विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) का 14वां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (एमसी) आज संपन्न हो गया। सदस्य देशों ने ई-कॉमर्स सीमा शुल्क पर वैश्विक प्रतिबंध को 5 साल के लिए बढ़ाने पर विचार किया। मगर भारत राजस्व में होने वाले नुकसान की चिंताओं का हवाला देते हुए इस पर लंबे समय तक रोक लगाने का विरोध कर रहा है।
डब्ल्यूटीओ की इस मोहलत के तहत सदस्य देश सीमा पार होने वाले इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कोई शुल्क नहीं लगाते हैं। लगभग तीन दशकों से सदस्य देश हर दो साल में इस रोक को बढ़ाने पर सहमत होते रहे हैं। मगर उनमें इस बात पर मतभेद बना रहा कि क्या इसे आगे भी जारी रखा जाना चाहिए। साल 2024 में हुए 13वें डब्ल्यूटीओ मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में सदस्य देशों ने अगले मंत्रिस्तरीय सम्मेलन तक इस तरह के शुल्क न लगाने की मौजूदा प्रथा को जारी रखने पर सहमति जताई थी।
मसौदा बयान के आधार पर ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, सदस्य देशों ने 30 जून, 2031 तक ऑनलाइन डिजिटल सेवाओं के व्यापार पर शुल्क न लगाने की अपनी प्रथा को बनाए रखने पर सहमति जताई है।
अमेरिका सहित अधिकतर विकसित देश चाहते हैं कि इस रोक को स्थायी बना दिया जाए। दूसरी ओर भारत जैसे विकासशील देशों ने इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर सीमा शुल्क लगाने के लिए नीतिगत गुंजाइश की वकालत की है। उन्होंने तर्क दिया है कि इस रोक के कारण उनके राजस्व संग्रह को नुकसान पहुंचा है।
अमेरिका ई-कॉमर्स शुल्क पर लगी रोक को हमेशा के लिए लागू करने पर जोर देता रहा है जबकि भारत इसे कुछ समय के लिए ही बढ़ाने को तैयार है। गुरुवार को एक वीडियो संदेश में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीर ने कहा, ‘मैं स्पष्ट तौर पर कहना चाहता हूं कि अमेरिका इस रोक को फिर से कुछ समय के लिए बढ़ाने में दिलचस्पी नहीं रखता। इससे हमारे व्यवसायों को अपने कामकाज के लिए जरूरी निश्चितता नहीं मिलेगी।’
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने ई-कॉमर्स पर सीमा शुल्क में छूट की बारीकी से समीक्षा करने की बात कही। उन्होंने कहा कि डब्ल्यूटीओ के सदस्य देशों के बीच इस छूट के दायरे और इसके संभावित व्यापक असर के बारे में कोई आम सहमति नहीं है।
गोयल ने कहा, ‘इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर सीमा शुल्क में छूट के दायरे पर सदस्य देशों के बीच आम सहमति न होने और इसके संभावित व्यापक असर के मद्देनजर इसे लगातार आगे बढ़ाने के फैसले पर बारीकी से गौर करने की जरूरत है।’
खबर लिखे जाने के समय तक मंत्रीस्तरीय घोषणा पर कुछ भी साफ नहीं था। ई-कॉमर्स और निवेश से जुड़े मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच मतभेदों के बावजूद मंत्री स्तरीय बैठक के आखिर में होने वाली घोषणा बहुपक्षवाद में विश्वास बहाल करने के लिए बेहद जरूरी है। पिछली दो मंत्री स्तरीय बैठकें (12वीं और 13वीं) अहम मुद्दों पर गतिरोध के कारण एक दिन के लिए बढ़ा दी गई थीं जिसके बाद ही कोई घोषणा या आगे का रास्ता तय हो पाया था।
भारत पर विकसित देशों की ओर से ई-कॉमर्स पर सीमा शुल्क पर स्थायी रोक लगाने पर सहमति जताने का का दबाव बना रहा। भारत ने विकास के लिए निवेश सुविधा (आईएफडी) समझौते में शामिल होने के खिलाफ अकेले खड़े होने का ‘साहस’ दिखाया। भारत ने आईएफडी समझौते में शामिल होने के दबाव का भी विरोध किया मगर इसे 166 सदस्य देशों में से 129 देशों का बहुमत प्राप्त है।