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बॉन्ड प्रतिफल में इजाफे से शेयरों पर दबाव

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Last Updated- December 12, 2022 | 12:01 AM IST

अमेरिका और भारत में बॉन्ड प्रतिफल बढऩे से शेयर मूल्यांकन और बाजारों में तेजी की रफ्तार पर दबाव पडऩे का अनुमान है। बाजारों में मार्च 2020 के निचले स्तरों से भारी तेजी आई है।
ऐतिहासिक तौर पर, 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड प्रतिफल और इक्विटी मूल्यांकन के बीच नकारात्मक सह-संबंध रहा है। अमेरिका में 10 वर्षीय बॉन्ड प्रतिफल जुलाई के अंत से 44 आधार अंक तक और मौजूदा कैलेंडर वर्ष की शुरुआत से 75 आधार अंक तक चढ़ा है। 10 वर्षीय अमेरिकी सरकारी बॉन्ड ने शुक्रवार को 1.67 प्रतिशत का प्रतिफल दर्ज किया, जो दिसंबर 2020 के अंत के 0.92 के मुकाबले काफी ज्यादा है।
भारत में, बॉन्ड प्रतिफल पिछले तीन महीनों में 16 आधार अंक और इस साल अब तक 47 आधार अंक तक चढ़ा है। 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड शुक्रवार को 6.37 प्रतिफल के साथ समाप्त हुआ, जो दिसंबर 2020 के अंत में दर्ज किए गए 5.9 प्रतिशत से ज्यादा है।
कोविड-19 महामारी के दौरान अमेरिका में बॉन्ड प्रतिफल जुलाई 2020 में घटकर 9.53 प्रतिशत के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया था, जबकि भारत में यह प्रतिफल समान महीने में 5.8 प्रतिशत के निचले स्तर पर दर्ज किया गया था।
जेएम फाइनैंशियल इंस्टीट्यूशनल इक्विटी के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य रणनीतिकार धनंजय सिन्हा ने कहा, ‘इक्विटी में महामारी के बाद आई तेजी को बॉन्ड प्रतिफल में बड़ी गिरावट और पर्याप्त नकदी से बढ़ावा मिला, जिससे वजह से मूल्यांकन भी नई ऊंचाइयों पर पहुंच गया था। अब इसमें नरमी आएगी, क्योंकि बॉन्ड प्रतिफल में इजाफा हुआ है। यदि अमेरिकी फेडरल रिजर्व अपनी बॉन्ड खरीदारी में नरमी लाता है और ब्याज दरों में वृद्घि शुरू होती है तो बॉन्ड प्रतिफत और सख्त बन सकता है।’
उनका मानना है कि अमेरिका में बॉन्ड प्रतिफल अगले साल बढ़कर 2.5 प्रतिशत पर पहुंच जाएगा। इससे जहां प्रतिफल बढ़ेगा वहीं भारत में ब्याज दरें भी बढ़ेंगी। पिछले 10 साल में, भारत में बॉन्ड प्रतिफल अमरिका में औसत तौर पर 530 आधार अंक तक बढ़ा है।
पिछले दश में भारतीय इक्विटी बाजारों में ज्यादातर तेजी ऊंची कॉरपोरेट  आय के बजाय ऊंचे मूल्यांकन या शेयरों की रेटिंग में बदलाव की वजह से आई। विश्लेषकों के अनुसार, रेटिंग में बदलाव को बॉन्ड प्रतिफल में भारी गिरावट से मदद मिली। बॉन्ड प्रतिफल अमेरिका और भारत, दोनों में नीचे आया, जिससे निवेशकों के लिए अपना पैसा बैंक एफडी और बॉन्ड जैसे निर्धारित आय विकल्पों में लगाने के बजाय शेयर खरीद पर लगाना ज्यादा लाभकारी बन गया।
उदाहरण के लिए, सेंसेक्स जनवरी 2013 के शुरू से 206 प्रतिशत तक चढ़ा है, लेकिन सिर्फ 26 प्रतिशत तेजी इस अवधि के दौरान सूचकांक कंपनियों की संयुक्त आय में वृद्घि की वजह से आई, जबकि शेष तेजी सूचकांक के कीमत-आय मल्टीपल में वृद्घि की वजह से दर्ज की गई। सूचकांक की निर्धारित प्रति शेयर आय (ईपीएस) इस अवधि के दौरान महज 75 प्रतिशत तक बढ़ी, और यह जनवरी 2013 के अंत में जहां 1,113 रुपये थी, वहीं शुक्रवार को 31.3 गुना पर दर्ज की गई। समान अवधि में, सूचकांक का पी/ई मल्टीपल जनवरी 2013 के 17.9 गुना से बढ़कर शुक्रवार को 31.3 गुना पर दर्ज किया गया। विश्लेषकों का कहना है कि इससे वैश्विक और घरेलू आधार पर ब्याज दरों में वृद्घि की वजह से बाजार पर दबाव बना है। कोविड-19 महामारी के बाद भारत और वैश्विक तौर पर ब्याज दरों में भारी गिरावट उस दीर्घावधि प्रक्रिया का हिस्सा थी, जो 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद शुरू हुई थी। यह रुझान अब बदल रहा है, क्योंकि मुद्रास्फीति में वृद्घि हुई है और विश्लेषकों का मानना है कि इससे इक्विटी मूल्यांकन पर दबाव पड़ेगा।

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First Published - October 24, 2021 | 11:25 PM IST

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