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FCNR(B) योजना से बॉन्ड बाजार में आई बहार, 5 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड में बड़ी गिरावट

विदेशी बैंक एफसीएनआर (बी) जमा से मिले पैसे को 5-वर्षीय सरकारी बॉन्ड में लगा रहे हैं। इससे कम अवधि वाले बॉन्ड की यील्ड में गिरावट आई है

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अंजलि कुमारी   
Last Updated- August 10, 2026 | 10:18 PM IST

वाणिज्यिक बैंक खास तौर पर विदेशी ऋणदाता रियायती स्वैप विंडो के जरिये जुटाए गए विदेशी मुद्रा अनिवासी भारतीय (बैंक) जमा या एफसीएनआर (बी) जमा को ज्यादातर 5 साल के सरकारी बॉन्ड में निवेश कर रहे हैं। इस वजह से जून से बॉन्ड यील्ड में तेजी घटी है। पिछले हफ्ते 10 वर्षीय बेंचमार्क सरकारी बॉन्ड की तुलना में 5 वर्षीय बॉन्ड की यील्ड का अंतर बढ़कर 46 आधार अंक हो गया। सोमवार को यह 41 आधार अंक था। असल में 1 जून से अभी तक 5 वर्षीय सरकारी बॉन्ड का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा है।

एक प्राइमरी डीलरशिप के एक डीलर ने कहा, ‘कम अवधि वाले बॉन्ड की मांग बढ़ने का असर यील्ड पर दिखा है और 10 वर्षीय बॉन्ड की यील्ड के मुकाबले 5 साल के सेगमेंट में ज्यादा गिरावट आई है। 10 साल की यील्ड तुलनात्मक रूप से स्थिर रही है।’ जुलाई के आखिर तक विदेशी बैंकों ने एफसीएनआर (बी) से 8 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम जुटाई जिनमें से अकेले एचएसबीसी ने 6 अरब डॉलर से अधिक की रकम जुटाई।

बाजार के भागीदारों का कहना है कि विदेशी बैंक जिनके पास घरेलू बैंकों की तरह लिक्विडिटी खपाने के लिए बड़े पैमाने पर खुदरा और कॉरपोरेट लोन बुक नहीं हैं, वे 3 से 5 साल वाले सरकारी बॉन्ड में सबसे ज्यादा निवेश कर रहे हैं। एक सरकारी बैंक के एक ट्रेजरी प्रमुख ने कहा, ‘विदेशी बैंकों के पास इस पैसे को कर्ज के तौर पर तेजी से खपाने का जरिया नहीं हैं। इसलिए इसका एक बड़ा हिस्सा कम अवधि वाले बॉन्ड में जा रहा है। इसी वजह से कम अवधि वाले बॉन्ड पर यील्ड घट रही है।’

डीलरों को उम्मीद है कि सितंबर तक यील्ड का अंतर और बढ़ेगा क्योंकि बैंक एफसीएनआर (बी) योजना के तहत 30 सितंबर की समयसीमा से पहले जमा राशि को निवेश करना जारी रखेंगे।

रिजर्व बैंक की डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा नए एफसीएनआर (बी) जमा के लिए है, जिन्हें कम से कम 3 साल और अधिकतम 5 साल की अवधि के लिए जमा किया जाता है। यह सुविधा 30 सितंबर तक उपलब्ध है। 5 साल के बॉन्ड के सबसे अच्छा प्रदर्शन करने का एक और कारण बैंकिंग तंत्र में जरूरत से ज्यादा नकदी है। डीलरों का कहना है कि जब लिक्विडिटी अधिक होती है तो बैंक उसे कम समय वाले निवेश में लगाना पसंद करते हैं। हाल के समय में बैंकिंग तंत्र में लिक्विडिटी 3 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा रही है।

डीलरों का कहना है कि निजी और सरकारी बैंक ज्यादातर इस लिक्विडिटी का इस्तेमाल ऊंची दरों पर पहले लिए गए महंगे थोक जमा को बदलने के लिए कर रहे हैं। इसका असर जमा सर्टिफिकेट (सीडी) बाजार पर भी पड़ा है और इसकी दरें कम हुई हैं।

भारतीय स्टेट बैंक के चेयरमैन सी एस  शेट्टी ने तिमाही नतीजों के बाद कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि एफसीएनआर (बी) प्रवाह से बनी लिक्विडिटी बैंकिंग तंत्र में थोक जमा की कीमतों पर दबाव कम करेगी। जब तक ये निवेश ऋण वृद्धि को पूरा करने के लिए पर्याप्त रहेंगे तब तक एसबीआई समेत अन्य ऋणदाता थो जमाओं को आकर्षित करने के लिए लुभावनी ब्याज दरें तय करने से बचेंगे।

First Published : August 10, 2026 | 10:01 PM IST