प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
केंद्र सरकार राज्यों और जिलों को निर्यात प्रोत्साहन में बड़ी भूमिका देने का लक्ष्य लेकर चल रही है। जैसा कि इस समाचार पत्र में गत सप्ताह प्रकाशित किया गया था। इस योजना के अंतर्गत विभिन्न राज्य जिलास्तरीय निर्यात कार्ययोजना तैयार करेंगे। वे निर्यात क्षमता वाले उत्पादों की पहचान करेंगे, औद्योगिक क्लस्टरों को मजबूत करेंगे और क्रियान्वयन के मोर्चे पर समय-समय पर आकलन करेंगे। इसके उद्देश्य को समझा जा सकता है।
निर्यात प्रतिस्पर्धा औद्योगिक क्लस्टरों और उत्पादन केंद्रों में बनती है और स्थानीय सरकारें अक्सर उन भौतिक बाधाओं की पहचान करने में बेहतर स्थिति में होती हैं, जो कंपनियों को विदेशी बाजारों तक पहुंचने से रोकती हैं। लेकिन केंद्र को क्रियान्वयन के विकेंद्रीकरण और निर्यात की जिम्मेदारी के विकेंद्रीकरण को एक जैसा नहीं मानना चाहिए।
विश्व व्यापार संगठन की ताजा व्यापार नीति समीक्षा में उचित ही कहा गया है कि भारत को उच्च व्यापार लागत, नियामकीय जटिलता और अधोसंरचना की कमी जैसी ढांचागत दिक्कतों को दूर करना चाहिए तभी वह एक विकसित अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य को हासिल कर पाएगा।
भारत का लक्ष्य 2024 में वैश्विक वाणिज्य निर्यात में अपनी हिस्सेदारी को केवल 1.8 फीसदी से बढ़ाकर 2047 तक लगभग 10 फीसदी तक पहुंचाने का है। यह अपने आप नहीं होगा और इसमें राज्यों की भूमिका निस्संदेह महत्त्वपूर्ण है। वे औद्योगिक क्लस्टर्स को मजबूत कर सकते हैं, लॉजिस्टिक्स में सुधार कर सकते हैं, बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित कर सकते हैं, भूमि अधिग्रहण की सुविधा दे सकते हैं और परीक्षण प्रयोगशालाएं तथा प्रमाणन की सुविधा दे सकते है।
राज्य यह चिह्नित करने की दृष्टि से भी अच्छी हालत में हैं कि कंपनियां निर्यात में विफल क्यों होती हैं। ऐसा खराब सड़कों, प्रमाणन में अधिक समय लगने या परीक्षण केंद्र नहीं होने की वजह से होता है। ये वे बाधाएं हैं जिन्हें शायद बहुत दूर से नहीं समझा जा सकता है।
निर्यात के प्रदर्शन को तय करने वाले कारक मुख्य रूप से केंद्र सरकार के अधीन रहते हैं। कोई भी राज्य सरकार बाजार पहुंच पर बातचीत नहीं कर सकती है। वह मुक्त व्यापार समझौता नहीं कर सकती है, गैर शुल्क बाधाओं का उत्तर नहीं दे सकती, महत्त्वपूर्ण कच्चे माल पर आयात शुल्क कम नहीं कर सकती या मानकों के लिए पारस्परिक मान्यता समझौते भी नहीं कर सकती है।
आधुनिक विनिर्माण निर्यात भी मूल्य श्रृंखला और आयातित मध्यवर्ती वस्तुओं जैसे सेमीकंडक्टर, विशेष रसायन, मशीनरी और महत्त्वपूर्ण खनिजों पर निर्भर करते हैं। यदि ये महंगे हैं या उन्हें हासिल करने में कठिनाई बनी रहती है तो राज्य निर्यात प्रतिस्पर्धा में सुधार के लिए बहुत कुछ नहीं कर सकते हैं।
विश्व व्यापार संगठन खुद यह गौर करता है कि भारतीय विनिर्माण को अभी भी कच्चे माल की ऊंची कीमतों का सामना करना पड़ता है जो आंशिक रूप से शुल्क से जुड़ी हैं। व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि भारत की शुल्क संरचना निर्यात के लिए बाधा है। भारत को इस पर तत्काल ध्यान देना होगा।
भारत ने मुक्त व्यापार समझौते करने में अच्छा प्रदर्शन किया है। इसमें ब्रिटेप और यूरोपीय संघ के साथ समझौते शामिल हैं। हालांकि मुक्त व्यापार समझौतों का उपयोग करने में भारत का पिछला रिकॉर्ड दिखाता है कि उसे और अधिक कदम उठाने होंगे। आंशिक रूप से क्षमता निर्माण के संदर्भ में ऐसा करना जरूरी है। निवेश संधियां भी केंद्र सरकार के क्षेत्राधिकार में आती हैं और उनको सुव्यवस्थित करना होगा। विदेशी निवेश अक्सर व्यापार और प्रतिस्पर्धा का बड़ा चालक होता है।
इसलिए जबकि केंद्र की यह सोच सही है कि निर्यात नीति का ध्यान सब्सिडी से हटाकर प्रतिस्पर्धा पर केंद्रित किया जाए, उसे परिणाम देने के लिए आवश्यक साधनों को स्थानांतरित किए बिना जवाबदेही को स्थानांतरित करने से बचना चाहिए। निर्यात प्रतिस्पर्धा जिलों और औद्योगिक क्लस्टरों में शुरू हो सकती है, लेकिन निर्यात सफलता अंततः राष्ट्रीय व्यापार नीति के माध्यम से सुनिश्चित होती है। राज्यों और जिलों से केवल वही अपेक्षा की जानी चाहिए जो वे सबसे अच्छा कर सकते हैं। यानी ऐसी परिस्थितियां बनाना जिनमें वैश्विक प्रतिस्पर्धी कंपनियां फल-फूल सकें।