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संयुक्त राष्ट्र के 75 वर्ष: बहुपक्षवाद एवं लोकतंत्र

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 14, 2022 | 11:04 PM IST

संयुक्त राष्ट्र ने सितंबर में अपनी स्थापना की 75वीं वर्षगांठ मनाई। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भयानक विनाश लीला के बाद शांति एवं सुरक्षा कायम करने के लिए इसकी स्थापना हुई थी। हालांकि सितंबर में जब संयुक्त राष्ट्र महासभा की वर्चुअल बैठक (ऑनलाइन माध्यम से) शुरू हुई तो माजरा कुछ अलग था। यह आयोजन ऐसे समय में हुआ जब दुनिया कई खेमों में विभाजित दिख रही है। वैश्विक सहयोग पक्षाघात का शिकार हो गया है और विभिन्न देशों में और उनके बीच असुरक्षा और घृणा की भावना का बोलबाला दिख रहा है।
आखिर संयुक्त राष्ट्र का भविष्य क्या है और यह किस दिशा में जा रहा है? मैं यह प्रश्न ऐसे समय में पूछ रही हूं जब हम जानते हैं कि सभी देश एक दूसरे पर निर्भर हैं और शायद ही पहले इतनी निर्भरता दिखी थी। दुनिया इस समय कोविड-19 महामारी से जूझ रही है, जिसने तमाम अर्थव्यवस्था को रौंद दिया है। अगर दुनिया का कोई भी हिस्सा इस वायरस से संक्रमित रहता है तो दूसरे देश भी अपनी खैर नहीं मना सकते। लिहाजा, इसकी रोकथाम और इसके दुष्प्रभाव से निपटने के लिए हमें एक दूसरे का सहयोग चाहिए।
कोविड-19 के बाद जलवायु पर मंडराते संकट के बादल दुनिया के सामने दूसरी गंभीर चुनौती है। यह संकट इतना गंभीर है कि यह राष्ट्रीय संप्रभुता की सीमाओं को कसौटी पर कस रहा है। सभी देश वैश्विक पर्यावरण का हिस्सा हैं और जब तक सभी के लिए समान नियम तैयार नहीं होते हैं तब तक जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर सकारात्मक परिणाम नहीं दिखेंगे। अगर नियम तैयार होंगे तो इन्हें बिना किसी भेदभाव या पूर्वग्रह के लागू करने वाला भी चाहिए। इसके लिए हमें एक ऐसी संस्था की जरूरत है जो इस दिशा में सभी को साथ लेकर काम कर सके।
हालांकि हमें इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र की 75वीं वर्षगांठ पर दुनिया एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। पहली बात, लोकतंत्र की नीव पुख्ता करने वाले पहलू एवं सूचना एवं ज्ञान आधारित बदलाव लाने वाले माध्यम अपनी राह से भटक गए हैं। अब समाज अपने आप में सिमटता जा रहा है और सकारात्मक सूचनाओं एवं ज्ञान के प्रवाह से अनभिज्ञ बनता जा रहा है। लोकतांत्रिक समाज विभाजनकारी शक्तियों के हाथ की कठपुतली बन गया है। यह एक सच्चाई है। जो इन लोकतांत्रिक समाज में रह रहे हैं उन सभी के जीवन पर यह बदलाव प्रभाव डाल रहा है।
कुछ वर्ष पहले हमारे इर्द-गिर्द जो परिस्थितियां पैदा हो रही थीं, उन्हें लेकर मैं चिंतित थी। किसी खास विचार से सहमति रखने वाले लोगों को उनकी पंसद के अनुसार खबरें एवं सूचनाएं दी जा रही थीं। हम उन्हीं चीजों को पढऩा एवं सुनना पसंद करने लगे थे, जो हमारे विचारों के माकूल हुआ करते थे। जो समाचार माध्यम हमें खबर दे रहे थे उनका भी नजरिया सीमित था। गुणवत्ता रहित, सामाजिक सरोकार से दूर और नफरत फैलाने वाली खबरें सुर्खियों में रहने लगीं। यही वजह थी कि हम अधिक असहिष्णु बनते जा रहे थे।
