शहरी भारत में महिलाएं अब अपने वित्तीय फैसलों में पहले से कहीं ज्यादा एक्टिव और आत्मनिर्भर होती जा रही हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, अब आधे से ज्यादा महिलाएं निवेश से जुड़े निर्णय खुद ले रही हैं। हालांकि निवेशकों में आत्मविश्वास तो बढ़ा है, लेकिन मजबूत और ठोस फाइनैंशियल प्लानिंग के मामले में अभी भी एक बड़ा अंतर बना हुआ है। यह तस्वीर DSP म्युचुअल फंड की ‘Winvestor Pulse 2025–26’ रिपोर्ट में सामने आई है, जिसे YouGov के साथ मिलकर तैयार किया गया है।
साल 2025 की चौथी तिमाही में किए गए इस सर्वेक्षण में देश के 13 शहरों के 5,050 लोगों को शामिल किया गया। सभी प्रतिभागी 25 से 60 वर्ष आयु वर्ग के थे और अपने परिवार के निवेश संबंधी फैसलों में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। अध्ययन में पुरुष और महिलाओं की संख्या बराबर रखी गई और इसका फोकस मुख्य रूप से शहरी, अपेक्षाकृत उच्च सामाजिक-आर्थिक वर्ग के परिवारों पर रहा।
रिपोर्ट की सबसे प्रमुख बात यह है कि निवेश के फैसलों में महिलाओं की स्वतंत्र भागीदारी तेजी से बढ़ रही है। सर्वे के अनुसार अब 56 फीसदी महिलाएं निवेश से जुड़े फैसले खुद ले रही हैं, जबकि 2022 में यह आंकड़ा 44 फीसदी था। यानी महज तीन साल में इसमें 12 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। वहीं, इसकी तुलना में 2025 में 68 फीसदी पुरुष भी निवेश के फैसले स्वतंत्र रूप से लेने की बात कहते हैं।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि खुद सीखकर निवेश करने वाली महिलाओं की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है। अब करीब 16 फीसदी महिला निवेशकों का कहना है कि उन्होंने निवेश के बारे में स्वयं सीखा है, जो 2022 में 13 फीसदी था। वहीं निवेश के मामलों में संयुक्त रूप से फैसले लेने वाली महिलाओं का हिस्सा 52 फीसदी से घटकर 43 फीसदी रह गया है।
साथ ही महिलाएं अब बाजार से जुड़े निवेश उत्पादों (market-linked products) में भी ज्यादा एक्टिव हो रही हैं। लगभग 51 फीसदी महिलाएं अब म्युचुअल फंड और शेयरों में स्वतंत्र रूप से निवेश कर रही हैं, जबकि तीन साल पहले यह आंकड़ा 39 फीसदी था।
निवेश में भागीदारी और स्वतंत्रता बढ़ने के बावजूद रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि निवेशकों के आत्मविश्वास और वित्तीय अनुशासन के बीच अभी भी बड़ा अंतर बना हुआ है। सर्वे के मुताबिक 84 फीसदी लोग मानते हैं कि वे निवेश के फैसले खुद लेने के लिए पर्याप्त आत्मविश्वास रखते हैं, लेकिन सिर्फ एक-तिहाई (33 फीसदी) ऐसे हैं जिनके पास एकदम साफ फाइनैंशियल प्लानिंग और उसे हासिल करने की ठोस योजना दोनों मौजूद हैं।
बाकी निवेशक अधूरी योजना की अलग-अलग कैटेगरी में आते हैं:
यह योजना का अंतर खासकर 25–34 वर्ष की युवा महिलाओं में ज्यादा दिखाई देता है, जहां कई महिलाएं निवेश की योजना तो बनाती हैं, लेकिन उनके लक्ष्य स्पष्ट रूप से तय नहीं होते।
