Middle East Conflict: मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब एशिया की ऊर्जा आपूर्ति पर साफ दिखाई देने लगा है। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद शुरू हुई जवाबी कार्रवाई ने तेल और गैस उत्पादन को प्रभावित किया है। इसके साथ ही दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में आवाजाही लगभग ठप हो गई है। यह वही रास्ता है जिसके जरिए खाड़ी क्षेत्र के बड़े तेल उत्पादक देशों से एशिया समेत दुनिया के कई हिस्सों में ऊर्जा की आपूर्ति होती है।
इस स्थिति का सबसे ज्यादा असर उन एशियाई देशों पर पड़ रहा है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं। कई जगहों पर ईंधन की कमी, कीमतों में बढ़ोतरी और आपूर्ति में बाधा की स्थिति बनने लगी है।
युद्ध के कुछ ही दिनों के भीतर एशिया के कई हिस्सों में ऊर्जा संकट के संकेत दिखाई देने लगे हैं। बिजली कंपनियों और रिफाइनरियों के पास मौजूद ईंधन का भंडार कम होने लगा है। कुछ औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिए ईंधन की कीमतें पहले ही बढ़ चुकी हैं।
सिंगापुर में जहाजों को ईंधन उपलब्ध कराने वाली कंपनियों ने आपूर्ति सीमित करना शुरू कर दिया है। फिलीपींस ने ऊर्जा बचाने के लिए सरकारी दफ्तरों के कामकाज के दिनों को कम करने का फैसला किया है। वहीं बांग्लादेश ने रमजान के दौरान सड़कों पर होने वाली सजावटी रोशनी को सीमित कर दिया है ताकि बिजली की खपत कम की जा सके। चीन ने भी घरेलू जरूरतों को सुरक्षित रखने के लिए अपनी रिफाइनरियों से ईंधन निर्यात कम करने को कहा है।
ऊर्जा संकट का असर उद्योगों पर भी दिखने लगा है। पाकिस्तान के फैसलाबाद स्थित टेक्सटाइल उद्योग से जुड़े कारोबारी जफर इकबाल सरवर, जो ZIS Textiles Pvt. चलाते हैं, का कहना है कि यदि यह स्थिति एक सप्ताह तक और जारी रहती है तो उद्योगों का कामकाज ठप होने का खतरा है।
उन्होंने बताया कि उनकी कंपनी कपड़ों की रंगाई की प्रक्रिया में गैस का उपयोग करती है, लेकिन अब गैस की उपलब्धता कम हो रही है और उत्पादन लागत करीब 35 प्रतिशत तक बढ़ गई है। इसके अलावा कतर और संयुक्त अरब अमीरात में हवाई अड्डों के बंद होने से ग्राहकों तक सैंपल भेजना भी मुश्किल हो गया है।
ऊर्जा संकट का असर कृषि क्षेत्र में भी दिखाई दे रहा है। उत्तरी थाईलैंड में किसान डीजल हासिल करने के लिए पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारों में खड़े हैं। उन्हें डर है कि अगर समय पर ईंधन नहीं मिला तो आने वाली धान की कटाई प्रभावित हो सकती है।
थाईलैंड में किसानों के साथ काम करने वाली कृषि कंपनी Living Roots के सह संस्थापक अभि अग्रवाल के अनुसार शहरों में डीजल की कीमत करीब 15 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है। हालांकि सरकार ने फिलहाल दो सप्ताह के लिए कीमतों को स्थिर रखा है, लेकिन बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है।
ऊर्जा आयात पर निर्भरता के कारण भारत भी इस संकट से प्रभावित हो रहा है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित तेल से पूरा करता है और इसका लगभग आधा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए आता है।
ANZ Banking Group के अर्थशास्त्री धीरज निम का कहना है कि स्थिति तेजी से बदल रही है और भारत की अर्थव्यवस्था पर इसके जोखिम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हालांकि अमेरिका ने भारत को 30 दिनों के लिए रूस से तेल खरीदने की छूट दी है। इसके बाद भारतीय रिफाइनरियों ने समुद्र में मौजूद रूसी तेल के कई कार्गो खरीदने शुरू कर दिए हैं।
Nomura Holdings की अर्थशास्त्री सोनल वर्मा के मुताबिक यह तेल पहले की तरह सस्ता नहीं मिल रहा है। उनके अनुसार मौजूदा हालात में तेल की कीमत से ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि आपूर्ति उपलब्ध रहे।
कच्चे तेल के साथ साथ गैस की आपूर्ति भी प्रभावित हो रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही बाधित होने से तरलीकृत प्राकृतिक गैस की सप्लाई पर असर पड़ा है। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब कतर की ऊर्जा कंपनी ने ईरानी ड्रोन हमले के बाद गैस आपूर्ति में बाधा का हवाला देते हुए कई डिलीवरी रोक दीं।
ऊर्जा बाजार के विश्लेषक सॉल कवोनिक, जो MST Marquee से जुड़े हैं, का कहना है कि एशिया एक बार फिर गैस संकट की स्थिति में पहुंच सकता है। उनके मुताबिक इस बार मांग कम करने के विकल्प भी सीमित हैं क्योंकि कई उपाय पहले ही 2022 के ऊर्जा संकट के दौरान अपनाए जा चुके हैं।
कई गैस कंपनियों ने औद्योगिक ग्राहकों के लिए कीमतें बढ़ा दी हैं और कुछ ने आपूर्ति सीमित कर दी है। भारत में भी कुछ गैस सप्लायर्स ने शिपमेंट में बाधा का हवाला देते हुए अपने ग्राहकों को सीमित गैस देने की सूचना दी है।
ऊर्जा संकट का असर आखिरकार आम उपभोक्ताओं तक भी पहुंच सकता है। हिमाचल प्रदेश की एक किसान शैला देवी का कहना है कि उन्होंने एक महीने पहले करीब 1050 रुपये में गैस सिलेंडर खरीदा था। अब वह अपने स्थानीय सप्लायर से नई कीमत का इंतजार कर रही हैं।