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कायम है आउटसोर्सिंग का जलवा

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Last Updated- December 10, 2022 | 8:16 PM IST

मंदी के माहौल में जहां आईटी कंपनियों को नए ऑर्डर मिलने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, वहीं एचसीएल टेक्नोलॉजिज ने रीडर्स डाइजेस्ट एसोसिएशन के साथ आईटी आउटसोर्सिंग का 7 साल लंबा अनुबंध किया है।
कंपनी के मुताबिक, इस सौदे की कीमत करीब 1,780 करोड़ रुपये है। इस अनुंबध के तहत रीडर्स डाइजेस्ट के कुछ कर्मचारियों को एचसीएल के पे रोल पर भी नियुक्त किया जाना शामिल है। अनुबंध के तहत एचसीएल रीडर डाइजेस्ट को इन्फ्रास्ट्रक्चर सपोर्ट, एप्लिकेशंस डेवलपमेंट मेंटेनेंस सर्विसेज, सिक्योरिटी, स्टोरेज, डाटा सेंटर आदि की सुविधा मुहैया कराएगी।
साथ ही, एचसीएल कंपनी को डिजास्टर रिकवरी सेवाएं भी देगी। इस सौदे के तहत कंपनी रीडर्स डाइजेस्ट के मेन फ्रेम का पुनर्निर्माण करेगी और इसे अपने न्यू जर्सी में स्थित डाटा सेंटर में लेकर जाएगी। गौरतलब है कि रीडर डाइजेस्ट का मुख्यालय न्यूयॉर्क में है। इस डील को पाने के लिए करीब दर्जनभर आईटी कंपनियां कोशिश कर रही थीं, लेकिन साल भर की मशक्त के बाद टीसीएस को यह ऑर्डर मिला है।
एचसीएल टेक्नोलॉजिज के वरिष्ठ उपाध्यक्ष (उत्तरी अमेरिका) आर. श्रीकृष्णा ने बताया कि इस सौदे से प्राप्त आय का आकलन अगले कारोबारी साल की पहली तिमाही में किया जाएगा। यह इस साल भारतीय आईटी कंपनियों को मिला इकलौता सबसे बड़ा सौदा नहीं है। पिछले तीन महीनों में भारतीय आईटी कंपनियां देसी और विदेशी बाजार में सात-आठ बड़े सौदे कर चुकी हैं।
मिसाल के तौर पर विप्रो को इम्प्लॉय स्टेट इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन (ईएसआईसी) से 1,182 करोड़ रुपये का मोटा-ताजा ठेका मिला था। विश्लेषकों की मानें तो ऐसे सौदे इस बात की गवाही दे रहे हैं कि भारत का ऑउटसोर्सिंग उद्योग तेजी से विकास कर रहा है।
आज कंपनियां खर्चों को कम करने के लिए इसी का सहारा ले रही हैं। किफायती होने के साथ-साथ ऐसे सौदों में खरीदारों को कंप्यूटर से जुड़ी सारी सुविधाएं मुहैया करवाई जाती हैं। मिसाल के तौर पर एचसीएल और रीडर्स डाइजेस्ट के इसी सौदें को ले लीजिए। इसके तहत कंपनी, रीडर्स डाइजेस्ट के 45 देशों और 14 भाषाओं में चल रहे कारोबार को तकनीकी सहयता मुहैया करवाएगी।
इसके तहत अप्लीकेशंस डेवलपमेंट और इन्फ्रास्ट्रक्चर सपोर्ट की सेवाएं शामिल है। वह यह मदद ओरेकल यूनिवर्स, ओपेन टेक्नोलॉजीज औक मेनफ्रेम के प्लेटफॉर्म पर मुहैया करवाएगी। माइंडप्लेक्स कंसल्टिंग के निदेशक और संस्थापकों में से एक, सव्यसाची सतपती का कहना है कि, ‘ऑउटसोर्सिंग आज का सुपरहिट मंत्र है। आज इसकी धारा को रोकने या मोड़ने की कोशिश कामयाब नहीं हो सकती है। दुनिया की बड़ी कंपनियां इस धारा को बदलने के बारे में सोच भी नहीं सकती हैं।
दरअसल, ऐसा करने पर कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। 2008 के अंत से तो यह सोच और भी पक्की होती जा रही है कि मंदी के इस दौर में खर्चे कम करने का सबसे सही तरीका ऑउटसोर्सिंग ही है।’ थोलोन्स एडवाइजरी में पाटर्नर वीनू कारथा की मानें तो सौदे की कीमत तो नीचे जा चुकी है, लेकिन ऑउटसोर्सिंग उद्योग आज भी पहले ही की तरह फल-फूल रहा है।
उनका कहना है कि, ‘इसकी सबसे बड़ी वजह तो यही है कि लागत में कटौती आज ग्राहकों की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। इसीलिए तो वह ऑउटसोर्सिंग का सहारा ले रहे हैं।’ इस बात से एसेइंडिया के प्रमुख विश्लेषक आलोक शिंदे भी इत्तेफार रखते हैं। उनका कहना है कि, ‘अगर 2007 और 2008 के आंकड़ों की तरफ गौर से देखें तो इन सालों में सौदों की तादाद में कोई बड़ा अंतर नहीं आया है।’

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First Published - March 17, 2009 | 2:20 PM IST

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