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Disinvestment Strategy: 1991 से अब तक कितना बदला सरकार का खेल? LIC OFS से समझिए विनिवेश की पूरी कहानी

रणनीतिक निजीकरण की जटिलताओं के कारण सरकार अब नियंत्रण बनाए रखते हुए OFS के जरिए हिस्सेदारी बेचने पर ज्यादा जोर दे रही है।

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रिमझिम सिंह   
Last Updated- August 11, 2026 | 2:58 PM IST

केंद्र सरकार ने पिछले सप्ताह Life Insurance Corporation of India (LIC) में अपनी हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया Offer for Sale यानी OFS के जरिए पूरी कर ली। इस बिक्री के साथ सरकार अपने वित्त वर्ष 2026-27 के 80,000 करोड़ रुपये के विनिवेश लक्ष्य के करीब पहुंच रही है। साथ ही, इस हिस्सेदारी बिक्री से LIC को शेयर बाजार में न्यूनतम सार्वजनिक हिस्सेदारी (MPS) से जुड़े Securities and Exchange Board of India (SEBI) के नियमों को पूरा करने में भी मदद मिली है।

इस OFS में सरकार ने शुरुआत में LIC की 2.5 फीसदी हिस्सेदारी बेचने की पेशकश की थी। इसके अलावा 4 फीसदी तक अतिरिक्त हिस्सेदारी बेचने का विकल्प रखा गया था। इस तरह कुल ऑफर का आकार 6.5 फीसदी तक पहुंच गया।

LIC की यह हिस्सेदारी बिक्री पिछले तीन दशकों में भारत की विनिवेश नीति में आए बदलाव को भी दिखाती है। 1991 में आर्थिक उदारीकरण के बाद सरकार की रणनीति कई बार बदली है। शुरुआत में सरकार ने कुछ सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचने के साथ निजी क्षेत्र को प्रबंधन नियंत्रण देने की कोशिश की। वहीं अब सरकार अधिकतर कंपनियों में अपना नियंत्रण बनाए रखते हुए धीरे-धीरे हिस्सेदारी बेचने पर जोर दे रही है।

1991 से पहले क्या थी सरकार की नीति?

1991 के आर्थिक सुधारों से पहले भारत की अर्थव्यवस्था में सरकारी कंपनियों की भूमिका काफी बड़ी थी। सरकार कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कंपनियों की मालिक होने के साथ-साथ उनका संचालन भी करती थी।

इस नीति की नींव 1956 की औद्योगिक नीति में रखी गई थी। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र को अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों में बड़ी भूमिका दी गई थी। उस समय 17 उद्योग ऐसे थे, जिन्हें मुख्य रूप से सरकारी क्षेत्र के लिए आरक्षित रखा गया था।

सरकार का मानना था कि सार्वजनिक क्षेत्र के जरिए देश में उद्योग, बुनियादी ढांचे और आर्थिक विकास को बढ़ावा दिया जा सकता है। इसलिए उस समय सरकारी कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी कम करना कोई प्रमुख लक्ष्य नहीं था।

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1991 में क्यों बदली तस्वीर?

1991 में देश गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था। इसके बाद सरकार ने बड़े आर्थिक सुधार शुरू किए और अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे निजी क्षेत्र और विदेशी निवेश के लिए खोला गया।

इसके तहत सरकारी क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या कम की गई। सरकार ने चुनिंदा सरकारी कंपनियों में अपनी कुछ हिस्सेदारी बेचने का फैसला भी किया।

सरकार ने इन कंपनियों के शेयर वित्तीय संस्थानों, म्यूचुअल फंड, कर्मचारियों और दूसरे निवेशकों को बेचने की शुरुआत की। इसके बाद 1991-92 में भारत में औपचारिक रूप से विनिवेश की प्रक्रिया शुरू हुई।

यहीं से सरकार की उस नीति की शुरुआत हुई, जिसमें सरकारी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी धीरे-धीरे कम करके पैसा जुटाने पर जोर दिया गया।

सरकार की विनिवेश नीति में कैसे आया बदलाव?

