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अमेरिकी आयात का भारत के पशु आहार बाजार पर असर अभी नहीं: रविंदर बलैन

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रविंदर बलैन ने पशु चारा (फीड) व्यवसाय में कंपनी की योजनाओं और भारत के पशु चारा बाजारों पर अमेरिका-भारत व्यापार समझौते के प्रभाव पर चर्चा की।

Last Updated- February 27, 2026 | 9:11 AM IST

वैश्विक खाद्य, सामग्री और कृषि समाधानों की दिग्गज कंपनी कार्गिल ने गुरुवार को पंजाब के वजीराबाद में दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा डेरी फीड प्लांट खोला है। कार्गिल इंडिया के कंट्री प्रेसिडेंट और कार्गिल एनिमल न्यूट्रिशन ऐंड हेल्थ, साउथ एशिया के वरिष्ठ प्रबंध निदेशक रविंदर बलैन ने संजीव मुखर्जी के साथ एक वीडियो साक्षात्कार में पशु चारा (फीड) व्यवसाय में कंपनी की योजनाओं और भारत के पशु चारा बाजारों पर अमेरिका-भारत व्यापार समझौते के प्रभाव पर चर्चा की। साक्षात्कार के संपादित अंश:

कार्गिल वास्तव में पशु चारे में क्या कर रही है?

हम पंजाब के वजीराबाद में एक नए विनिर्माण प्लांट के साथ अपने डेरी फीड व्यवसाय में एक और बड़ा कदम उठा रहे हैं। कुछ साल पहले हमने बठिंडा में एक प्लांट में निवेश किया था। यह दक्षिण एशिया में हमारा सबसे बड़ा डेरी फीड प्लांट है। साथ ही यह एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सबसे बड़े में से एक है।

इस नए प्लांट की क्षमता कितनी है?

इस प्लांट में लगभग 34,000 टन प्रति माह उत्पादन करने की क्षमता होगी, जो मोटे तौर पर प्रति वर्ष 4 लाख टन होगी।

भारतीय संदर्भ में यह प्लांट कितना बड़ा है? प्रतिस्पर्धियों की तुलना में क्या आप इसे सबसे बड़ा कहेंगे?

डेरी फीड व्यवसाय की स्थानिक प्रकृति को देखते हुए प्लांट को अत्यधिक बड़े और केंद्रीकृत होने के बजाय बाजारों के करीब होने की आवश्यकता है। पंजाब के भीतर यह निश्चित रूप से सबसे बड़े प्लांटों में से एक होगा।

कार्गिल को अक्सर खाद्य तेलों, तिलहनों और कपास से जोड़ा जाता है। भारत में आपका पशु चारा व्यवसाय कितना महत्त्वपूर्ण है?

कार्गिल भारत में दो दशकों से अधिक समय से पशु पोषण में काम कर रहा है। डेरी फीड के अलावा हम डेरी स्वास्थ्य और पालतू पशु स्वास्थ्य में भी शामिल हैं। पिछले एक दशक में हमने डेरी फीड और पोल्ट्री से संबंधित समाधानों में निवेश को काफी बढ़ाया है।

क्या आप स्थानीय रूप से फीड का निर्माण और बिक्री करते हैं? क्या इसमें से कोई आयात किया जाता है?

भारत में डेरी फीड आयात की अनुमति नहीं है। सभी फीड का उत्पादन घरेलू स्तर पर किया जाता है। डेरी और पोल्ट्री फीड में उपयोग किए जाने वाले कच्चे माल का स्रोत देश के भीतर ही है। कार्गिल अपने ब्रांडों के तहत डेरी फीड का निर्माण और बिक्री करता है। हम इस सेगमेंट में अग्रणी खिलाड़ियों में से एक हैं और देश भर में डेरी उत्पादकों के साथ मिलकर काम करते हैं।

भारत में आपकी कुल डेरी फीड मात्रा कितनी है?

नए पंजाब प्लांट की वार्षिक क्षमता लगभग 4 लाख टन होगी। हमारी मौजूदा बठिंडा प्लांट सालाना लगभग 2.5 लाख टन उत्पादन की सुविधा देता है। अब इस प्लांट की संयुक्त रूप से सालाना उत्पादन क्षमता 6.50 लाख से 7 लाख टन के बीच है।

डेरी फीड में कौन से कच्चे माल जाते हैं?

प्राथमिक कच्चे माल में चावल मिलिंग के सह उत्पाद जैसे चावल की भूसी और डी-ऑयल्ड राइस ब्रान, सरसों खली और मक्का शामिल है। इसके अलावा खाद्य और कमोडिटी प्रसंस्करण उद्योगों से प्राप्त विभिन्न सह-उत्पादों का भी उपयोग किया जाता है। इन सभी सामग्री को इस प्रकार संयोजित किया जाता है कि डेरी पशुओं को संतुलित और उत्तम पोषण मिलना सुनिश्चित हो सके।

फीड बाजारों में सोयाबीन खली पर व्यापक रूप से चर्चा की जाती है। क्या आप इसका उपयोग करते हैं?

