Money Management Tips: महंगाई का असर केवल बाजार में बढ़ती कीमतों तक सीमित नहीं होता। यह धीरे-धीरे आपकी बचत, निवेश और भविष्य के वित्तीय लक्ष्यों की वास्तविक कीमत को भी कम करता जाता है। यही वजह है कि वित्तीय विशेषज्ञ महंगाई को अक्सर “साइलेंट वेल्थ डेस्ट्रॉयर” यानी चुपचाप आपकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाला कारक कहते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं ने कई बड़े झटके झेले हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध ने ऊर्जा, खाद्यान्न और उर्वरकों की वैश्विक आपूर्ति को प्रभावित किया। इसके बाद लाल सागर क्षेत्र में बढ़े तनाव और वैश्विक शिपिंग मार्गों में व्यवधान ने माल ढुलाई की लागत बढ़ा दी। हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़ी भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं ने भी कच्चे तेल की कीमतों को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं।
जब तेल महंगा होता है तो परिवहन लागत बढ़ती है। परिवहन महंगा होने से वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ती हैं और अंततः इसका बोझ आम उपभोक्ता पर पड़ता है। यही कारण है कि आज महंगाई केवल किसी एक देश की आर्थिक स्थिति का परिणाम नहीं है, बल्कि वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक घटनाक्रमों से भी गहराई से जुड़ी हुई है।
भारत में खुदरा महंगाई पिछले कुछ समय में अपेक्षाकृत नियंत्रित रही है, लेकिन खाद्य पदार्थों की कीमतों में उतार-चढ़ाव, वैश्विक कमोडिटी कीमतों में बदलाव और अंतरराष्ट्रीय तनाव भविष्य के लिए जोखिम बने हुए हैं। ऐसे माहौल में केवल बैंक खाते में पैसा जमा करके रखना या पारंपरिक बचत साधनों पर पूरी तरह निर्भर रहना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
मान लीजिए आज आपके बच्चे की उच्च शिक्षा पर 20 लाख रुपये का खर्च आने का अनुमान है। यदि शिक्षा क्षेत्र में लागत औसतन 8 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ती है तो 10 साल बाद वही खर्च 40 लाख रुपये से अधिक हो सकता है। इसी तरह स्वास्थ्य सेवाओं, घर खरीदने और रिटायरमेंट की लागत भी समय के साथ तेजी से बढ़ती है।
यदि आपकी बचत या निवेश पर मिलने वाला रिटर्न महंगाई दर से कम है तो वास्तविक रूप से आपकी संपत्ति की कीमत घट रही होती है। बैंक खाते में रकम बढ़ती दिखाई दे सकती है, लेकिन उसकी खरीदने की क्षमता लगातार कम होती जाती है। यही कारण है कि वित्तीय योजना बनाते समय केवल रिटर्न नहीं बल्कि ‘रियल रिटर्न’ यानी महंगाई के बाद बचने वाले रिटर्न को देखना जरूरी होता है।
ऐसे समय में निवेशकों के सामने सबसे बड़ा सवाल होता है कि अपनी मेहनत की कमाई को कैसे सुरक्षित रखा जाए और उसे इस तरह बढ़ाया जाए कि भविष्य के वित्तीय लक्ष्य प्रभावित न हों। इस विषय पर विभिन्न वित्तीय विशेषज्ञों ने अपनी राय साझा की है।
GrowthVine Capital के सह-संस्थापक और CFA शुभम गुप्ता का कहना है कि उच्च महंगाई के दौर में निवेशकों को अपनी निवेश रणनीति पर गंभीरता से पुनर्विचार करने की आवश्यकता होती है।
उनके अनुसार बहुत से निवेशक बैंक एफडी और पारंपरिक बचत योजनाओं को सुरक्षित मानते हैं, लेकिन महंगाई और टैक्स को ध्यान में रखने के बाद इन साधनों से मिलने वाला वास्तविक रिटर्न अक्सर काफी सीमित रह जाता है।
शुभम गुप्ता का मानना है कि लंबी अवधि में महंगाई को मात देने के लिए इक्विटी सबसे महत्वपूर्ण एसेट क्लास बनी हुई है। हालांकि वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि हर प्रकार की कंपनियां ऐसे माहौल में समान प्रदर्शन नहीं करतीं।
उनके मुताबिक मजबूत प्राइसिंग पावर, कम कर्ज और स्थिर नकदी प्रवाह वाली कंपनियां महंगाई और ऊंची ब्याज दरों के दौर में बेहतर स्थिति में रहती हैं। वहीं अत्यधिक विकास पर आधारित और अधिक कर्ज वाली कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए ऐसे समय में वैल्यू इन्वेस्टिंग का दृष्टिकोण अधिक प्रभावी साबित हो सकता है।
शुभम गुप्ता के अनुसार सोना लंबे समय से महंगाई के खिलाफ सुरक्षा देने वाले एसेट के रूप में देखा जाता रहा है। जब शेयर और बॉन्ड बाजारों में अस्थिरता बढ़ती है, तब सोना पोर्टफोलियो को संतुलन प्रदान कर सकता है।
