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RBI OMO purchase: ₹1 लाख करोड़ के सरकारी बॉन्ड खरीद का क्या होगा असर? क्या कहते हैं एनालिस्ट

एनालिस्ट मानते हैं कि OMO खरीद और फॉरेक्स स्वैप से बॉन्ड बाजार को बूस्ट मिलेगा। साथ ही लि​क्विडिटी और ग्रोथ को भी मिलेगा सपोर्ट

Last Updated- December 09, 2025 | 11:29 AM IST
RBI governor Sanjay Melhotra
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा (फोटो: पीटीआई)

RBI OMO purchase: रिजर्व बैंक (RBI) ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) के जरिए नकदी प्रबंधन के लिए एक लाख करोड़ रुपये की सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद करेगा। साथ ही आरबीआई ने इस महीने 5 अरब डॉलर का 3-वर्षीय डॉलर/रुपये बाय-सेल स्वैप (फॉरेक्स स्वैप) का फैसला किया है। रिजर्व बैंक के इस कदम का मकसद बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त और ड्यूरेबल लि​क्विडिटी बनाए बनाए रखना है। एनालिस्ट मानते हैं कि OMO खरीद और फॉरेक्स स्वैप से बॉन्ड बाजार को बूस्ट मिलेगा। साथ ही लि​क्विडिटी और ग्रोथ को भी सपोर्ट मिलेगा। इससे आगे एक और रेट कट की गुंजाइश बनी हुई है।

RBI गवर्नर ने क्या किया ऐलान

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शुक्रवार को MPC बैठक के नतीजों की घोषणा करते हुए कहा, “लि​क्विडिटी की बदलती परिस्थितियों और आउटलुक को देखते हुए, आरबीआई ने 1,00,000 करोड़ रुपये के OMO खरीद और 5 अरब डॉलर के USD/INR बाय-सेल स्वैप करने का फैसला किया है, ताकि सिस्टम में ड्यूरेबल लि​क्विडिटी सुनिश्चित की जा सके।”

गवर्नर ने कहा, “हम बैंकिंग सिस्टम को पर्याप्त लिक्विडिटी तरलता उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं। OMO का मकसद लिक्विडिटी तरलता देना है, जबकि LAF (VRR/VRRR) अल्पकालिक लिक्विडिटी प्रबंधन के लिए होता है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि OMO के अंतर्गत सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद (या बिक्री) का मकसद लिक्विडिटी प्रबंधन होता है, न कि G-sec यील्ड को सीधे प्रभावित करना।

क्या कहते हैं एनालिस्ट

UTI AMC के हेड (फिक्स्ड इनकम) अनुराग मित्तल का कहना है, RBI ने 25bps रेट कट को 1 लाख करोड़ के OMOs और 5 अरब डॉलर के फॉरेक्स स्वैप (FX Swap) के साथ मिलाकर साफ तौर पर एक कोऑर्डिनेटेड पॉलिसी पुश दिया है। साफ संदेश है कि फाइनेंशियल कंडीशन को आसान बनाने और ग्रोथ को अगले स्तर तक ले जाना है। आसान ट्रांसमिशन साइकिल और सरल लिक्विडिटी शर्तें शॉर्ट से मीडियम अव​धि रणनीति के लिए एक अच्छा अवसर बनाते हैं। 1 साल से ज्यादा की अव​धि का नजरिया रखने वाले निवेशक शॉर्ट ड्यूरेशन और कॉर्पोरेट बॉन्ड स्ट्रैटेजी अपना सकते हैं।

कोटक महिंद्रा एएमसी के सीआईओ (डेट) दीपक अग्रवाल का कहना है, RBI ने आखिरकार रेपो रेट में 25 bp की कटौती, दिसंबर 2025 के लिए 1 लाख करोड़ के बॉन्ड की OMO खरीद और 5 अरब डॉलर के FX स्वैप और नरम महंगाई अनुमानों के साथ पूरी तरह से आगे बढ़ गया है। मार्केट ने पॉलिसी को हरी झंडी दे दी है और इसके चलते 10 साल का G-sec 3 bps नीचे चला गया है और 6.48% के आसपास ट्रेड कर रहा है।

