सत्यम कंप्यूटर के संस्थापक और कंपनी के पूर्व प्रमुख बी. रामलिंग राजू ने कहा है कि सच स्वीकारते वक्त ही उसने जनसामान्य के कानूनों का सामना करने और उसका परिणाम भुगतने के लिए खुद को तैयार कर लिया था।
राजू ने 7 जनवरी को सत्यम के खाते में 7,800 करोड़ रुपये के हेरफेर की बात स्वीकार की थी। वैसे कानून ने कई जांच एजेंसियों को राजू के साथ पूछताछ करने से रोके रखा। इस वजह से राजू को कुछ दिन तक राहत मिली रही। हालांकि, इसके चलते मामले की जांच थोड़ी प्रभावित हुई।
गौरतलब है कि मामला उजागर होने के ठीक दो दिन बाद यानी 9 जनवरी को राजू और उनके भाई बी. रामाराजू आंध्र प्रदेश अपराध अनुसंधान की गिरफ्त में आ गए थे। सामान्य कानून के अनुसार, सीआईडी ने इन दोनों भाइयों को नामपल्ली कोर्ट के सामने पेश किया, जिसने इन दोनों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
न्यायालय ने इनसे पूछताछ की अनुमति इसलिए नहीं दी कि दोनों भाई इस रहस्योद्धाटन के बाद थोड़ी राहत पा लें। परिणाम यह हुआ कि जांच एजेंसियों को इन दोनों भाइयों से कुछ भी पूछने या बयान दर्ज के लिए करने के लिए कई हफ्तों का इंतजार करना पड़ा।
नियम के मुताबिक, जैसे ही कोई आरोपित न्यायिक हिरासत में चला जाता है, उससे पूछताछ के लिए सीबीआई सहित सभी एजेंसियों सेबी, गंभीर धोखाधड़ी जांच संगठन, प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग को पूछताछ के लिए कोर्ट की अनुमति लेनी पड़ी। लेकिन, इन एजेंसियों के लिए भी कोर्ट से अनुमति पाना कोई आसान बात नहीं रही।
एक समय तो सेबी ने आशंका जताई कि सत्यम मामले में उसकी जांच अनुमति न मिलने से प्रभावित हो सकती है। सेबी ने जब भी राजू भाइयों से पूछताछ करनी चाही, उसे कोर्ट की अनुमति पाने में नाकों चने चबाने पड़े। इसी बात पर सेबी चेयरमैन को कहना पड़ा कि राजू भाई सुरक्षित हिरासत में हैं।
सेबी के अनुभव और वक्तव्य से इन जांच एजेंसियों की कितनी निराशा हुई है, इसे समझा जा सकता है। जनवरी की 23 तारीख को छठे अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने पूछताछ की अनुमति मांगने वाली याचिका खारिज की। इसके बाद सेबी ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय का रुख किया, जिसने सुनवाई की तारीख 9 फरवरी तय की।
अंतत: न्यायालय ने सेबी के वकील गुलाम ई. वाहनवती के अंतरिम पूछताछ की अर्जी ठुकरा दी। वाहनवती के मुताबिक, यह विशिष्ट मामला था और इसकी जांच में देर करने से शेयरधारकों को नुकसान होता। मजेदार बात है कि सेबी अभियुक्तों को अपनी हिरासत में लेने की बजाय केवल पूछताछ की अनुमति मांग रहा था। लेकिन यह भी न हो सका।
अंतत: सेबी ने सर्वोच्च न्यायालय में अर्जी दी, जिसने उसे पूछताछ की अनुमति दे दी। इस तरह, राजू भाइयों के न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के 25 दिन बाद इन दोनों से पूछताछ कर पाने में सक्षम हो सका। यह पूछताछ 3 दिन तक चली।
अंतत: 15 फरवरी को एसएफआईओ कोर्ट की अनुमति पा पाने में सफल हुआ था। आयकर विभाग, सीबीआई और आईसीएआई को भी इन दोनों भाइयों के अलावा एस. वाडलामणि और एस गोपालकृष्णन और एस तल्लुरी से पूछताछ की अनुमति पा पाने में काफी मशक्कत कनी पड़ी। ऐसा नहीं कि इन एजेंसियों को अनुमति हासिल करने में हुई दिक्कत के पीछे कोई खास वजह थी।
बल्कि न्यायालय की प्रक्रिया ही ऐसी है कि कोई निर्णय आते-आते कई दिन लग जाते हैं। दूसरी ओर हैदराबाद के जिलाधिकारी नवीन मित्तल ने रामलिंग राजू को ‘विशिष्ट श्रेणी के विचाराधीन कैदी’ का दर्जा दे रखा है।
सरकारी एजेंसियां को पूछ-ताछ की अनुमति लेने के लिए करनी पड़ी मशक्कत
न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के 25 दिन बाद ही मिल पाई पूछताछ की अनुमति