अध्ययन यह भी दिखाता है कि शहरी भारत में लोगों की नजर में पैसे का मतलब भी धीरे-धीरे बदल रहा है। 2022 में जहां 27 फीसदी लोग पैसे को ‘आजादी’ से जोड़ते थे, वहीं अब यह आंकड़ा बढ़कर 35 फीसदी हो गया है। इसके विपरीत, पैसे को ‘जीविका’ या ‘जरूरत’ से जोड़ने वालों का हिस्सा घटा है। सर्वे में करीब 48 फीसदी लोगों ने कहा कि वे मुख्य रूप से वित्तीय स्वतंत्रता और सुरक्षा हासिल करने के लिए निवेश करते हैं, जो पहले 44 फीसदी था।
खासकर महिलाओं के बीच अब पैसे को सिर्फ वित्तीय स्थिरता तक सीमित नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे सुरक्षा, बेहतर जीवनशैली और लग्जरी से जुड़ी आकांक्षाओं के साथ भी जोड़ा जा रहा है।
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निवेश व्यवहार में एक अहम बदलाव यह भी देखने को मिल रहा है कि लोग पारंपरिक संपत्तियों की बजाय अनुभवों को ज्यादा महत्व देने लगे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 41 फीसदी महिलाएं घर खरीदने की बजाय यात्रा को प्राथमिकता दे रही हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 34 फीसदी है। छुट्टियों पर खर्च भी तेजी से बढ़ा है। 2025 में 43 फीसदी लोगों ने अतिरिक्त पैसे का इस्तेमाल यात्रा के लिए किया, जबकि 2022 में यह हिस्सा 36 फीसदी था।
वहीं घर खरीदने को सबसे बड़ा सपना मानने वालों का हिस्सा 36 फीसदी से घटकर 28 फीसदी रह गया है। खास तौर पर 25 से 44 वर्ष की महिलाओं में यात्रा और जीवनशैली से जुड़े अनुभवों की चाह सबसे ज्यादा दिखाई देती है।
अध्ययन से पता चलता है कि जो निवेशक वित्तीय सलाहकारों (financial advisors) की मदद लेते हैं, वे उनसे काफी संतुष्ट हैं, लेकिन इसके बावजूद सलाहकारों का उपयोग अभी भी सीमित है।
करीब 94 फीसदी निवेशकों ने कहा कि वे अपने वित्तीय सलाहकार की सेवाओं से संतुष्ट हैं। फिर भी कई लोग पेशेवर सलाह लेने से बचते हैं, जिसका मुख्य कारण गोपनीयता को लेकर चिंता है।
जो लोग सलाहकारों की मदद नहीं लेते, उनमें:
निवेश से जुड़े फैसलों में परिवार और दोस्तों की भूमिका अब भी सबसे अहम बनी हुई है। सर्वे के अनुसार 76 फीसदी लोग निवेश के मामलों में अपने सामाजिक दायरे से सलाह लेते हैं। हालांकि, पेशेवर सलाहकारों से परामर्श लेने का चलन धीरे-धीरे बढ़ रहा है, खासकर महिलाओं के बीच।
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अध्ययन से यह भी स्पष्ट होता है कि निवेश से जुड़ी चर्चाओं और फैसलों में सोशल मीडिया की भूमिका तेजी से बढ़ रही है, खासकर महिलाओं के बीच।
शेयर बाजार में निवेश करने वाली महिलाओं में 51 फीसदी सोशल मीडिया पर स्टॉक से जुड़े कंटेंट पर एक्टिव रूप से पोस्ट या टिप्पणी करती हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 36 फीसदी है। इस तरह की गतिविधियों के लिए इंस्टाग्राम सबसे लोकप्रिय मंच बनकर उभरा है, जहां 70 फीसदी महिला निवेशक स्टॉक से जुड़े कंटेंट का इस्तेमाल करती हैं।
महिलाओं के निवेश की शुरुआत में जीवनसाथी अब भी सबसे बड़ा माध्यम बने हुए हैं। सर्वे के मुताबिक 23 फीसदी महिलाओं को निवेश और वित्तीय उत्पादों के बारे में सबसे पहले उनके जीवनसाथी ने बताया। इसके बाद खुद सीखने और माता-पिता के प्रभाव की भूमिका आती है।