बजाज फिनसर्व एएमसी हेड (फिक्स्ड इनकम) सिद्धार्थ चौधरी का कहना है कि रिजर्व बैंक MPC ने ठीक वही किया जिसकी बॉन्ड मार्केट को उम्मीद थी, 25 bps रेट कट और ₹1 लाख करोड़ के OMOs जो इस महीने पूरे होने वाले हैं। महंगाई के नीचे जाने का अनुमान है, जिसमें कोर महंगाई भी शामिल है जो अब 4% से नीचे है, गवर्नर के बयान ने और ढील देने पर चर्चा की गुंजाइश खोल दी है। OMOs को फ्रंट-लोड करने से अगली तिमाही में और लिक्विडिटी उपायों की संभावना बनती है।

टाटा एसेट मैनेजमेंट के हेड (फिक्स्ड इनकम) मूर्ति नागराजन के मुताबिक, RBI गवर्नर ने 11 दिसंबर को 50,000 रुपये और 18 दिसंबर को 50,000 करोड़ रुपये के साथ 1 लाख करोड़ रुपये के ओपन मार्केट ऑपरेशन की घोषणा की है। 16 दिसंबर को 5 अरब डॉलर का फॉरेक्स बाय सेल स्वैप किया जाना है। अगले 15 दिनों में कुल 1,45,000 करोड़ रुपये की लिक्विडिटी डाले जाने की उम्मीद है। यह सिर्फ दिसंबर महीने के लिए है और फाइनेंशियल ईयर की चौथी तिमाही में और कदम उठाए जाने की उम्मीद है। इससे आने वाले महीनों में दस साल की यील्ड अभी के 6.45 से 6.50 से बढ़कर 6.25 से 6.30 के लेवल पर पहुंच जाएगी।

मिराए एसेट इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के सीईओ (फिक्स्ड इनकम) महेंद्र कुमार जागू का कहना है कि रिजर्व बैंक ने रेट कट के साथ 1 लाख करोड़ की OMO खरीद और 5 अरब डॉलर FX स्वैप जैसे मजबूत लिक्विडिटी उपायों की भी घोषणा की। मार्केट सर्वे के अनुसार, मनी और बॉन्ड मार्केट पहले से ही रेट में कटौती की उम्मीद कर रहे थे। पॉलिसी ऐलान के बाद मार्केट ने पिछले कुछ दिनों की खोई हुई जमीन को काफी हद तक वापस पा लिया, जहां रुपये के उतार-चढ़ाव के जवाब में यील्ड थोड़ी बढ़ गई थी। आगे, क्योंकि आगे रेट्स बढ़ने की संभावना बनी हुई है। इसलिए उम्मीद है कि इंटरेस्ट रेट्स धीरे-धीरे और थोड़ी कम होंगी, क्योंकि आज बताए गए लिक्विडिटी इंजेक्शन के तरीकों का पूरा असर मार्केट में आ जाएगा।

इंडियाबॉन्ड्स डॉट कॉम के को-फाउंडर विशाल गोयनका ने कहा कि 1 लाख करोड़ रुपये के OMO खरीद की घोषणा से लिक्विडिटी बढ़ाने और यील्ड कर्व को फ्लैट करने में मदद मिलेगी। इसके बाद, इन्वेस्टर्स को 2-3 साल के सेगमेंट में कॉर्पोरेट्स से मौजूदा ऊंचे रेट्स को लॉक करने पर ध्यान देना चाहिए और संभावित फायदे के लिए लॉन्ग एंड गवर्नमेंट बॉन्ड खरीदकर इसे पूरा करना चाहिए।

