सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) और आईटी-सक्षम सेवाओं (आईटीईएस) का निर्यात आधुनिक भारतीय आर्थिक इतिहास की एक उल्लेखनीय सफलता है। यह वह प्रमुख क्षेत्र है जहां भारत ने बड़े पैमाने पर वैश्विक प्रतिस्पर्धा हासिल की है। लेकिन आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) की तीव्र प्रगति ने गिरावट की एक दास्तान को जन्म दिया है। आशंका यह है कि एआई कहीं भारतीय आईटी/आईटीईएस बाजार को खोखला न कर दे।
अब तक के आंकड़ों पर नजर डालें तो सितंबर 2025 तिमाही में अन्य कारोबार सेवाओं के लिए सकल प्रवाह 29.5 अरब डॉलर का रहा जो एक साल पहले की समान तिमाही के 25 अरब डॉलर से काफी अधिक है। आईटी सेवाओं के लिए सितंबर 2025 तिमाही में सकल प्रवाह 50.4 अरब डॉलर तक पहुंच गया जो एक साल पहले 44.7 अरब डॉलर था। अब भविष्य पर नजर डालते हैं और विचार करते हैं कि हालात कैसे बदल सकते हैं।
वर्तमान चिंता का बड़ा हिस्सा उन प्रदर्शनों की वजह से हैं जहां इंजीनियर आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का उपयोग करके तेजी से जटिल प्रणालियां बना रहे हैं। इन स्थानीय सफलताओं को व्यापक आर्थिक उथल-पुथल के रूप में देखने की प्रवृत्ति है। लेकिन तकनीकी प्रदर्शनों और वास्तविक उद्यम प्रणालियों के बीच अंतर करना आवश्यक है। बड़ी संस्थाएं भारी घर्षण के साथ काम करती हैं। उद्यम उपयोगकर्ता काम कर रही प्रणालियों और स्थापित अनुबंधों को बाधित करना पसंद नहीं करते। जब जेपी मॉर्गन एआई लागू करेगा, तो संभव है कि वह टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज को और अधिक काम सौंपे।
गहराई से देखें तो, एक सॉफ्टवेयर प्रणाली का निर्माण ज्ञान सृजन की प्रक्रिया है। हम किसी प्रणाली को उसके निर्माण की मेहनत से समझते हैं। जब कोई एआई प्रणाली कोड उत्पन्न करती है, तो मानव लेखक के मन में होने वाले आवश्यक ज्ञान सृजन को दरकिनार कर दिया जाता है। इससे तकनीकी ऋण और संज्ञानात्मक ऋण पैदा होता है।
ऐसी प्रणालियां नाजुक हो जाती हैं। जब वे विफल होती हैं, तो मानव संचालक के पास उन्हें सुधारने के लिए आवश्यक मानसिक मॉडल नहीं होता। ऐसे में इन प्रणालियों को संशोधित करने के लिए भारी प्रयास की आवश्यकता होती है। एआई-जनित कोड का प्रसार वास्तव में भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियरों के लिए भारी मात्रा में रखरखाव और सुधार का काम सृजित कर सकता है।
भारतीय आईटी कंपनियां कोई एकरूप संस्थान नहीं हैं। विशिष्ट कंपनियों मसलन पर्सिस्टेंट या केपीआईटी आदि ने गहरे क्षेत्रीय ज्ञान और गहन उपभोक्ता संबंधों पर आधारित मॉडल विकसित किए हैं। यह निहित ज्ञान उन्हें कुछ खास क्षेत्रों में एआई तकनीक को अपनाने की इजाजत देता है। एक सामान्य प्रयोजन वाली एआई वैश्विक वाहन उद्योग उद्योग के उन विशिष्ट कार्यप्रवाहों को आसानी से दोहरा नहीं सकती जिन्हें केपीआईटी जैसी फर्म समझती हैं।
इन्फोसिस जैसी बड़ी स्थापित कंपनियों पर विचार कीजिए। ये कंपनियां वैश्विक उद्यमों के संचालन में गहराई से संबद्ध हैं। वे फॉर्च्यून 500 कंपनियों की जटिल तकनीकी संरचना का प्रबंधन करती हैं। कैलीफोर्निया की कोई अग्रणी एआई कंपनी इस बुनियादी ढांचे को आसानी से नहीं हटा सकती। बल्कि, बाजार की गतिशीलता विपरीत दिशा में चलती है।
अग्रणी एआई कंपनियों को वितरण की आवश्यकता होती है। टोकन बिक्री से दैनिक राजस्व प्राप्त करने के लिए उन्हें वैश्विक उद्यमों में अपनाए जाने की जरूरत होती है, और इसका मार्ग भारतीय आईटी दिग्गजों, भारतीय आईटीईएस परिचालनों और भारतीय वैश्विक क्षमता केंद्रों (जीसीसी) से होकर गुजर सकता है, जो वास्तव में वैश्विक दिग्गजों के उद्यम आईटी का संचालन करते हैं।
1980 के दशक के आखिर से ही इस उद्योग ने कई तकनीकी बदलावों को झेला है। क्लाइंट-सर्वर ढांचा, इंटरनेट की तेजी, और क्लाउड कंप्यूटिंग के जरिये रेखांकित करने वाला चर अपरिवर्तित रहा है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में कुशल, किफायती और बौद्धिक क्षमता वाले कामकाजियों की जरूरत है। एआई क्रांति इस बुनियादी बात को नहीं बदलेगी।