भारत में विनिवेश की प्रक्रिया 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद शुरू हुई और पिछले तीन दशकों में इसके तरीके में कई बड़े बदलाव आए हैं। शुरुआत में सरकार सरकारी कंपनियों में अपनी छोटी हिस्सेदारी बेचकर पैसा जुटाती थी। बाद में एक दौर ऐसा भी आया जब सरकार ने कंपनियों का प्रबंधन और नियंत्रण निजी कंपनियों को सौंप दिया। अब सरकार का ज्यादा जोर OFS यानी Offer for Sale के जरिए हिस्सेदारी बेचने पर है, जबकि कंपनी का नियंत्रण अपने पास ही रखा जाता है।

1991 से 2000 तक छोटी हिस्सेदारी बेचने पर जोर

1991 से 2000 के बीच सरकार ने मुख्य रूप से सरकारी कंपनियों में अपनी छोटी हिस्सेदारी बेची। इस दौरान करीब 20,000 करोड़ रुपये जुटाए गए।

इस दौर में मारुति उद्योग, जिसे अब मारुति सुजुकी के नाम से जाना जाता है, में हिस्सेदारी बिक्री हुई। वहीं Videsh Sanchar Nigam Limited यानी VSNL में भी निजी निवेश का रास्ता खोला गया। VSNL को बाद में टाटा समूह ने अपने नियंत्रण में लिया और अब यह Tata Communications के नाम से जानी जाती है।

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2000 के दशक में बदली रणनीति

विनिवेश नीति में बड़ा बदलाव अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय देखने को मिला। सरकार ने केवल कुछ शेयर बेचने के बजाय चुनिंदा सरकारी कंपनियों का प्रबंधन और नियंत्रण भी निजी क्षेत्र को देना शुरू किया।

इस दौरान हिंदुस्तान जिंक और Bharat Aluminium Company यानी BALCO में सरकार ने अपनी नियंत्रक हिस्सेदारी बेची। BALCO की हिस्सेदारी Sterlite Group को और VSNL का नियंत्रण Tata Group को दिया गया।

सरकार ने Indian Petrochemicals जैसी कंपनियों में भी अपनी हिस्सेदारी कम की और स्टील व पावर क्षेत्र की कुछ सरकारी इकाइयों में पुनर्गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई।

2010 के बाद शेयर बाजार पर बढ़ा भरोसा

2010 के बाद सरकार ने सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचने के लिए शेयर बाजार का इस्तेमाल ज्यादा करना शुरू किया। कंपनियों को शेयर बाजार में लिस्ट कराने और बाद में उनकी हिस्सेदारी बेचने का तरीका तेजी से बढ़ा।

Coal India का 2010 का IPO इसका बड़ा उदाहरण रहा, जिससे करीब 15,000 करोड़ रुपये जुटाए गए। इसके बाद 2014 में CPSE ETF और 2017 में Bharat 22 ETF लॉन्च किए गए। इन माध्यमों के जरिए भी सरकार ने सरकारी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी को निवेशकों के बीच बेचा।

विनिवेश से सरकार को कितनी रकम मिली?

Department of Investment and Public Asset Management यानी DIPAM के आंकड़ों के मुताबिक, विनिवेश से मिलने वाली रकम में अलग-अलग वर्षों में काफी उतार-चढ़ाव रहा है।

FY15 में सरकार ने 24,349 करोड़ रुपये जुटाए थे। FY18 में यह रकम बढ़कर रिकॉर्ड 1,00,037 करोड़ रुपये हो गई। इसके बाद FY19 में सरकार को 84,972 करोड़ रुपये और FY20 में 50,300 करोड़ रुपये मिले।

कोरोना महामारी के दौरान विनिवेश की रफ्तार धीमी हुई। FY21 में सरकार ने 32,886 करोड़ रुपये जुटाए। FY22 में यह रकम घटकर 13,534 करोड़ रुपये रह गई। इसी साल Air India की बिक्री भी पूरी हुई।

इसके बाद FY23 में विनिवेश से 35,294 करोड़ रुपये मिले। FY24 में यह आंकड़ा 16,507 करोड़ रुपये और FY25 में 10,163 करोड़ रुपये रहा।

