प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
सरकारी नौकरी में मिलने वाले भत्तों को लेकर कर्मचारियों के मन में अक्सर कई सवाल रहते हैं। ऐसा ही एक सवाल उन पति-पत्नी के सामने आता है, जो दोनों केंद्र सरकार के कर्मचारी हैं और एक ही शहर में तैनात हैं। सवाल यह है कि अगर पति या पत्नी में से किसी एक को सरकारी मकान मिला हुआ है, तो क्या दूसरा कर्मचारी HRA यानी हाउस रेंट अलाउंस ले सकता है?
इस मामले में सरकार ने संसद में अपनी स्थिति साफ कर दी है। राज्यसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में वित्त मंत्रालय ने बताया कि अगर पति या पत्नी में से किसी एक को संबंधित शहर में सरकारी आवास आवंटित है, तो पूरे परिवार को सरकारी आवास की सुविधा मिली हुई माना जाएगा। ऐसे में पति-पत्नी में से किसी भी कर्मचारी को HRA का फायदा नहीं मिलेगा। इसकी वजह यह है कि परिवार को निजी मकान किराए पर लेने के लिए अलग से कोई खर्च नहीं करना पड़ रहा है।
वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने राज्यसभा में एक लिखित सवाल के जवाब में इस नियम की वजह भी साफ की। सरकार के मुताबिक, हाउस रेंट अलाउंस यानी HRA कर्मचारी की सैलरी का कोई अतिरिक्त हिस्सा नहीं है। यह सिर्फ उन कर्मचारियों को दिया जाने वाला भरपाई भत्ता है, जिन्हें सरकारी मकान नहीं मिल पाता और उन्हें निजी मकान का किराया अपनी जेब से देना पड़ता है।
सरकार का कहना है कि जब पति और पत्नी दोनों एक ही स्टेशन पर तैनात हों और उनमें से किसी एक को सरकारी क्वार्टर मिल जाए, तो नियमों के तहत पूरे परिवार को सरकारी आवास की सुविधा मिली हुई मानी जाती है।
ऐसी स्थिति में परिवार पहले से ही सरकारी मकान में रह रहा होता है और दूसरे पार्टनर को अलग से किराए का कोई खर्च नहीं उठाना पड़ता। इसलिए जब किराए पर कोई अतिरिक्त खर्च हो ही नहीं रहा है, तो दूसरे कर्मचारी को HRA देने का कोई कानूनी या नैतिक आधार नहीं बनता।
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कर्मचारी संगठनों और ट्रेड यूनियन्स की ओर से अक्सर यह दलील दी जाती रही है कि पति और पत्नी दोनों अलग-अलग कर्मचारी हैं। वे अपनी-अपनी सेवाएं सरकार को देते हैं, इसलिए उन्हें मिलने वाले भत्ते भी व्यक्तिगत आधार पर तय किए जाने चाहिए। हालांकि, सरकार ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया है।
वित्त मंत्रालय ने संसद को बताया कि इस नीति में बदलाव या दोबारा विचार करने को लेकर केंद्रीय कर्मचारियों या उनके संगठनों की ओर से उसे कोई आधिकारिक मांग या आवेदन नहीं मिला है।
जब सरकार से सीधे पूछा गया कि क्या वह इस नियम में कोई बदलाव करने जा रही है, ताकि दंपतियों के लिए यह व्यवस्था ज्यादा व्यावहारिक या सुविधाजनक हो सके, तो सरकार का जवाब साफ तौर पर ‘ना’ था। यानी फिलहाल इस नियम में किसी बदलाव की उम्मीद नहीं है और आने वाले समय में भी यह व्यवस्था इसी तरह लागू रहेगी।
इस फैसले के बाद यह समझना भी जरूरी है कि अलग-अलग परिस्थितियों में HRA के नियम कैसे लागू होते हैं। अगर पति और पत्नी दोनों में से किसी को भी सरकारी आवास नहीं मिला है और वे निजी किराए के मकान में रह रहे हैं, तो तय नियमों और शर्तों के तहत दोनों HRA का दावा कर सकते हैं।
वहीं, अगर पति और पत्नी दोनों केंद्र सरकार के कर्मचारी हैं, लेकिन उनकी पोस्टिंग अलग-अलग शहरों या स्टेशनों पर है, तो उनके HRA की एलिजिबिलिटी उनके रहने के खर्च और लागू नियमों के आधार पर तय होगी। ऐसी स्थिति में दोनों अलग-अलग जगहों पर रह रहे हैं, इसलिए नियमों के मुताबिक दोनों को HRA मिल सकता है।
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भले ही विवाहित केंद्रीय कर्मचारियों के लिए HRA के नियमों में कोई बदलाव नहीं किया गया है, लेकिन शहरों की श्रेणी में हुए हालिया बदलावों की वजह से HRA की दरों में जरूर हल्का बदलाव हुआ है। सरकार ने नए जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर शहरों की सूची अपडेट की है। इसके चलते कई शहरों की श्रेणी भी बदल गई है।
फिलहाल शहरों की श्रेणी के आधार पर केंद्रीय कर्मचारियों को तीन अलग-अलग दरों पर HRA दिया जाता है। X श्रेणी के बड़े और मेट्रो शहरों में तैनात कर्मचारियों को उनके बेसिक पे का 30 प्रतिशत HRA मिलता है। Y श्रेणी के मध्यम आकार के शहरों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए HRA की दर 20 प्रतिशत है।
वहीं, Z श्रेणी के छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में तैनात कर्मचारियों को उनके बेसिक पे का 10 प्रतिशत HRA दिया जाता है।
जिन शहरों की श्रेणी आबादी बढ़ने की वजह से ऊपर हुई है, वहां तैनात कर्मचारियों के HRA में बढ़ोतरी हुई है। वहीं, जिन शहरों की श्रेणी नीचे आई है, वहां कर्मचारियों को नई श्रेणी के हिसाब से HRA मिल रहा है।
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केंद्रीय कर्मचारियों के HRA का एक और अहम पहलू यह है कि इसका सीधा संबंध महंगाई भत्ते यानी DA से होता है। 7वें केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक, जब महंगाई भत्ता तय सीमा को पार करता है, तो HRA की दरों में भी अपने आप बढ़ोतरी हो जाती है।
शुरुआत में X, Y और Z श्रेणी के शहरों के लिए HRA की मूल दरें क्रमशः 24 प्रतिशत, 16 प्रतिशत और 8 प्रतिशत तय की गई थीं। जब DA 25 प्रतिशत से ऊपर पहुंचा, तो HRA की दरें बढ़ाकर 27 प्रतिशत, 18 प्रतिशत और 9 प्रतिशत कर दी गईं।
अब महंगाई भत्ता 50 प्रतिशत की सीमा पार कर चुका है, इसलिए HRA की दरें भी बढ़कर क्रमशः 30 प्रतिशत, 20 प्रतिशत और 10 प्रतिशत के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं।
सरकार का दावा है कि इस व्यवस्था का मकसद यही है कि बढ़ती महंगाई और समय के साथ बढ़ने वाले मकान के किराए के बोझ से केंद्रीय कर्मचारियों को राहत मिल सके।