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IBC में हितों का टकराव: खुद फैसला लेने वाले वित्तीय ऋणदाताओं को फायदा, परिचालन ऋणदाता बेआवाज

आईबीसी में वित्तीय ऋणदाताओं के दबदबे से छोटे सप्लायर और एमएसएमई (परिचालन ऋणदाता) हाशिए पर हैं, जिससे उनकी वसूली और संवैधानिक अधिकारों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं

Published by
एम एस साहू   
राघव पांडेय   
Last Updated- June 30, 2026 | 9:23 PM IST

दिवालिया कानून सुधार समिति यानी बीएलआरसी, विधायिका और न्यायपालिका ने लगातार एक ही प्रस्थापना को मजबूत किया है और वह यह कि भारतीय दिवाला और ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी), 2016 के तहत कॉरपोरेट दिवालिया निस्तारण प्रक्रिया (सीआईआरपी) वित्तीय ऋणदाताओं से संबं​धित है। उनकी व्यावसायिक समझ सर्वोपरि है और उस पर शायद ही कोई सवाल उठाया जा सकता है। परिचालन ऋणदाता इस संहिता में अक्सर बाहर रखे जाने वाले विषय के रूप में नजर आते हैं। 

एक दशक के क्रियान्वयन से परिणाम स्पष्ट हैं। वित्तीय ऋणदाताओं ने 2024-25 में स्वीकृत दावों का 38 फीसदी हिस्सा वसूल किया (परिहार लेनदेन और व्यक्तिगत गारंटरों से प्राप्तियों को छोड़कर) जबकि परिचालन ऋणदाताओं ने केवल 10 फीसदी वसूला। परिचालन ऋणदाता एक समान वर्ग नहीं हैं। इनमें सरकारें, श्रमिक, कर्मचारी और व्यापारिक विक्रेता शामिल हैं जिनमें से अधिकांश सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) हैं। परिसमापन की स्थिति में एमएसएमई सबसे नीचे होते हैं। यद्यपि अलग-अलग वसूली डेटा उपलब्ध नहीं है लेकिन व्यापारिक ऋणदाताओं के लिए वसूली नगण्य प्रतीत होती है। 

यह परिणाम अपरिहार्य नहीं था। वर्ष 2019 के स्विस रिबन्स मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि प्रतिशत के आधार पर परिचालन ऋणदाताओं ने वास्तव में वित्तीय ऋणदाताओं से थोड़ी अधिक वसूली की थी और पंचाटों ने लगातार तुलनीय व्यवहार सुनिश्चित किया था। यह स्थिति जुलाई 2019 के संशोधन के बाद बदल गई जिसने समाधान आय के वितरण को ऋणदाताओं की समिति की वाणिज्यिक समझदारी के दायरे में रखा। उसी वर्ष बाद में संशोधन को बरकरार रखते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने प्रभावी रूप से ऋणदाता वर्गों की तरफदारी वाले भुगतान को सार्थक समीक्षा से अलग कर दिया। तब से आपूर्तिकर्ताओं के लिए वसूली की दर बराबरी के स्तर से गिरकर सांख्यिकीय रूप से नगण्य हो गई है।

आईबीसी वित्तीय ऋणदाताओं को यह तय करने का अधिकार देता है कि समाधान आय कैसे साझा की जाएगी। इसमें उनका अपना हिस्सा भी शामिल है, जबकि परिचालन ऋणदाताओं को न तो वोट का अ​धिकार मिलता है और न ही प्रतिकूल आवंटन के खिलाफ कोई उपाय। व्यावसायिक समझ से कारोबार के फैसलों को सही ठहराया जा सकता है, न कि खुद से मूल्य तय करने को। यह हितों के टकराव का सटीक उदाहरण है जहां वितरण तय करने वाला पक्ष ही उसका मुख्य लाभार्थी है। 