FY26 में सरकार ने 16,886 करोड़ रुपये जुटाए। वहीं FY27 में अब तक विनिवेश से करीब 20,391 करोड़ रुपये मिल चुके हैं। इसमें OFS के जरिए हुई हिस्सेदारी बिक्री की बड़ी भूमिका है।

अब OFS पर ज्यादा जोर

हाल के वर्षों में सरकार ने OFS के जरिए सरकारी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी कम करने पर ज्यादा भरोसा किया है। इस तरीके में सरकार शेयर बेचती है, लेकिन कंपनी का बहुमत नियंत्रण अपने पास रखती है।

NHPC, Coal India और Indian Railway Finance Corporation जैसी कंपनियों में भी सरकार ने OFS के जरिए हिस्सेदारी बेची है।

इस रणनीति से सरकार को सरकारी कंपनियों का नियंत्रण छोड़े बिना पैसा जुटाने का मौका मिलता है।

BPCL और IDBI Bank जैसे सौदे अब भी बाकी

सरकार की रणनीतिक विनिवेश योजना में कुछ बड़े सौदे अभी भी लंबित हैं। इनमें Bharat Petroleum Corporation Limited यानी BPCL का निजीकरण और IDBI Bank में सरकार की हिस्सेदारी बिक्री प्रमुख है।

सरकार ने 2019 में BPCL के निजीकरण को मंजूरी दी थी। वहीं Shipping Corporation of India की बिक्री को भी प्रबंधन नियंत्रण निजी हाथों में देने की योजना के साथ मंजूरी मिली थी। IDBI Bank को भी रणनीतिक बिक्री के लिए चुना गया था।

हालांकि इन सौदों को पूरा करने में कई तरह की अड़चनें आई हैं। कंपनी की सही कीमत तय करना, नियामकीय मंजूरी, जांच-पड़ताल की प्रक्रिया और सही खरीदार ढूंढने जैसी वजहों से इनकी प्रक्रिया में देरी हुई है।

सरकार की विनिवेश रणनीति में बदलाव क्यों आया?

विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत की विनिवेश नीति में समय के साथ बड़ा बदलाव आया है। 1991 के बाद सरकार ने मुख्य रूप से राजकोषीय जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकारी कंपनियों में अपनी छोटी हिस्सेदारी बेचनी शुरू की। इसके जरिए सरकार को बिना कर्ज लिए पैसा जुटाने में मदद मिली।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी (NIPFP) की प्रोफेसर लेखा चक्रवर्ती के अनुसार, 1991 के बाद हिस्सेदारी बिक्री का मुख्य उद्देश्य भुगतान संतुलन संकट के बाद सरकारी वित्तीय स्थिति को संभालना था। हालांकि, 1999 से 2004 के बीच सरकार ने रणनीतिक निजीकरण की दिशा में कदम बढ़ाया। इस दौरान कुछ सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी के साथ प्रबंधन का नियंत्रण भी निजी क्षेत्र को दिया गया। इससे कंपनियों की कार्यक्षमता में सुधार देखने को मिला।

लेकिन राजनीतिक विरोध के कारण यह प्रक्रिया ज्यादा आगे नहीं बढ़ सकी। 2004 के बाद सरकार फिर से सरकारी कंपनियों में अपनी छोटी हिस्सेदारी बेचने की नीति की ओर लौट आई। हालांकि 2021 की सार्वजनिक क्षेत्र की नीति में सरकार की कारोबारी भूमिका कम करने की बात कही गई थी, लेकिन व्यवहार में विनिवेश का बड़ा हिस्सा अभी भी सरकार की आय और बजट लक्ष्य से जुड़ा रहा।

NFPRC Foundation के Centre for Law, Policy and Governance के टीम लीड रितिक भंडारी के मुताबिक, 1990 के दशक में विनिवेश मुख्य रूप से सरकार की वित्तीय जरूरतों से जुड़ा था। इसके बाद वाजपेयी सरकार के दौर में रणनीतिक निजीकरण पर जोर दिया गया। 2014 के बाद विनिवेश के लिए एक ज्यादा व्यवस्थित ढांचा तैयार किया गया, जिसमें DIPAM की भूमिका और 2021 की सार्वजनिक क्षेत्र की नीति अहम रही।

