हर साल इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करने का समय आते ही टैक्सपेयर्स के मन में उलझनें शुरू हो जाती हैं। बहुत से लोग जल्दबाजी में फॉर्म भर देते हैं या फिर बिना सोचे-समझे अपनी पुरानी डिटेल्स ही कॉपी कर लेते हैं। लेकिन टैक्स के जानकारों का कहना है कि जरा सी लापरवाही भी टैक्सपेयर्स के लिए भारी पड़ सकती है। इसके चलते कई बार रिफंड अटक जाता है, रिटर्न डिफेक्टिव हो जाता है या फिर सीधे इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से नोटिस तक आ जाता है।
ClearTax से जुड़ी टैक्स एक्सपर्ट CA चांदनी आनंदन का कहना है कि रिटर्न फाइल समय सबसे पहली और बड़ी गलती सही फॉर्म का चुनाव न करना है। कई बार लोग बिना अपनी आय के स्रोतों को समझे कोई भी फॉर्म चुन लेते हैं।
उदाहरण के लिए, कई फ्रीलांसर या कारोबारी अपनी कमाई के लिए ITR-3 या ITR-4 की बजाय गलती से ITR-2 या ITR-1 फाइल कर देते हैं। इसी तरह, जिन नौकरीपेशा लोगों को फ्यूचर एंड ऑप्शन (F&O) ट्रेडिंग से कमाई होती है, वे अक्सर ITR-1 भर देते हैं, जबकि उनके लिए ITR-3 सही होता है।
अगर फॉर्म गलत चुना गया, तो इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की तरफ से डिफेक्टिव रिटर्न का नोटिस आ सकता है, आपका रिफंड लटक सकता है और टैक्स से जुड़ा अतिरिक्त जोखिम भी बढ़ सकता है।
टैक्स एक्सपर्ट बलवंत जैन बताते हैं कि बहुत से नौकरीपेशा लोग सिर्फ अपने दफ्तर से मिले फॉर्म 16 पर ही पूरी तरह आंख मूंदकर भरोसा कर लेते हैं। कई बार ऐसा होता है कि एम्प्लॉयर यानी कंपनी हाउस रेंट अलाउंस (HRA), लीव एनकैशमेंट या ग्रेच्युटी जैसी कई छूट देना भूल जाते हैं। इसके अलावा, कर्मचारियों को मिलने वाले ESOP पर्पस की वैल्यू को भी ठीक से जांचने की जरूरत होती है। अगर आप सिर्फ फॉर्म 16 देखकर ही रिटर्न फाइल कर देंगे, तो आप उन छूटों का फायदा उठाने से चूक जाएंगे, जिनके आप हकदार हैं और आप जरूरत से ज्यादा टैक्स चुका बैठेंगे।
चांदनी आनंदन बताती हैं कि टैक्स फाइल करने से पहले एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS) और Form26AS का मिलान करना बहुत जरूरी है। कई बार लोग TDS क्रेडिट्स चेक करना भूल जाते हैं।
इसके अलावा, बैंक खातों में हुए बड़े ट्रांजैक्शन AIS में तो दिखते हैं, लेकिन लोग उन्हें ITR में दिखाना भूल जाते हैं। ऐसा होने पर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की तरफ से मिसमैच के सवाल उठ सकते हैं, रिफंड मिलने में देरी हो सकती है और आपको नोटिस भी मिल सकता है।
आनंदन के मुताबिक, डिजिटल एसेट्स का क्रेज तेजी से बढ़ा है, लेकिन टैक्स के मोर्चे पर लोग इसमें बड़ी चूक कर देते हैं। Schedule VDA के तहत क्रिप्टोकरेंसी या NFTs से जुड़े हर एक खरीद, बिक्री या स्वैप (swap) की जानकारी देना जरूरी है। क्रिप्टो से होने वाले मुनाफे पर सीधे 30 प्रतिशत की दर से टैक्स लगता है और इसके घाटे को किसी अन्य इनकम के साथ सेट-ऑफ नहीं किया जा सकता है। क्रिप्टो एक्सचेंजों द्वारा साझा किए गए डेटा के आधार पर अगर आपने इसे छिपाया, तो आपको अंडर-रिपोर्टिंग के लिए नोटिस और जुर्माना दोनों मिल सकते हैं।
जैन के मुताबिक, आजकल लोग देश के बाहर भी निवेश करने लगे हैं। अगर किसी के पास विदेशी संपत्तियां हैं, जैसे कि अमेरिकी कंपनियों के ESOP, RSUs, विदेश में बैंक खाते या फिर बाइनेंस (Binance) या कॉइनबेस (Coinbase) जैसे प्लेटफॉर्म्स पर क्रिप्टोकरेंसी की होल्डिंग्स, तो उन्हें ITR में शेड्यूल एफए (Schedule FA) के तहत इसकी जानकारी जरूर देनी चाहिए। मजे की बात यह है कि अगर इन विदेशी खातों या वॉलेट में जीरो (nil) बैलेंस भी है, तब भी कई मामलों में इनकी रिपोर्टिंग करनी पड़ती है। अगर ऐसा नहीं किया गया, तो ब्लैक मनी एक्ट के तहत भारी-भरकम पेनल्टी लग सकती है।
दोनों एक्सपर्ट्स का कहना है कि टैक्सपेयर्स अक्सर बिना सोचे-समझे हर साल एक ही टैक्स व्यवस्था के साथ आगे बढ़ते रहते हैं, जबकि उन्हें फाइलिंग से पहले पुरानी और नई दोनों टैक्स व्यवस्थाओं की तुलना करनी चाहिए।
नई टैक्स व्यवस्था में सरकार कई तरह के फायदे देती है, जैसे कि 75,000 रुपये का स्टैंडर्ड डिडक्शन और कुछ शर्तों के साथ 12 लाख रुपये तक की आय पर मिलने वाली टैक्स छूट। यदि आपने बिना तुलना किए गलत टैक्स व्यवस्था चुन ली, तो आपको अपनी जरूरत से ज्यादा टैक्स चुकाना पड़ सकता है।
कई लोग अपना ITR फॉर्म भरकर निश्चिंत हो जाते हैं कि उनका काम पूरा हो गया है, लेकिन जब तक आप रिटर्न की ई-वेरिफिकेशन प्रक्रिया पूरी नहीं करते, तब तक फाइलिंग अधूरी मानी जाती है। जैन कहते हैं कि नियमों के मुताबिक, ITR सबमिट करने के ठीक 30 दिनों के भीतर उसे ई-वेरिफिकेशन करना जरूरी होता है। अगर इसे छोड़ दिया जाए, तो आपका रिटर्न इनवैलिड घोषित कर दिया जाता है। इसका नतीजा यह होता है आपका रिफंड जारी रूक सकता है या फिर टैक्स डिपार्टमेंट की ओर से कोई मैसेज या ईमेल आ सकता है।