यह विषमता प्रक्रियात्मक बाधाओं से और मजबूत होती है। वर्ष 2020 से सीआईआरपी शुरू करने के लिए डिफॉल्ट सीमा लगभग 1 करोड़ रुपये है। अधिकांश वित्तीय ऋणदाता आसानी से इस सीमा को पार कर लेते हैं लेकिन कई एमएसएमई ऐसा नहीं कर पाते। अगर वे कर भी लें तो परिचालन ऋणदाताओं को पहले एक मांग नोटिस जारी करना होता है जिसे ‘पहले से विद्यमान विवाद’ का दावा करके आसानी से विफल किया जा सकता है चाहे वह विवाद कितना ही कमजोर क्यों न हो। उन्हें पहले से तय और ऋणदाताओं द्वारा शुरू दिवालियापन प्रक्रियाओं से भी बाहर रखा गया है। 

कानून केवल वित्तीय ऋणदाताओं से बनी ऋणदाता समितियों को अधिकार देता है। इसका संवैधानिक औचित्य कमजोर है। संविधान का अनुच्छेद 14 केवल वहीं वर्गीकरण की अनुमति देता है जहां वह एक तर्कसंगत अंतर पर आधारित हो और उसका भी कानून के उद्देश्य से तार्किक संबंध होना चाहिए। वित्तीय और परिचालन ऋणदाताओं का विभाजन दोनों ही कसौटियों पर जूझता दिखता है।

आईबीसी इस धारणा पर आधारित है कि वित्तीय ऋण धन के समय मूल्य को दर्शाता है जबकि परिचालन ऋण ऐसा होता। यह भेद एक तर्कसंगत अंतर के रूप में बनाए रखना कठिन है। हर व्यवसाय समझता है कि आज का एक रुपया कल के एक रुपये से अधिक मूल्यवान है। एक आपूर्तिकर्ता जो उधार बिक्री के लिए नकद बिक्री की तुलना में अधिक कीमत वसूलता है वह समय को उतना ही मूल्य देता है जितना कि एक ऋणदाता ब्याज वसूलकर करता है। आर्थिक सार एक समान है। केवल अनुबंधात्मक रूप अलग है।

बीएलआरसी और बाद के वि​धिशास्त्र वित्तीय ऋणदाताओं की प्रधानता को इस आधार पर उचित ठहराते हैं कि वे संकटग्रस्त कंपनियों को बचाने के लिए सबसे अच्छी स्थिति में हैं। यह कानून के उद्देश्य का गलत पाठ है। आईबीसी कोई बचाव अधिनियम नहीं है। इसका उद्देश्य दिवालियापन का समाधान है चाहे वह समाधान योजना के माध्यम से हो या परिसमापन के माध्यम से यानी इनमें से जो भी अधिक प्रभावी हो।

यदि यह गलत धारणा मान भी ली जाए कि बचाव ही उद्देश्य है तो भी वरीयता का तर्क सही नहीं ठहरता। सामान्य तौर पर दो मान्यताओं का उल्लेख किया जाता है। पहला, कहा जाता है कि वित्तीय ऋणदाताओं के पास श्रेष्ठ वाणिज्यिक समझ है। प्रमाण इसके पक्ष में नहीं हैं। सीआईआरपी में दाखिल की गई आधी से अधिक कंपनियां अंततः परिसमापन में चली जाती हैं।

मुख्यतः इसलिए कि कोई समाधान योजना प्राप्त नहीं होती। और भी महत्त्वपूर्ण यह है कि जिन कंपनियों को परिसमापन में भेजा गया उनमें से एक बड़ा हिस्सा बाद में पुनर्गठन के माध्यम से जीवित रहता है जो दर्शाता है कि व्यवहार्यता का आकलन अचूक नहीं है। परिणाम इस दावे का समर्थन नहीं करते कि ऋणदाताओं के पास बचाने योग्य कंपनियों की पहचान करने की कोई विशिष्ट क्षमता है।

