23 के एक सदस्य ने कहा कि परिवार ऐसे किसी को (अध्यक्ष) चाहता है जो बहुत जबान और मनमर्जी न चलाए, बहुत जोर न लगाए। असलियत में सवाल नहीं पूछने वाले, खतरा नहीं बनने वाले वफादार की जरूरत है।
क्या सीडब्ल्यूसी का चुनाव होगा? नए अध्यक्ष के लिए मतदान 17 अक्टूबर को होगा। इसका जवाब 19 अक्टूबर को चुनाव नतीजे से मिलेगा। 

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First Published - October 5, 2022 | 9:12 PM IST

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