इलेस्ट्रेशन: अजय मोहंती
रणनीति वह होती है, जिसमें असीमित आकांक्षाओं और सीमित संसाधनों के बीच संतुलन बिठाया जाता है। जैसे-जैसे आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) के प्रति उत्साह थम रहा है और लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) की वास्तविक क्षमता तथा डेटा सेंटरों में निवेश से मिलने वाले लाभ का नए सिरे से आकलन किया जा रहा है वैसे-वैसे भारत को एआई में फिर मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने का अच्छा मौका मिल रहा है। किंतु भारत को ऐसी रणनीति अपनानी होगी, जिसमें उसकी खास डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (डीपीआई) का पूरा लाभ मिले।
इस रणनीति के तहत उद्यमों के लिए भी मजबूत डीपीआई तैयार करना होगा, जिसमें हरेक उद्यम को विशिष्ट और सत्यापित डिजिटल पहचान देनी होगी, संस्थाओं को डिजिलॉकर देने होंगे, सरकारी सेवाओं को पीडीएफ के बजाय ऐप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस (एपीआई) के जरिये उपलब्ध कराना होगा और सभी कानूनों के लिए एक ही प्रामाणिक डिजिटल स्रोत (इंडिया कोड) बनाना होगा। इससे औपचारिक उद्यमों की संख्या बढ़ेगी और सरकार तथ्यों के आधार पर बेहतर नीतियां बना पाएगी।
भारत में व्यापक समृद्धि लाने के लिए सरकार और उद्यमों के बीच मौजूद वर्तमान संबंधों में बदलाव लाना आवश्यक है। आज भी देश का लगभग 45 प्रतिशत श्रमबल कृषि क्षेत्र में कार्यरत है क्योंकि देश में नियोक्ता तो 7 करोड़ से अधिक हैं मगर 10 करोड़ रुपये से अधिक चुकता पूंजी वाली कंपनियां मुश्किल से 30,000 हैं। अभी केवल 11 प्रतिशत कामगार विनिर्माण क्षेत्र में लगे हैं, कंपनियां अनुसंधान पर सकल घरेलू उत्पाद का केवल 1 प्रतिशत खर्च करती हैं और महज 20 प्रतिशत कामगारों को औपचारिक रोजगार मिला है। इन्हें बढ़ाना है तो अधिक उत्पादकता वाले उद्यमों की संख्या बढ़ानी होगी। इसके लिए नियामकीय पेचीदगी तो कम करनी ही होगी, सरकार तथा उद्यमों के बीच संपर्क, कामकाज और संबंधों को डिजिटल भी बनाना होगा।
उद्यमों का डीपीआई बेहतर नीति बनाने के लिए आंकड़े और प्रमाण देगा। अमेरिकन इकनॉमिक रिव्यू में 2020 में प्रकाशित शोध पत्र ‘रूरल रोड्स ऐंड लोकल इकनॉमिक डेवलपमेंट’ में स्थानीय आर्थिक गतिविधियों का अनुमान लगाने के लिए रात के समय उपग्रह से दिखने वाली रोशनी का इस्तेमाल किया गया। अध्ययन में निष्कर्ष निकाला गया कि भारत की लगभग 40 अरब डॉलर (करीब 3.2 लाख करोड़ रुपये) के ग्रामीण सड़क कार्यक्रम से गांवों की आय या उपभोग में कोई स्पष्ट बढ़त नहीं दिखाई दी।
किंतु हाल ही में एआई और डीपीआई पर नैशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकनॉमिक रिसर्च की एक संगोष्ठी में मिनेसोटा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रवि बापना ने एक नया वर्किंग पेपर ‘पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर फॉर मेजरिंग वेलफेयर’ पेश किया। बापना इसके सह-लेखक हैं। पिछले शोध पत्र के निष्कर्ष पर सवाल उठाते हुए इस अध्ययन में कहा गया है कि लोगों के उपभोग और आर्थिक