दूसरा, कहा जाता है कि वित्तीय ऋणदाता विशेष रूप से व्यवसाय को बचाने के व्यापक हित में वसूली को स्थगित करने में सक्षम हैं, जबकि परिचालन ऋणदाता तत्काल भुगतान के लिए दबाव डालेंगे। प्रमाण इसके विपरीत संकेत देते हैं। स्वीकृत समाधान योजनाएं वित्तीय ऋणदाताओं को तत्काल नकद निकासी प्रदान करती हैं न कि पुनर्जीवित उद्यम में दीर्घकालिक भागीदारी। यदि बचाव के लिए वर्तमान वसूली का त्याग कर भविष्य मूल्य को अपनाना आवश्यक है तो ऋणदाताओं ने उस उद्देश्य के प्रति कोई विशेष प्रतिबद्धता प्रदर्शित नहीं की है।

इस प्रकार वित्तीय ऋणदाताओं और परिचालन ऋणदाताओं का वर्गीकरण दो तरह से विफल रहता है। यह भेद न तो कोई ठोस आर्थिक आधार रखता है, और न तो संहिता के वास्तविक उद्देश्य यानी समाधान से कोई तार्किक संबंध है और न ही बचाव के संकुचित उद्देश्य से जिसे इसके पक्ष में प्रस्तुत किया गया है।  

आईबीसी का संगठनात्मक आधार असामान्य है। विश्वभर के दिवालियापन ढांचे सुरक्षित ऋणदाताओं की प्राथमिकता को मान्यता देते हैं लेकिन बहुत कम ही वित्तीय-परिचालन विभाजन को प्रक्रिया का केंद्र बिंदु बनाते हैं। अमेरिका में परिचालन ऋणदाता अक्सर व्यापारिक ऋणदाताओं की समिति पर हावी रहते हैं और पुनर्गठन योजनाओं पर मतदान करते हैं। ब्रिटेन में और संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय व्यापार कानून आयोग के विधायी मार्गदर्शक के अंतर्गत भेद सुरक्षित और असुरक्षित दावों के बीच होता है न कि ऋणदाताओं और आपूर्तिकर्ताओं के बीच।

इन न्याय क्षेत्रों में परिचालन ऋणदाताओं की सुनी जाती है लेकिन आईबीसी के अंतर्गत वे लगभग बेआवाज हैं। यह असंगति उल्लेखनीय है। आईबीसी का व्यक्तिगत दिवालियापन ढांचा केवल वित्तीय ऋणदाताओं से बनी समिति को अनिवार्य नहीं करता, जिससे यह सिद्ध होता है कि दोनों ऋणदाताओं के बीच का विभाजन एक नीतिगत विकल्प है न कि परिचालन आवश्यकता।

सुरक्षित ऋणदाता प्राथमिकता के पात्र हैं लेकिन प्राथमिकता सर्वोच्चता नहीं है। आईबीसी एक ऐसे ढांचे में विकसित हो गया है जहां वित्तीय ऋणदाता न केवल प्रक्रिया पर हावी हैं बल्कि यह भी तय करते हैं कि दिवालियापन से मिली संपत्ति कैसे बांटी जाएगी। इसमें उनका अपना हिस्सा भी शामिल है। कानून के बहुत कम क्षेत्र ऐसे हैं जहां शक्ति और स्वार्थ का ऐसा संगम स्वीकृत है।

अब यह पूछने का समय आ गया है कि क्या ऋणदाताओं का नियंत्रण बहुत आगे बढ़ गया है और क्या अधिकतम मूल्य पाने की प्रक्रिया वैध रह सकती है जब सबसे अधिक प्रभावित पक्षों को सार्थक आवाज से वंचित कर दिया गया हो। 

(लेखक क्रमश:  दिवालियापन विधि अकादमी के मानद फेलो और भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड के पूर्व चेयरमैन हैं। ये उनके निजी विचार हैं) 

First Published : June 30, 2026 | 9:23 PM IST