पिछले साल अप्रैल से दिसंबर के बीच कार बाजार में सन्नाटा रहने के कारण कार निर्माता कंपनियों को इस साल की प्रथम मध्यावधि में कारोबार में ऋणात्मक बढोतरी होने की संभावना है।
इस खबर के बाद देश के कार कारोबार से जुडे 2,000 हजार कार विक्रेताओं के होश उड़ गये है। इनमें से लगभग 250-300 ज्यादातर छोटे स्तर पर अपने कारोबार को चला रहें है। ये कार विक्रेता बाजार में अचानक आई गिरावट के चलते इस कारोबार से बाहर निकलने का रास्ता भी ढूंढ रहें है।
जबकि कार इंडस्ट्री के मल्टी ब्रंडों की बिक्री करने वाले कारोबारी गिरावट के बावजूद जूझने की स्थिति में नजर आ रहें है। इसका कारण यह है कि मल्टी ब्रांड शोरुमों को बड़े बिजनेस घरानों द्वारा आपरेट किया जाता है। इन शोरुमों में विभिन्न कारों के मॉडलों की बिक्री को कई दशकों से संचालित किया जा रहा है।
मल्टीपल ब्रांड डीलरशिप से जुड़ने का सबसे बड़ा फायदा इन्हें बैंक द्वारा मान्यता प्राप्त क्रेडिट एजेंसियों द्वारा रेटिंग किया जाना है। क्रिसिल के रमन ओबेरॉय का कहना है कि डीलरशिप के लिए रेटिंग का तरीका भी कंपनियों की वित्तिय स्थिति की रेटिंग तय करने की तरह ही है।
खास बात यह है कि बड़ी कार डीलरशिप अगर अच्छी रेटिंग पाती है तो उसे 13 फीसदी की सस्ती दरों पर बैंक से ऋण उपलब्ध हो जाता है।
जबकि जिनकी रेटिंग नहीं होती है। उन्हें 17 फीसदी की मंहगी दरों पर ऋण उपलब्ध हो पाता है। मल्टीपल ब्रांड कार डीलरशिप दशकों से बनाए गए अपने उपभोक्ताओं के विश्वास के चलते लंबे समय तक मंदी की स्थिति को झेल सकती है।
मारुति सुजुकि, बीएमडब्लयु, लैंडरोवर, ऑडी, रॉल्स रॉयस और विभिन्न वाणिज्यिक वाहनों का बिक्री करने वाली मुंबई स्थित नवनीत ग्रुप ऑफ कंपनीस के निदेशक जयेंद्र कछालिया का कहना है कि हमनें अपना कारोबार चार दशकों पहले स्थापित किया था।
इसलिए इस तरह के उतार-चढ़ाव का सामना हमनें पहले भी कई बार किया है। हां यह बात जरुर है कि पिछले तीन सालों में इस कारोबार की स्थिति थोड़ी कमजोर हुई है। कछालिया का कहना है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान ही मारुति की बिक्री में 15 फीसदी की कमी आई है।
लेकिन सियाम के आंकड़ों के हिसाब से पिछले साल अप्रैल से दिसंबर के मध्य वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री में 8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। कछालिया का कहना है कि एक ही ब्रांड की कारों की बिक्री करने पर जोखिम की संभावना बढ़ जाती है।
जबकि विभिन्न ब्रांडों के होने पर उपभोक्ता और विक्रेता दोनों के पास विकल्प ज्यादा हो जाते है। ऐसे में जोखिम की संभावना कम हो जाती है।