ये बदलाव एक छोटी अवधि में आए हैं। नेटफ्लिक्स की डॉक्यूमेंट्री ‘द सोशल डिलेमा’ में इस बात का चित्रण किया गया है कि किस तरह सोशल मीडिया और इंटरनेट कंपनियां हमारे विचारों को प्रभावित कर रही हैं। हम जो कुछ भी देखते एवं सुनते हैं उन पर लगातार नजर रखी जा रही है। हमें वे चीजें दिखाई या सुनाई देने लगती हैं, जो हम वाकई पसंद करते थे। हालांकि यह बात भी उतना ही सत्य है कि हरेक व्यक्ति कई तथ्यों पर काम करता है और किसी एक के विचारों को सत्य मानना भी उचित नहीं होगा।
हालांकि इस डॉक्युमेंट्री और अन्य शोध में जिस बात की ओर इशारा किया गया है वह वाकई हमारे लिए चिंता की बात है। इनमें इस बात पर रोशनी डाली गई है कि किस तरह हमारे युग की सोशल मीडिया मशीन ध्रुवीकरण के समर्थक लोगों को प्रभावित कर रही है और हमें एक ऐसी सोच की तरफ ले रही है, जो अतिवादी एवं नफरत फैलाने वाली है।
इससे भी दुखद बात यह है कि ऐसी सूचनाओं को लोग अधिक देखना या सुनना पसंद करते है। ऐसी सूचनाएं कंपनियों के लिए राजस्व का स्रोत भी बढ़ा देती हैं। यह सिलसिला थमने वाला नहीं है क्योंकि अब भी हमें लगता है कि इस मशीन का नियंत्रण हमारे हाथों में है। लिहाजा यह बात लगभग तय है कि लोकतंत्र के ये माध्यम इसके खात्मे का कारण बन सकते हैं। दुनिया में गैर-लोकतांत्रिक प्रणाली जोर पकड़ रही है। यह दूसरा बड़ा बदलाव है। यहां मैं चीन का जिक्र करना चाहती हूं। इस बार संयुक्त राष्ट्र में दुनिया के दो बड़े देशों के नेताओं के भाषणों के संदर्भ में एक बड़ी विडंबना दिखी। लोकतांत्रिक देश अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अमेरिका को तरजीह देने पर सारा ध्यान केंद्रित किया तो दूसरी तरफ साम्यवादी देश चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग मानवाधिकारों की दुहाई देते नजर आए।
ऐसे में चीन में राजनीतिक व्यवस्था को अगर किसी भी लिहाज से लोकतांत्रिक माना जाए तो आने वाले समय में यह एक नया चलन हो सकता है। चीन ही नहीं बल्कि कई दूसरे देश और नेता अधिनायकवादी शासन-सत्ता का चोला पहन सकते हैं। यह मौजूदा समय में सक्षम और सफल भी दिख रहा है। चीन वाले हम यह समझा रहे हैं कि किस तरह उन्होंने कोविड-19 संकट पर काबू पा लिया है। यह वायरस भले ही चीन के वुहान से निकला था, लेकिन वहां यह बिल्कुल नियंत्रण में है। संयुक्त राष्ट्र अपनी स्थापना की 75वीं वर्षगांठ पर एक बार उन्हीं परिस्थितियों का सामना कर रहा है, जो दूसरे महायुद्ध के समय दिखा था। इस संस्था की शुरुआत युद्ध के खात्मे से हुई थी और एक बार फिर हम एक नई लड़ाई की ओर बढ़ रहे हैं। अंतर केवल इतना है कि यह लड़ाई अब लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है जैसा कि हम देख एवं समझ पा रहे हैं।

First Published : October 5, 2020 | 11:38 PM IST