संपादकीय

Editorial: DGFT के MIP फैसले से महंगा होगा PVC, MSME और इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ेगा दबाव

सरकार ने एस-पीवीसी रेजिन पर न्यूनतम आयात मूल्य तय किया है। इससे घरेलू कीमतें बढ़ेंगी, जिससे एमएसएमई, सिंचाई और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की लागत पर बुरा असर पड़ेगा

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बीएस संपादकीय   
Last Updated- August 04, 2026 | 9:47 PM IST

विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) ने हाल ही में सस्पेंशन-ग्रेड पॉलीविनाइल क्लोराइड (एस-पीवीसी) रेजिन पर छह महीने के लिए न्यूनतम आयात मूल्य (एमआईपी) 0.766 डॉलर प्रति किलोग्राम तय किया है। इस कदम का उद्देश्य कथित डंपिंग को रोकना और घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करना है।

भारत की आयात निर्भरता को कम करना एक ऐसा लक्ष्य है जो सर्वथा उचित है। लेकिन ऐसे हालात में जहां घरेलू उत्पादन मांग का केवल एक-तिहाई ही पूरा करता है सस्ते आयातों को सीमित करके आयात निर्भरता को कम करना मुश्किल नजर आता है। इसके बजाय यह पीवीसी मूल्य श्रृंखला में लागत बढ़ाने का जोखिम पैदा करता है।

पीवीसी एक महत्त्वपूर्ण कच्चा माल है जिसका उपयोग सिंचाई और जल आपूर्ति पाइप, विद्युत नलिकाओं, केबल, फिटिंग, फिल्मों और कई चिकित्सा एवं निर्माण उत्पादों के निर्माण में होता है। इसलिए यह आवास, कृषि और अधोसंरचना जैसे क्षेत्रों का इनपुट है। भारत हर साल लगभग 47 लाख टन पीवीसी का उपभोग करता है लेकिन केवल 17 लाख टन का उत्पादन करता है। इसका मतलब है कि घरेलू मांग का लगभग दो-तिहाई हिस्सा आयात से पूरा करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में आयात विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता है।

एमआईपी का तात्कालिक परिणाम घरेलू रेजिन निर्माताओं की मूल्य निर्धारण शक्ति को मजबूत करना होगा। उद्योग संघों ने रिपोर्ट किया है कि अधिसूचना जारी होने के तुरंत बाद घरेलू पीवीसी की कीमतें बढ़ गईं। इसमें कुछ भी चौंकाने वाला नहीं है। जब सस्ते आयातों पर रोक लगती है तो घरेलू उत्पादकों पर प्रतिस्पर्धी दबाव कम हो जाता है और उन्हें कीमतें बढ़ाने का अवसर मिल जाता है।

इस बढ़ोतरी का बोझ रेजिन उत्पादकों पर नहीं बल्कि हजारों डाउनस्ट्रीम निर्माताओं पर पड़ेगा। इनमें बड़ी तादाद सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की है। ये कंपनियां पीवीसी रेजिन को उच्च-मूल्य वाले उत्पादों में बदलती हैं और उन क्षेत्रों को आपूर्ति करती हैं जो भारत के विकास एजेंडा के केंद्र में हैं। ऊंची कीमतें अनिवार्य रूप से सिंचाई उपकरण, पेयजल परियोजनाओं, आवास सामग्री और विद्युत अधोसंरचना की लागत में जुड़ जाएंगी।

पीवीसी पाइप जल जीवन मिशन और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना जैसी प्रमुख योजनाओं का अभिन्न हिस्सा हैं। इनके मुख्य कच्चे माल की कीमत बढ़ने का मतलब है कि सरकार यानी करदाता को उस अधोसंरचना के लिए अधिक भुगतान करना पड़ सकता है जिसे वह बनाना चाहती है। समान रूप से महत्त्वपूर्ण यह है कि इनमें से कई डाउनस्ट्रीम कंपनियां निर्यातक भी हैं। ऊंची इनपुट लागतें उनकी वैश्विक बाजारों में मूल्य प्रतिस्पर्धा को कम कर देंगी। यद्यपि नया नियम निर्यातोन्मुखी इकाइयों पर लागू नहीं होता फिर भी यह तनाव और जटिलता पैदा करेगा।

भारत में लगातार पीवीसी की कमी बने रहने के वास्तविक कारणों की जांच आवश्यक है। घरेलू क्षमता वर्षों से मांग से पीछे रही है। इसका कारण केवल सस्ते आयात नहीं हैं बल्कि यह है कि भारत का पीवीसी विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र अभी भी अपर्याप्त है। पीवीसी का उत्पादन एथिलीन की उपलब्धता पर निर्भर करता है जो मूल पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक है जिससे एथिलीन डाइक्लोराइड (ईडीसी) और विनाइल क्लोराइड मोनोमर (वीसीएम) तैयार होते हैं।

भारत में व्यावसायिक एथिलीन की उपलब्धता सीमित है जबकि ईडीसी और वीसीएम का घरेलू उत्पादन भी अपर्याप्त है। इसके चलते  निर्माताओं की आयातित मध्यवर्ती पदार्थों पर भारी निर्भरता रहती है। 

एकीकृत पेट्रोलियम, रसायन और पेट्रोकेमिकल निवेश क्षेत्रों के विकास में देरी ने फीडस्टॉक तक पहुंच को और सीमित कर दिया है और लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ा दी है। स्पष्ट है कि इसका समाधान आयात पर प्रतिबंध लगाने में नहीं, बल्कि घरेलू उत्पादन बढ़ाने में निहित है।

इसके लिए कच्चे माल (फीडस्टॉक) की उपलब्धता में सुधार करना, एकीकृत पेट्रोकेमिकल अवसंरचना विकसित करना, ईडीसी और वीसीएम तक प्रतिस्पर्धी एवं सुगम पहुंच सुनिश्चित करना तथा उत्पादन क्षमता का तेजी से विस्तार करना आवश्यक है। इस प्रकार संरक्षणवाद से होने वाला लाभ केवल कुछ बड़े उत्पादकों तक ही सीमित रहेगा जबकि इससे लागत बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था के अनेक क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

First Published : August 4, 2026 | 9:34 PM IST