गतिविधियों पर किसी आधारभूत संरचना परियोजना का प्रभाव उपग्रह के रात के आंकड़ों के बजाय भुगतान के आंकड़ों से बेहतर पता लग सकता है। शोध में देश की प्रमुख वित्तीय प्रौद्योगिकी कंपनी फोनपे के आंकड़े देखे गए, जिसके साथ 70 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ता और 5 करोड़ से अधिक व्यापारी जुड़े हैं। इसके अनुसार भुगतान से मिलने वाले 52 प्रतिशत सूचना संकेत किसी जिले के भीतर आर्थिक गतिविधियों में बदलाव को दर्शाते हैं, जबकि उपग्रह से रात में दिखने वाली रोशनी के केवल 3 प्रतिशत आंकड़े यह दिखाते हैं।
दूसरे शब्दों में कहें तो लगातार तैयार हो रहे आंकड़ों का महत्त्व अधिक है। कल्पना कीजिए कि 15 रुपये प्रति गीगाबाइट की दर से (वैश्विक औसत का लगभग दसवां हिस्सा) उद्यम डीपीआई का इस्तेमाल कर रहे 1 अरब सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं (जो छह वर्ष पहले 62.2 करोड़ थे) द्वारा तैयार डिजिटल आंकड़ों का प्रयोग शोध और नीतिगत विश्लेषण के लिए किया जाए तो नीति निर्माण कितना सटीक, कारगर और प्रमाण-आधारित हो सकता है।
उद्यमों के लिए डीपीआई कोई असामान्य कल्पना नहीं बल्कि आधुनिक तकनीक का व्यावहारिक और स्वाभाविक उपयोग है। इससे अलग-अलग मौजूद नियामक प्रणालियों की जगह ऐसी समन्वित डिजिटल व्यवस्था आ सकती है, जिसमें पहचान, लाइसेंस, प्रमाण-पत्र, भुगतान और अनुपालन जैसी सभी प्रक्रियाएं विभिन्न प्लेटफॉर्मों के बीच आसानी से संचालित होंगी। आज छोटे से व्यापारी या अपने रोजगार वाले का एक चौथाई समय सरकारी पोर्टलों और कागजी प्रक्रियाओं में ही खप जाता है। उद्यम डीपीआई आएगा तो अनुपालन प्रक्रिया स्वतः संचालित, एजेंट से चलने वाली, परस्पर जुड़ी हुई हो सकती है तथा बिजनेस सॉफ्टवेयर से जुड़ सकती है। उद्यम डीपीआई के स्तंभ- पहचान, सुरक्षित डेटा साझेदारी और भुगतान इसके साथ ही कारोबारों के लिए ऋण की उपलब्धता बढ़ाएंगे, औपचारिक अर्थव्यवस्था से जुड़ने को प्रोत्साहित करेंगे और ग्राहकों तथा कर्मचारियों का विश्वास भी बढ़ाएंगे। आइए, इसके प्रत्येक प्रमुख स्तंभ को समझते हैं।
विशिष्ट एवं सत्यापन योग्य उद्यम पहचान: अर्थशास्त्री रोनाल्ड कोस की दलील – कंपनियां लेनदेन की लागत कम करने के लिए होती हैं – सरकारी पेचों में गुम हो गई है। आज एक सामान्य उद्यम कम से कम 25 पहचान क्रमांकों में उलझा रहता है, जिनमें करीब 16 केंद्र सरकार और 9 राज्य सरकारों से मिलते हैं। प्रत्येक पहचान क्रमांक का मकसद अलग है मगर इन सबका एक साथ इस्तेमाल किसी पहेली को हल करने जैसा होता है। यदि पैन 2.0 के आधार पर प्रत्येक उद्यम को एक ही विशिष्ट पहचान क्रमांक दिया जाए तो अलग-अलग क्रमांकों की जरूरत काफी हद तक खत्म हो सकती है। यह मशीन द्वारा पढ़ने योग्य डिजिटल पहचान होगी, जिसका उपयोग विभिन्न सेवाओं के लिए ई-केवाईसी के रूप में किया जा सकेगा। इससे एआई आधारित प्रणाली भी सुरक्षित और भरोसेमंद तरीके से लेन-देन कर सकेंगी तथा संस्थाओं के बीच भुगतान यूपीआई की तरह सरल हो जाएगा।