च्वाइस इंटरनेशनल के कार्यकारी निदेशक अजय केजरीवाल कहते हैं, केंद्रीय बैंक ने सिस्टम में ड्यूरेबल लिक्विडिटी डालने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये की सरकारी सिक्योरिटीज की OMO खरीद करने का फैसला किया है। इस समय मुख्य फोकस बेहद नरम महंगाई के आउटलुक का इस्तेमाल करके GDP ग्रोथ को बनाए रखना है। आरबीआई ने साफ तौर पर संकेत किया है कि इकॉनमिक ग्रोथ को बढ़ावा देना, सिस्टम में ज्यादा लिक्विडिटी डालना, क्रेडिट ग्रोथ में सुधार करना और रेट कट को आसानी से पहुंचाना इस समय मुख्य लक्ष्य हैं।

ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) क्या है?

ओपन मार्केट ऑपरेशन एक मुख्य मॉनेटरी पॉलिसी इंस्ट्रूमेंट है जिसके जरिए RBI बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी को रेगुलेट करने के लिए सरकारी सिक्योरिटीज खरीदता या बेचता है। OMO खरीद से बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी आती है, क्योंकि RBI सिक्योरिटीज के लिए बैंकों को पेमेंट करता है। OMO ​​बिक्री से लिक्विडिटी सोख ली जाती है, क्योंकि बैंक RBI को पेमेंट करते हैं।

रुपया दबाव में हो, तो OMOs क्यों जरूरी?

रिजर्व बैंक की ओर से OMO खरीद की घोषणा रुपये में तेज गिरावट के बीच हुई है, क्योंकि भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 90 के लेवल को पार कर गया है। जब रुपया जरूरी लेवल को पार करता है, तो RBI आमतौर पर स्पॉट डॉलर बिक्री, फॉरेक्स स्वैप और OMO खरीद जैसे मिक्स टूल्स का इस्तेमाल करता है। रुपये में तेज गिरावट अक्सर विदेशी विदेशी के आउटफ्लो के साथ होती है, जिससे बैंकिंग सिस्टम से लिक्विडिटी कम हो जाती है। OMO ​​खरीद बैंकों में ड्यूरेबल फंड डालकर इस लिक्विडिटी को फिर से भरने में मदद करता है।

साथ ही, करेंसी पर दबाव के समय डॉलर की ज्यादा मांग मनी-मार्केट की हालत को सख्त कर सकती है, जिससे कॉल रेट और शॉर्ट-टर्म यील्ड बढ़ सकते हैं। OMO ​​खरीद रुपये की लिक्विडिटी को बेहतर बनाकर इन दबवा को कम करती है। करेंसी पर दबाव के चलते बैंकों में असमान लिक्विडिटी की हालत हो सकती है, जिससे RBI के पॉलिसी रुख का ट्रांसमिशन कमजोर हो जाता है। ऐसे में OMOs के जरिए ड्यूरेबल लिक्विडिटी पूरे सिस्टम में आसान ट्रांसमिशन को फिर से बनाने में मदद करती है।

इकॉनमी, आम आदमी के लिए क्या है मतलब?

OMO खरीद से बैंकों के पास लि​क्विडिटी यानी ज्यादा फंड होगा. इससे किफायती दरों पर, और आसान लोन मिल सेंगे। होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन, और अन्य दूसरे रिटेल लोन पर EMI में राहत दिख सकती है. कारोबारियों के लिए कर्ज लेना किफायती होगा।

इकॉनमी के नजरिए से बात करें तो बॉन्ड खरीद से मार्केट में लि​क्विडिटी बढ़ेगी और इससे डिमांड को बूस्ट मिलेगा। कंपनियों के लिए फंड जुटाना आसान होगा। निवेश को बूस्ट मिलेगा। इसका मतलब कि कंपनियों की स्पेंडिंग बढ़ेगी, जिससे प्रोडक्शन बढ़ेगा और रोजगार के नए अवसर बनेंगे। इससे इकॉनमी को और ज्यादा रफ्तार मिलेगी।

First Published - December 5, 2025 | 2:25 PM IST

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