वे सलाह देते हैं कि निवेशकों को अपने कुल पोर्टफोलियो का लगभग 10 से 15 प्रतिशत हिस्सा सोने में रखना चाहिए।
उनके अनुसार REITs उन निवेशकों के लिए अच्छा विकल्प हो सकते हैं जो सीधे संपत्ति खरीदने की जटिलताओं से बचते हुए रियल एस्टेट एक्सपोजर चाहते हैं। चूंकि किराये की आय अक्सर महंगाई के साथ बढ़ती है, इसलिए REITs वास्तविक परिसंपत्तियों में निवेश का व्यावहारिक तरीका बन सकते हैं।
इसके अलावा वे भारतीय निवेशकों को अंतरराष्ट्रीय विविधीकरण पर भी ध्यान देने की सलाह देते हैं। उनका मानना है कि घरेलू महंगाई और रुपये में कमजोरी के दौर में वैश्विक परिसंपत्तियों में निवेश मुद्रा जोखिम के खिलाफ सुरक्षा प्रदान कर सकता है।
AUM Wealth Pvt. Ltd. के संस्थापक और CFP अमित सूरी महंगाई को “साइलेंट वेल्थ डेस्ट्रॉयर” बताते हैं, जो हर साल लोगों की बचत की वास्तविक ताकत को कमजोर करती रहती है।
उनके अनुसार उच्च महंगाई के दौर में निवेशकों को लिक्विडिटी, विकास और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाकर चलना चाहिए। बचत खाते में बड़ी रकम निष्क्रिय छोड़ना समझदारी नहीं है, क्योंकि ऐसे खातों पर मिलने वाला रिटर्न अक्सर महंगाई से कम होता है।
अमित सूरी का कहना है कि विविधीकृत इक्विटी म्युचुअल फंड लंबे समय में महंगाई को मात देने की क्षमता रखते हैं और निवेशकों को अपने वित्तीय लक्ष्यों के अनुसार इनमें निवेश पर विचार करना चाहिए।
वे यह भी मानते हैं कि निश्चित आय वाले निवेश साधनों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि निवेशकों को ऐसे विकल्प चुनने चाहिए जो टैक्स के बाद भी आकर्षक रिटर्न दे सकें।
अमित सूरी की सबसे महत्वपूर्ण सलाह यह है कि निवेशकों को समय-समय पर अपने वित्तीय लक्ष्यों की समीक्षा करनी चाहिए। यदि आय बढ़ रही है तो बचत और निवेश की राशि भी बढ़ानी चाहिए।
उनके अनुसार निवेश का उद्देश्य केवल रिटर्न कमाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि आपकी संपत्ति महंगाई से तेज गति से बढ़े ताकि बच्चों की शिक्षा, घर खरीदने और रिटायरमेंट जैसे लक्ष्य प्रभावित न हों।
Ezeepay के सीनियर अकाउंटेंट आदिल मलिक का कहना है कि महंगाई केवल रोजमर्रा के खर्चों को नहीं बढ़ाती, बल्कि बचत की वास्तविक क्रय शक्ति को भी कम करती है।
उनके अनुसार यदि निवेश पर मिलने वाला रिटर्न महंगाई से कम है तो व्यक्ति वास्तविक रूप से अपनी संपत्ति का मूल्य खो रहा होता है। इसलिए निवेशकों को ऐसे विकल्प चुनने चाहिए जो लंबे समय में महंगाई को मात देने में सक्षम हों।
आदिल मलिक का मानना है कि उच्च महंगाई के दौर में सबसे महत्वपूर्ण रणनीति निवेश में विविधता बनाए रखना है।
वे सलाह देते हैं कि निवेशकों को अपनी पूरी पूंजी किसी एक एसेट क्लास में नहीं लगानी चाहिए। इक्विटी, डेट, बैंक जमा और अन्य वित्तीय साधनों के बीच संतुलन बनाना जोखिम को कम करने में मदद करता है।
उनके अनुसार हर व्यक्ति के पास कम से कम 6 से 12 महीने के आवश्यक खर्चों के बराबर आपातकालीन निधि होनी चाहिए। महंगाई के समय अचानक बढ़ने वाले खर्चों से निपटने में यह फंड बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
आदिल मलिक कहते हैं कि कई निवेशक वर्षों तक अपने निवेश की समीक्षा नहीं करते, जबकि आर्थिक परिस्थितियां लगातार बदलती रहती हैं। ऐसे में नियमित पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग निवेशकों को जोखिम और रिटर्न के बीच बेहतर संतुलन बनाने में मदद कर सकती है।
तीनों विशेषज्ञों की सलाह को एक साथ देखें तो एक बात स्पष्ट होती है कि महंगाई के दौर में केवल बचत करना पर्याप्त नहीं है। निवेशकों को ऐसी रणनीति अपनानी होगी जो उनकी संपत्ति को बढ़ाने के साथ उसकी वास्तविक खरीद क्षमता को भी बनाए रखे।
इसके लिए इक्विटी आधारित निवेश, सोने में सीमित आवंटन, अंतरराष्ट्रीय विविधीकरण, पर्याप्त इमरजेंसी फंड, नियमित पोर्टफोलियो समीक्षा और अनुशासित निवेश की आदत महत्वपूर्ण हैं।
महंगाई को पूरी तरह नियंत्रित करना किसी व्यक्ति के हाथ में नहीं है, लेकिन सही वित्तीय और लंबी अवधि की योजना के जरिए उसके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। जो निवेशक आज से अपनी रणनीति को महंगाई के अनुरूप ढालते हैं, वे भविष्य में अपने वित्तीय लक्ष्यों को अधिक आत्मविश्वास के साथ हासिल कर सकते हैं।