एंटिटी डिजिलॉकर: अभी किसी भी उद्यम से जुड़े दस्तावेज अलग-अलग सरकारी पोर्टल, ई-मेल, विभागों और कार्यालयों में रहते हैं। इन्हें एक ही स्थान से लेने या साझा करने की कोई व्यवस्था नहीं है, जिस कारण प्रक्रिया बेतरतीब दिखती है। केंद्र सरकार के विभिन्न विभाग लगभग 489 प्रकार के उद्यम दस्तावेज जारी करते हैं और राज्य सरकारें 3,000 से भी ज्यादा। ऐसे में एंटिटी डिजिलॉकर उद्यम दस्तावेजों का स्वाभाविक मंच बन सकता है, जहां संबंधित विभागों से लाइसेंस, पंजीकरण और स्वीकृतियों जैसे दस्तावेज सुरक्षित तरीके से तत्काल साझा किए जा सकें। इससे व्यवसाय एक ही दस्तावेज को अलग-अलग पोर्टल पर बार-बार अपलोड करने के बजाय केवल एक बार अनुमति देकर यह काम कर पाएंगे।
इस प्रकार विश्वसनीय एंटरप्राइज डेटा की मदद से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को उसी तरह सस्ता कर्ज मिल सकता है, जिस तरह अकाउंट एग्रीगेटर व्यवस्था से खुदरा ऋण आसान हो गया। अभी एंटिटी डिजिलॉकर पर केवल उद्यम, जीएसटीआईएन और पैन ही उपलब्ध हैं तथा कंपनी मामलों के मंत्रालय के दस्तावेज एवं राज्यों द्वारा जारी लाइसेंस और प्रमाणपत्र अब भी इस पर नहीं हैं।
पीडीएफ से एपीआई तक: आज भी देश की 2,500 से अधिक सरकारी वेबसाइट को इंसान ही इस्तमाल कर सकते हैं। हरेक का अलग इंटरफेस, आवेदन प्रक्रिया और नियम हैं किंतु ओपन एपीआई नहीं हैं, जिससे लोगों को अलग-अलग पोर्टल पर जाना पड़ता है। अब लोगों को नहीं बल्कि सॉफ्टवेयर और एआई आधारित एजेंटों को सरकारी प्रणालियों से संवाद करना चाहिए। यदि हर सरकारी सेवा, आवेदन, भुगतान और अनुपालन के लिए एपीआई सेतु के माध्यम से ओपन एपीआई उपलब्ध कराए जाएं तो सरकारी सेवाएं सीधे व्यापारिक प्रणालियों का हिस्सा बन पाएंगी। भारत में लगभग 8,700 सरकारी एपीआई मौजूद हैं मगर अब हर अनुपालन प्रक्रिया के लिए एपीआई होना चाहिए, जो उद्यमों का डीपीआई इस्तेमाल करे। अन्यथा पासवर्ड साझा करने और कैप्चा टाइप करने से हम फिर पुराने जमाने में पहुंच जाएंगे।
इंडिया कोड: भारत में सभी कानूनों की अद्यतन और प्रामाणिक जानकारी मुहैया कराने वाला इकलौता मंच नहीं है। इन्हें समझने के लिए अलग-अलग अधिनियमों, नियमों, 25 से अधिक प्रकार की अधिसूचनाओं और केंद्र तथा राज्य सरकारों के विभिन्न विभाग खंगालने पड़ते हैं। इसलिए कानून समझना भी उतना ही कठिन है, जितना उसका पालन करना। इसके लिए भारत के राजपत्र, ई-राजपत्र और इंडिया कोड को मिलाकर ऐसा इकलौता आधिकारिक मंच बनाया जाए, जहां सभी नियम-कानूनों को मशीन पढ़ सके। इससे एआई एजेंट कानून खुद ढूंढेंगे, अर्थ समझेंगे और उसी हिसाब से काम करेंगे।
उद्यमों के लिए डीपीआई से सरकार की ‘जन विश्वास’की भावना और मजबूत हो सकती है। नियम कायदे घटाए और प्रशासनिक सेवा सुधारे बगैर उद्यमों के लिए कागज, कार्यालय में हाजिरी और नकदी के बगैर बनाई गई व्यवस्था की आलोचना यह कहकर की गई है कि इसने राजमार्ग के बजाय पगडंडी बना दी है यानी पुरानी व्यवस्था ही रखी है। यह बात अलग है कि आलोचना करने वालों ने कभी किसी को रोजगार नहीं दिया।
(सभरवाल टीमलीज सर्विसेज के सह संस्थापक हैं और चंद्रा आईआईआईटी बेंगलूरु में सेंटर फॉर डीपीआई की सह संस्थापक हैं)