प्रतीकात्मक तस्वीर
पिछले कुछ दिनों से बाजार में क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (सीएएस) व्यवस्था सुर्खियों में रही है। अब तक जो संकेत मिले हैं वे इस ओर इशारा कर रहे हैं कि यह व्यवस्था वे फायदे नहीं दे पाई हैं जिनकी उम्मीद लगाई गई थी। यह प्रणाली पात्र डेरिवेटिव शेयरों के बंद भाव तय करने की पुरानी प्रणाली यानी ‘वॉल्यूम-वेटेड एवरेज प्राइस’ (वीडब्ल्यूएपी) से बेहतर मानी जा रही थी। मगर ऐसा नहीं लग रहा है, कम से कम अब तक का अनुभव तो यही कहता है। हालांकि, कुछ बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
मगर इतना तो साफ है कि सीएएस ने बाजार से जुड़े कई लोगों को उलझन में डाल दिया है। बंबई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) और नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) में 3 अगस्त को सीएएस की शुरुआत हुई थी। सीएएस पर जो शुरुआती टीका-टिप्पणी हुई है उनसे पता चलता है कि दुनिया में प्रचलित प्रणाली को अपनाना हमेशा कारगर साबित नहीं होता। इसके लिए भारतीय बाजार के तौर-तरीकों पर अवश्य विचार करना होगा।
सीएएस एक नीलामी आधारित प्रणाली है। इसके तहत एक खास 20 मिनट की कारोबारी अवधि (दोपहर 3:15 बजे से 3:35 बजे तक) में बाजार कारोबारियों की बोलियों के आधार पर वायदा एवं विकल्प (एफऐंडओ) के लिए पात्र शेयरों के सही बंद भाव तय किए जाते हैं। यह खास अवधि दोपहर 3:15 बजे नकद बाजार के बंद होने के बाद शुरू होती है। बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा शुरू सीएएस ने लगभग 26 साल पुरानी प्रणाली की जगह ली है। पुरानी प्रणाली में वीडब्ल्यूएपी के आधार पर शेयर के बंद भाव निर्धारित करने के लिए लगातार होने वाले कारोबार के आखिरी 30 मिनट पर विचार किया जाता था।
सीएएस की जद से बाहर प्रतिभूतियों के लिए कुछ नहीं बदला है। उनके बंद भाव निर्धारित करने का तरीका अब भी पुरानी प्रणाली यानी वीडब्ल्यूएपी है। भारतीय बाजारों की अंतिम कारोबार मूल्य (लास्ट ट्रेडेड प्राइस या एलटीपी) प्रणाली से वीडब्ल्यूएपी प्रणाली की तरफ कदम बढ़ाने की मुख्य वजह यह थी कि एलटीपी में दिन के आखिर में कीमतों में हेरफेर की आशंका बनी रहती थी। इसमें आखिरी कुछ सेकंड में हुआ एक छोटा सा लेनदेन भी शेयर के आधिकारिक बंद भाव को बदल सकता था।
सीएएस में नीलामी के अंत में लिवाल और बिकवाल दोनों के हितों का मिलान किया जाता है। जिस कीमत पर सबसे अधिक कारोबार हो सकता है वह बंद भाव बन जाता है। नतीजे सबके सामने हैं। नकद बाजार में कारोबार दोपहर 3.15 बजे खत्म होने और एफऐंडओ शेयरों के लिए सीएएस शुरू होने के बाद अलग-अलग शेयरों में तेज उतार-चढ़ाव दिखे हैं। इससे निफ्टी 50 के बंद भाव पर भी असर हुआ है जो इन दिनों में बीएसई सेंसेक्स के बंद मूल्य से काफी अलग राह दिखा रहा है। बड़े शेयरों के लिए अलग-अलग एक्सचेंजों के बीच कीमतों में भारी अंतर से बेवजह असंतुलन पैदा हो रहा है।
बाजार में दांव लगाने वाले कुछ लोगों एवं संस्थाओं का कहना है कि सीएएस जैसी प्रणाली से मनमाफिक नतीजे पाने के लिए यह आवश्यक है कि इसका ढांचा बड़ा और विविध हो जिसमें हर तरह के भागीदार तरलता उपलब्ध करा सकें। भारत में सीएएस की कामयाबी के लिए घरेलू म्युचुअल फंड, बीमा कंपनियां, पेंशन फंड, परिवार कार्यालय, सॉवरिन वेल्थ फंड, विदेशी निवेशक, अधिक शुद्ध हैसियत वाले लोग, कीमतों के अंतर का फायदा उठाने वाले कारोबारी, मार्केट मेकर (खरीद और बिक्री के भाव तय करने वाले संस्थान या ब्रोकर) और इसी तरह के संस्थागत निवेशकों की बड़े पैमाने पर नियमित भागीदारी की आवश्यकता होगी। ज्यादा तरलता के साथ-साथ बड़े पैमाने पर भागीदारी से अलग-अलग एक्सचेंजों और बाजार खंड के बीच कीमतों में अंतर कम करने में मदद मिलेगी। लिहाजा मुमकिन है कि आने वाले दिनों में यह व्यवस्था स्थिर हो जाए।
अगर सीएएस वैश्विक स्तर पर अपनी धाक के बावजूद भारत में मनचाहे नतीजे नहीं दे पाता है तो नियामक और स्टॉक एक्सचेंजों को त्रुटियां स्वीकार करने से पीछे नहीं हटना चाहिए और इन्हें दुरुस्त करने के कदम उठाने चाहिए। संभव है कि भारतीय बाजार अभी इस बदलाव के लिए तैयार नहीं है और कुछ समय बाद इस प्रणाली पर फिर विचार किया जा सकता था। यह आश्वस्त होना जरूरी है कि बाजार में शामिल लोगों के वाजिब हितों को कोई नुकसान न पहुंचे।
एफऐंडओ शेयरों के बंद भाव में उतार-चढ़ाव का मतलब है कि निवेशकों को (जिनमें वे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने 3 अगस्त या उसके बाद इन एफऐंडओ शेयरों वाली म्युचुअल फंड इक्विटी योजनाएं खरीदी थीं) बाजार की गड़बड़ियों से या तो नुकसान उठाना पड़ा है या दूसरों को हुए नुकसान से फायदा हुआ है। ऐसे नतीजों का असर वास्तविक रकम के लेनदेन पर पड़ता है। शेयर बाजार में कीमत तय होने की प्रक्रिया में बाधा और अनिश्चितता अच्छी बात नहीं।