यकीनन भारत में बहुत कुछ बदलने की जरूरत है लेकिन यह एक समझदार समुदाय है जो पहले भी कई बदलाव देख चुका है। स्थिति पर दृष्टिकोण बनाए रखना महत्त्वपूर्ण है। वर्तमान में भारतीय आईटी उद्योग वैश्विक आईटी बाजार पूंजीकरण में लगभग 2 फीसदी हिस्सा रखता है। हमें स्थापित कंपनियों के आकार को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बताना चाहिए। मौजूदा अशांत वैश्विक वातावरण में विस्तार के लिए पर्याप्त अवसर मौजूद हैं।
इस तकनीकी क्रांति के दरमियान हमें निराश होने की आवश्यकता नहीं है। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि भारतीय आईटी/आईटी सक्षम सेवाओं/जीसीसी का कोई भविष्य नहीं है। हमें व्यापार रणनीति, बोर्ड, शीर्ष प्रबंधन और वित्तीय दृष्टिकोण के संदर्भ में नए तरीकों से सोचना होगा।
कंपनियों के बोर्ड के लिए, ऐतिहासिक व्यापार मॉडल सीधा था। यह कर्मियों के विस्तार और दीर्घकालिक, वार्षिकी-शैली वाले नकदी प्रवाह पर निर्भर था। वह संतुलन अब टूट चुका है। आने वाले दशक में उभरने वाला भारतीय आईटी उद्योग संरचनात्मक रूप से अलग दिखाई देगा। बोर्ड का काम है ऐसी रणनीति पर विचार करना जो वर्तमान आरामदायक तरीकों से सफलतापूर्वक बदलाव सुनिश्चित करे।
भविष्य अनिश्चितताओं से भरा हुआ है। मजबूत नेतृत्व को संभावनाओं के विस्तृत क्षितिज का गंभीरता से अन्वेषण करना होगा। उद्यम ग्राहक छोटे, निजी भाषा मॉडल की मांग कर सकते हैं, जिन्हें भारतीय विक्रेताओं द्वारा प्रशिक्षित और संचालित किया जाए। भारतीय सॉफ्टवेयर कंपनियां एआई प्रयोगशालाओं के साथ संयुक्त उद्यम बना सकती हैं ताकि उद्यम ग्राहकों के लिए तकनीकों को लागू किया जा सके।
विशेषीकृत कंपनियां अपने-अपने क्षेत्रों में गहराई से साझेदारी कर स्वामित्व वाले उत्पाद बना सकती हैं। हम श्रम विभाजन भी देख सकते हैं, जहां भारतीय कंपनियां एआई जेनरेटर बनाएंगी और साथ ही इंसानी जांच तंत्र भी संचालित करेंगी। संभव है कि यह तकनीकी झटका भारत से उभरने वाली वैश्विक उत्पाद कंपनियों की एक नई पीढ़ी को उत्प्रेरित करे।
इस अनिश्चितता से निपटने के लिए विभिन्न विकल्पों का पोर्टफोलियो विकसित करना और जोखिम उठाना नए प्रकार की कॉरपोरेट शासन की मांग करता है। पारंपरिक आईटी कंपनियों का संगठनात्मक डीएनए स्थिरता, प्रक्रिया पालन और विश्वसनीयता को प्राथमिकता देता है। नया वातावरण नवाचार, प्रयोग और जोखिम उठाने की भूख की मांग करता है। इस बदलाव को साधने के लिए बोर्ड और वरिष्ठ प्रबंधन में सांस्कृतिक परिवर्तन आवश्यक होगा। निवेश और कॉरपोरेट वित्त के दृष्टिकोण से बड़े बदलावों की आवश्यकता है।
ऐतिहासिक रूप से, भारतीय आईटी कंपनियों ने स्थिर यूटिलिटी जैसी वित्तीय विशेषताएं प्रदर्शित की हैं। नकदी को अनुसंधान और विकास में पुनर्निवेश करने के बजाय शेयरधारकों को वितरित करने की प्रवृत्ति रही है। पूंजी आवंटन की इस रणनीति को बदलना होगा। वित्तीय प्रणाली को इन कंपनियों का मूल्यांकन कम-जोखिम वाली यूटिलिटी के रूप में करने से हटकर उन्हें जटिल, अनुकूलनशील, तकनीकी एकीकृत कंपनियों के रूप में देखना होगा।
प्रबंधन टीमों को पूंजी बाजारों के साथ संवाद करने के तरीके बदलने होंगे। बोर्ड को वित्तीय प्रणाली के सामने अपने तकनीकी निवेशों का पोर्टफोलियो प्रस्तुत करना होगा, जिसमें उनके एआई निवेश के जोखिम और संभावित लाभ को स्पष्ट किया जाए।
दुनिया को हमेशा बौद्धिक क्षमता की आवश्यकता रहेगी। वृद्धि की वास्तविक बाधा एल्गोरिद्म की क्षमता नहीं, बल्कि मानव प्रतिभा की उपलब्धता है। भारत का काम है कि वह बौद्धिक पूंजी का उत्पादन, स्वामित्व और विकास दोगुना करे और वह भी ज्ञान तथा नवाचार की मजबूत संस्कृति के उद्भव के साथ।
(लेखक एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता हैं। ये उनके निजी विचार हैं)