भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा हाल की मौद्रिक नीति घोषणाओं में जिस ‘गोल्डीलॉक्स’अवधि यानी आर्थिक विकास के लिए संतुलित समय का जिक्र किया गया था, उसमें अचानक बदलाव आने की आशंका बढ़ गई है। कम महंगाई और बेहतर आर्थिक वृद्धि की संभावनाओं के कारण फरवरी की मौद्रिक नीति बैठक में आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने अर्थव्यवस्था को स्थिति को अनुकूल बताया था। हालांकि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध इस पूरी स्थिति को बदल सकता है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के कारण आरबीआई के सामने अब एक कठिन स्थिति बनती दिखाई दे रही है। एक ओर महंगाई बढ़ने का खतरा है वहीं दूसरी ओर आर्थिक वृद्धि पर दबाव बढ़ सकता है। सोमवार को कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई।
बाजार के विशेषज्ञों में इस बात को लेकर मतभेद है कि कम ब्याज दर लंबे समय तक बने रहने की संभावना जारी रहेगी या नहीं। दिसंबर 2024 से अब तक छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति ने नीतिगत दर में 125 आधार अंकों की कटौती कर इसे 5.25 प्रतिशत के स्तर पर ला दिया है। समिति ने यह भी संकेत दिया था कि निकट भविष्य में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना नहीं हो सकती है।
बन्धन एएमसी में फिक्स्ड इनकम के मुख्य निवेश अधिकारी सुयश चौधरी ने कहा, ‘हाल ही में एक साक्षात्कार में आरबीआई गवर्नर ने संकेत दिया था कि ब्याज दरें लंबे समय तक इसी स्तर पर या इससे भी नीचे रह सकती हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि यह स्थिति तब तक रहेगी जब तक कोई बड़ा झटका न लगे।’
चौधरी ने एक नोट में कहा, ‘यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यह स्थिति कितने समय तक टिकेगी लेकिन मौजूदा भू-राजनीतिक घटनाक्रम को एक बड़ा झटका माना जा सकता है। इसकी शुरुआती स्थिति और संभावित तीव्रता दोनों ही आगे चलकर मौद्रिक नीति से जुड़ी उम्मीदों को बदल सकती हैं।’ केंद्रीय बैंक की सबसे बड़ी चिंता वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों की दिशा और आपूर्ति श्रृंखला में संभावित बाधाओं से जुड़ी है। बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस का कहना है कि यदि महंगाई अधिक तेजी से बढ़ती है तब ब्याज दरों में उम्मीद से पहले बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि फिलहाल ऐसा होता हुआ नहीं दिख रहा है लेकिन हालात कैसे बदलते हैं, इसके आधार पर आरबीआई निर्णय लेगा। उन्होंने कहा, ‘असली मुद्दा युद्ध की अवधि और तेल अर्थव्यवस्था पर उसका प्रभाव है क्योंकि केवल कीमत ही नहीं बल्कि आपूर्ति की मात्रा भी महत्वपूर्ण होती है।’
फरवरी की मौद्रिक नीति समीक्षा में मौद्रिक नीति समिति ने रीपो दर को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखा था और अपनी ‘तटस्थ’ नीति के रुख को बरकरार रखा था जो फिलहाल प्रतीक्षा और स्थिति पर नजर रखने की रणनीति को दर्शाता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में ब्याज दर तय करने वाली समिति सावधानी से आंकड़ों पर आधारित रणनीति अपनाएगी।