LIC का IPO और उसके बाद OFS के जरिए हिस्सेदारी बिक्री सरकार की सावधानीपूर्ण रणनीति को दिखाती है। सरकार ने LIC जैसी महत्वपूर्ण बीमा कंपनी का नियंत्रण निजी क्षेत्र को सौंपने के बजाय धीरे-धीरे अपनी हिस्सेदारी कम करने का रास्ता चुना। इससे सरकार को बाजार के जरिए पैसा जुटाने का मौका मिलता है, जबकि कंपनी में उसका बहुमत नियंत्रण बना रहता है।

इस तरह 2014 के बाद सरकार की विनिवेश नीति में रणनीतिक निजीकरण और धीरे-धीरे हिस्सेदारी घटाने, दोनों का मिश्रण देखने को मिला है। हालांकि कई बार विनिवेश से मिलने वाली रकम सरकार के बजट लक्ष्य से कम रही है।

रणनीतिक निजीकरण की रफ्तार क्यों हुई धीमी?

रणनीतिक विनिवेश में सरकार किसी सरकारी कंपनी की बड़ी हिस्सेदारी के साथ उसका प्रबंधन नियंत्रण भी निजी कंपनी को सौंपती है। वहीं, OFS, IPO, बायबैक और ETF जैसे तरीकों में सरकार सिर्फ अपनी कुछ हिस्सेदारी बेचती है और कंपनी का नियंत्रण अपने पास रखती है।

रणनीतिक निजीकरण की प्रक्रिया आसान नहीं होती। इसमें कंपनी की सही कीमत तय करना, कर्ज से जुड़े मामलों को सुलझाना, कर्मचारियों की चिंताओं पर विचार करना, नियामकीय मंजूरी लेना और सही खरीदार तलाशना जैसी कई चुनौतियां होती हैं। इसके अलावा ऐसे सौदों को राजनीतिक विरोध का भी सामना करना पड़ सकता है।

विशेषज्ञ लेखा चक्रवर्ती के मुताबिक, सरकार का OFS को प्राथमिकता देना इन चुनौतियों को देखते हुए स्वाभाविक है। ट्रेड यूनियनों का विरोध, कंपनी की वैल्यूएशन को लेकर मतभेद, अलग-अलग मंत्रालयों के बीच तालमेल और खरीदार ढूंढने में देरी जैसी वजहों से रणनीतिक बिक्री कई बार अटक जाती है। इसके मुकाबले OFS के जरिए सरकार बिना नियंत्रण छोड़े अपेक्षाकृत आसानी से पैसा जुटा सकती है।

BPCL, Shipping Corporation of India और IDBI Bank के निजीकरण में हुई देरी इसके उदाहरण हैं। ऐसे में सरकार ने Coal India, Central Bank of India, NHPC, NLC India, GIC और Indian Railway Finance Corporation जैसी कंपनियों में OFS के जरिए हिस्सेदारी बेचने पर ज्यादा भरोसा किया है।

लंबे समय के लक्ष्य पर क्या असर?

माइनॉरिटी हिस्सेदारी बेचने से सरकार को पैसा मिलता है और शेयर बाजार में कंपनी के शेयरों की उपलब्धता बढ़ती है। इससे शेयर की कीमत तय होने की प्रक्रिया भी बेहतर होती है। लेकिन इससे कंपनी के कामकाज और प्रबंधन में बड़ा बदलाव जरूरी नहीं आता।

विशेषज्ञों के मुताबिक, असली कार्यक्षमता में सुधार उन मामलों में ज्यादा देखने को मिला है, जहां कंपनी की हिस्सेदारी के साथ उसका प्रबंधन नियंत्रण भी निजी क्षेत्र को सौंपा गया।

वहीं, सरकारी कंपनियों में सरकार की बड़ी हिस्सेदारी बनी रहने से बड़ी मात्रा में सार्वजनिक पूंजी इन कारोबारी कंपनियों में लगी रहती है। इससे 2021 की उस नीति का लक्ष्य भी सीमित हो जाता है, जिसमें अर्थव्यवस्था में सरकार की कारोबारी भूमिका कम करने की बात कही गई थी।

First Published : August 11, 2026 | 2:56 PM IST