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श्रम मंत्रालय ने सांविधिक राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन (फ्लोर वेज) तय करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस मामले के दो जानकार लोगों के मुताबिक वेतन संहिता के अंतर्गत न्यूनतम वेतन तय किया जाएगा। अधिकारियों का समूह गणना के तरीके और खपत बास्केट पर काम कर रहा है और केंद्र सरकार ‘केंद्रीय सलाहकार बोर्ड’ (सीएबी) बनाएगी।
सीएबी राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम वेतन की सिफारिश करने से पहले बातचीत करेगा। यह एक बार अधिसूचित होने के बाद न्यूनतम सीमा के लिए कानूनी बाध्यता होगी और राज्य व केंद्र शासित प्रदेश इस निर्धारित सीमा से कम वेतन तय नहीं कर पाएंगे। लोगों ने बताया कि यह तकनीकी प्रक्रिया एस. पी. विशेषज्ञ समूह के तैयार अनुमानों पर आधारित होगी। इस क्रम में खपत बास्केट को नए सिरे से बनाने के बजाए महंगाई के हिसाब से संशोधित किए जाने की संभावना है। अधिकारियों का समूह तरीके की जांच कर रहा है और खपत बास्केट को अपडेट कर रहा है, जबकि केंद्रीय सलाहकार बोर्ड केंद्र को अपनी सिफारिश देने से पहले प्रस्ताव पर विचार-विमर्श करेगा।
मामले की सीधे तौर पर जानकारी रखने वाले वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘इसके साथ ही राज्यों के साथ भी बातचीत चल रही है। इसका कारण यह है कि न्यूनतम वेतन राशि तय करने में बड़ी चुनौती राज्यों के बीच न्यूनतम वेतन में अंतर है।’ खबर लिखे जाने तक श्रम मंत्रालय को भेजे गए ईमेल का कोई जवाब नहीं मिला था।
वेतन संहिता के अंतर्गत केंद्र के लिए यह जरूरी है कि वह न्यूनतम वेतन तय करने से जुड़े मामलों पर सलाह देने के लिए सीएबी का गठन करे। कानून के अनुसार बोर्ड में नियोक्ताओं, कर्मचारियों, स्वतंत्र सदस्यों और केंद्र द्वारा नामित राज्य सरकारों के पांच प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना है।
यह कदम श्रम संहिता को लागू करने की दिशा में अगला कदम है। यह उन चार श्रम संहिता में से एक है जो पिछले साल लागू हुए थे। श्रम संहिता के तहत केंद्र सरकार को मजदूरों के जीवन-यापन के न्यूनतम स्तर और अन्य ज़रूरी बातों को ध्यान में रखते हुए एक राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी का आधार तय करना होगा।
यह पहले के ‘नैशनल फ्लोर लेवल मिनिमम वेज’ के विपरीत है। यह पहले गैर-कानूनी बेंचमार्क था और जिसे आखिरी बार 2017 में 176 रुपये प्रति दिन तय किया गया था। चार श्रम संहिता के तहत तय होने वाला ‘नैशनल फ्लोर वेज’ कानूनी रूप से बाध्यकारी होगा।