भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अगले कुछ सालों में तेज बदलाव के दौर में प्रवेश कर सकता है। सरकार की सेमीकंडक्टर नीति के दूसरे चरण और मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (MPMS) से देश में सिर्फ मोबाइल असेंबली ही नहीं, बल्कि पूरे इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन को मजबूत करने की तैयारी है। इससे घरेलू कंपनियों की वैल्यू एडिशन बढ़ने, मुनाफे में सुधार आने और भारत की चीन तथा ताइवान पर निर्भरता धीरे धीरे कम होने की उम्मीद है।
मोतीलाल ओसवाल की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार की नई नीतियां आने वाले पांच सालों में भारत में सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग का मजबूत इकोसिस्टम तैयार करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। ब्रोकरेज ने इस सेक्टर में Dixon Technologies, Cyient DLM और Syrma SGS को अपनी टॉप पसंद बताया है।
मोतीलाल ओसवाल की रिपोर्ट के मुताबिक, पहले सेमीकंडक्टर नीति का फोकस मुख्य रूप से चिप बनाने और उनकी पैकेजिंग करने वाली यूनिट लगाने पर था। लेकिन प्रस्तावित 1.27 लाख करोड़ रुपये की Semicon 2.0 योजना का दायरा इससे कहीं बड़ा है। इसका मकसद सिर्फ चिप बनाना नहीं, बल्कि पूरे सेमीकंडक्टर उद्योग की मजबूत नींव तैयार करना है।
नई नीति के तहत चिप बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल, स्पेशलिटी गैस, मॉड्यूल, प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCB) और दूसरे जरूरी कंपोनेंट्स के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया जाएगा। इसके अलावा रिसर्च, नई तकनीक विकसित करने और भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स ब्रांड तैयार करने पर भी जोर रहेगा।
रिपोर्ट का मानना है कि इस बार सिर्फ केंद्र सरकार ही नहीं, बल्कि राज्य सरकारें भी निवेश आकर्षित करने के लिए ज्यादा प्रोत्साहन और वित्तीय मदद दे सकती हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, सिर्फ चिप बनाने की फैक्ट्री लगाने से भारत सेमीकंडक्टर क्षेत्र में आत्मनिर्भर नहीं बन पाएगा। इसके लिए डिजाइन से लेकर चिप बनाने, पैकेजिंग, मॉड्यूल तैयार करने और PCB बनाने तक पूरी सप्लाई चेन को साथ साथ मजबूत करना होगा।
अभी भारत अपनी जरूरत के कई तैयार इलेक्ट्रॉनिक्स मॉड्यूल विदेशों से मंगाता है। ऐसे में मॉड्यूल मैन्युफैक्चरिंग और PCB बनाने के कारोबार में सबसे ज्यादा नए निवेश की संभावना दिखाई दे रही है।
रिपोर्ट के अनुसार Kaynes और Dixon जैसी कंपनियां पहले ही इस क्षेत्र में निवेश बढ़ा रही हैं। आने वाले समय में दूसरे इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट बनाने वाली कंपनियों को भी इसका फायदा मिल सकता है।
मोतीलाल ओसवाल का कहना है कि भारत को फिलहाल सबसे आधुनिक चिप तकनीक में चीन या ताइवान से मुकाबला करने की बजाय 28 नैनोमीटर और उससे बड़े (Legacy Nodes) सेमीकंडक्टर पर ध्यान देना चाहिए। इन्हीं चिप्स का इस्तेमाल ऑटोमोबाइल, घरेलू उपकरण, लैपटॉप, निगरानी सिस्टम और औद्योगिक मशीनों में बड़े पैमाने पर होता है। इनका घरेलू उत्पादन बढ़ने से आयात पर निर्भरता घटेगी और आगे चलकर अत्याधुनिक चिप निर्माण की मजबूत नींव तैयार होगी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि Semicon 2.0 में रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए अलग व्यवस्था की गई है। इससे केवल शैक्षणिक संस्थानों ही नहीं बल्कि निजी सेमीकंडक्टर कंपनियों और स्टार्टअप्स को भी सहायता मिल सकेगी। हालांकि, सिर्फ सरकारी प्रोत्साहन से वैश्विक स्तर का उद्योग तैयार नहीं होगा। इसके लिए चिप डिजाइन, प्रोडक्ट डेवलपमेंट, टेस्टिंग और कमर्शियलाइजेशन में बड़ी संख्या में प्रशिक्षित इंजीनियरों की जरूरत होगी। विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी भी इसमें अहम भूमिका निभाएगी।
रिपोर्ट के अनुसार भारत के पास चिप डिजाइन की अच्छी क्षमता है, लेकिन डिजाइन सॉफ्टवेयर के लिए अभी भी Cadence और Synopsys जैसी वैश्विक कंपनियों पर निर्भरता बनी रहेगी। वहीं, चिप निर्माण में इस्तेमाल होने वाली अत्याधुनिक मशीनें, खासकर लिथोग्राफी उपकरण, अगले पांच सालों तक भी आयात पर निर्भर रह सकते हैं क्योंकि इनकी तकनीक बेहद जटिल है।
रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि वैश्विक स्तर पर मेमोरी चिप्स की कीमतें अगले दो से तीन साल तक ऊंची रह सकती हैं। इसकी वजह यह है कि Samsung, SK Hynix और Micron जैसी कंपनियां नई उत्पादन क्षमता बढ़ा रही हैं, लेकिन नई फैक्ट्री शुरू होने में आमतौर पर तीन से चार साल लग जाते हैं। इसलिए मांग और सप्लाई का संतुलन बनने में अभी समय लगेगा।
रिपोर्ट के मुताबिक रक्षा और सुरक्षा से जुड़े उपकरण भारत के लिए सबसे बड़ा मौका बन सकते हैं। सरकार ने चीनी निगरानी उपकरणों पर सख्ती की है, जिससे अब भारतीय कंपनियों के लिए कैमरा सेंसर, रडार, कम्युनिकेशन सिस्टम और रक्षा उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले चिप बनाने के नए अवसर खुल रहे हैं। ब्रोकरेज का मानना है कि इस क्षेत्र में कंपनियों को बेहतर कमाई का भी मौका मिल सकता है।
मोतीलाल ओसवाल का कहना है कि नई मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम से कंपनियों को अपने ग्राहकों के साथ लंबे समय तक काम करने का मौका मिलेगा। इससे उनकी कमाई पर भी अच्छा असर पड़ सकता है। ब्रोकरेज के मुताबिक इस स्कीम का सबसे ज्यादा फायदा Dixon Technologies और Amber Enterprises जैसी कंपनियों को मिल सकता है। वहीं पूरे इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में ब्रोकरेज की पहली पसंद Dixon Technologies, Cyient DLM और Syrma SGS हैं।
(डिस्क्लेमर: यहां दी गई राय ब्रोकरेज हाउस की है। बिजनेस स्टैंडर्ड इन विचारों से सहमत हो, यह जरूरी नहीं है। निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार की सलाह जरूर लें।)