सोयाबीन खली का उपयोग मुख्य रूप से पोल्ट्री फीड में किया जाता है। यह डेरी फीड फार्मूलों में एक प्रमुख घटक नहीं है।

भारत के मवेशी फीड बाजार का आकार क्या है?

पोल्ट्री को छोड़कर भारत का मवेशी फीड सामग्री बाजार लगभग 12 करोड़ टन सालाना है। इसमें कपास के बीज की खली, दालों के सह उत्पाद और अन्य फीड इनपुट शामिल हैं। वर्तमान विकास दर पर बाजार अगले पांच वर्षों में बढ़कर लगभग 17 करोड़ टन हो सकता है।

इस बाजार का कितना हिस्सा संगठित है?

कुल बाजार का लगभग 12 से 15 प्रतिशत हिस्सा हमारे जैसे संगठित, गुणवत्ता-आश्वासन वाले फीड निर्माताओं से बना है। बाकी असंगठित और स्थानीय खिलाड़ी हैं।

क्या 12 से 15 प्रतिशत अपेक्षाकृत छोटा नहीं है?

जरूरी नहीं। संगठित क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है और इसकी सालाना वृद्धि दर 10 से 12 प्रतिशत है। समय के साथ यह समग्र बाजार का एक बड़ा हिस्सा हासिल कर लेगा खासकर जब गुणवत्ता और अनुपालन मानक अधिक महत्वपूर्ण हो जाएंगे।

एक व्यापार समझौते के तहत अमेरिका से डीडीजीएस के संभावित आयात को लेकर बहस चल रही है। आप इसे उद्योग को कैसे प्रभावित करते हुए देखते हैं?

इस पर टिप्पणी करना अभी जल्दबाजी होगी। हमें भारत और अमेरिका के बीच किसी भी समझौते की अंतिम शर्तों पर स्पष्टता की आवश्यकता है। सार्वजनिक बयानों के आधार पर यह पूरी तरह से मुक्त आयात व्यवस्था नहीं होगी। इसके निहितार्थ मात्रा, शर्तों और सुरक्षा उपायों पर निर्भर करेंगे।

अमेरिकी डीडीजीएस को कम एफ्लाटॉक्सिन (फफूंद द्वारा उत्पन्न विषैला पदार्थ) स्तर के साथ उच्च गुणवत्ता वाला माना जाता है और वर्तमान में इसकी कीमत प्रतिस्पर्धी है। क्या इससे भारतीय फीड मिलरों को फायदा हो सकता है?

एफ्लाटॉक्सिन एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। वे पशु स्वास्थ्य, दूध उत्पादकता को प्रभावित करते हैं और अंततः मानव खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करते हैं। एफ्लाटॉक्सिन प्रबंधन में सुधार एक ऐसा क्षेत्र है, जहां भारतीय उद्योग को अनुपालन को मजबूत करना चाहिए। यदि आयात उच्च गुणवत्ता मानकों को पूरा करते हैं, तो वे सकारात्मक योगदान दे सकते हैं। लेकिन मूल्य निर्धारण और प्रभाव कई चरों पर निर्भर करेंगे।

रिपोर्टों से पता चलता है कि सालाना लगभग 5 लाख टन अमेरिकी डीडीजीएस भारतीय बाजार में आ सकता है। क्या यह व्यवधान पैदा करने के लिए काफी बड़ा है?

यह भविष्यवाणी करना मुश्किल है। प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां अपने फार्मूलों में डीडीजीएस का उपयोग कैसे करती हैं और यह व्यापक कमोडिटी बास्केट में कैसे फिट बैठता है? निष्कर्ष निकालने से पहले हमें अंतिम रूपरेखा देखने की जरूरत है।

अमेरिकी लाल ज्वार के आयात की भी बात हो रही है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से पोल्ट्री फीड में किया जाता है। क्या इससे घरेलू बाजारों में बड़ा बदलाव आ सकता है?

लाल ज्वार काफी हद तक पोल्ट्री सामग्री है। इसका प्रभाव आयात मात्रा और समझौते के विवरण पर निर्भर करेगा। कमोडिटी बाजार संतुलन पर काम करता है। इसमें उपलब्धता, प्रतिस्थापन और मांग सभी भूमिका निभाते हैं।

तो क्या मक्का की कीमतों में गिरावट या किसानों की बड़ी परेशानी की भविष्यवाणियां समय से पहले हैं?

हां। जब तक समझौते अंतिम रूप नहीं ले लेते हैं, तब तक परिणामों का पूर्वानुमान लगाना अटकलबाजी होगी। बाजार धारणाओं पर नहीं, बल्कि ठोस नीतिगत उपायों पर प्रतिक्रिया देते हैं।

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First Published - February 27, 2026 | 9:11 AM IST

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