निवेश के क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) तेजी से चर्चा में आ रहा है, लेकिन इस पर निवेशकों का भरोसा अभी पूरी तरह से मजबूत नहीं हुआ है। सर्वे में करीब 46 फीसदी लोगों ने एआई आधारित निवेश प्लेटफॉर्म को लेकर डेटा गोपनीयता को सबसे बड़ी चिंता बताया। वहीं 55 फीसदी लोगों का मानना है कि एआई आधारित सलाहकार निवेश के फैसले ज्यादा निष्पक्ष तरीके से ले सकते हैं।
हालांकि निवेशकों का भरोसा बढ़ाने के लिए प्लेटफॉर्म को कुछ अहम बातों पर ध्यान देना होगा, जैसे:
सर्वे यह भी दिखाता है कि म्युचुअल फंड में निवेश करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। अब करीब 46 फीसदी लोग म्युचुअल फंड में निवेश कर रहे हैं, जबकि 2022 में यह आंकड़ा 38 फीसदी था। अध्ययन में शामिल वित्तीय उत्पादों में यह सबसे बड़ी बढ़ोतरी है। हालांकि इसमें लिंग के आधार पर अंतर अभी भी बना हुआ है। 48 फीसदी पुरुष म्युचुअल फंड में निवेश करते हैं। जबकि 44 फीसदी महिलाएं ऐसा करती हैं।
इक्विटी यानी शेयर बाजार में निवेश के मामले में यह अंतर और ज्यादा दिखाई देता है। 44 फीसदी पुरुष शेयरों में निवेश करते हैं, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा 37 फीसदी है।
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पॉजिटिव बात यह है कि बाजार में उतार-चढ़ाव के दौरान ज्यादातर निवेशक धैर्य बनाए रखते हैं। सर्वे के मुताबिक 62 फीसदी से ज्यादा म्युचुअल फंड निवेशकों ने कहा कि बाजार गिरने पर भी वे निवेश जारी रखेंगे। हालांकि गिरावट के समय पुरुष निवेशक थोड़े ज्यादा आक्रामक नजर आते हैं। करीब 15 फीसदी पुरुषों ने कहा कि वे बाजार गिरने पर निवेश बढ़ा देंगे, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा 10 फीसदी है। वहीं दूसरी ओर महिलाएं कर्ज आधारित (डेट) म्युचुअल फंड और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF) जैसे अपेक्षाकृत स्थिर विकल्पों को ज्यादा पसंद करती हैं।
अध्ययन की एक अहम बात यह भी सामने आई है कि शहरी निवेशकों के बीच लंबी अवधि के निवेश (लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टिंग) को लेकर अब भी काफी भ्रम है।
सर्वे में करीब आधे उत्तरदाताओं ने तीन साल या उससे कम अवधि को ही ‘लंबी अवधि का निवेश’ माना। इससे संकेत मिलता है कि कई निवेशकों की बाजार चक्र और संपत्ति निर्माण की समयसीमा को लेकर अपेक्षाएं अभी भी पूरी तरह यथार्थवादी नहीं हैं।
कुल मिलाकर रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि भारत में निवेशकों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। महिलाएं निवेश की दुनिया में पहले से ज्यादा सक्रिय और स्वतंत्र भागीदार बन रही हैं। साथ ही लोगों की आकांक्षाएं भी बदल रही हैं- अब फोकस वित्तीय आजादी और अनुभवों पर ज्यादा है। तकनीक भी यह तय करने में बड़ी भूमिका निभा रही है कि लोग निवेश के बारे में कैसे सीखते हैं और उस पर चर्चा करते हैं।
हालांकि सबसे बड़ी चुनौती अभी भी वित्तीय अनुशासन को मजबूत करना और आत्मविश्वास तथा व्यवस्थित वित्तीय योजना के बीच के अंतर को कम करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में तेजी से बढ़ रहे खुदरा निवेशकों के लिए लंबी अवधि में संपत्ति बनाने के लिहाज से यह बदलाव बेहद महत्वपूर्ण होगा।