लार्सन एंड टुब्रो के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक अनिल मणिभाई नाइक बहुमुखी प्रतिभा के धनी और मेहनतकश इंसान हैं।
वर्ष 1999 में वे एलऐंडटी में बतौर सीईओ और प्रबंध निदेशक शामिल हुए और अपनी कार्यकुशलता और उद्यमशीलता के दम पर 2003 में कंपनी के चेयरमैन पद पर आसीन हो गए। उनके नेतृत्व में एलऐंडटी का व्यापक विस्तार हुआ और बड़ी-बड़ी परियोजनाओं को कंपनी ने बखूबी अंजाम दिया।
इन परियोजनाओं में दिल्ली एयरपोर्ट, दिल्ली मेट्रो और हाईवे परियोजनाएं शामिल हैं। इन दिनों वे संकट में फंसी सत्यम कंप्यूटर की खरीदारी की दौड़ में शामिल होने से चर्चा में हैं। इसमें कोई शक नहीं कि उनके नेतृत्व में एलऐंडटी इन्फ्रास्ट्रक्चर से लेकर सॉफ्टवेयर क्षेत्र में भी सफलता के झंडे गाड़ेगी।
कंपनी सत्यम में इसलिए भी दिलचस्पी ले रही है, क्योंकि एलऐंडटी के पास सत्यम की 4 फीसदी हिस्सेदारी है। नाइक को जानने वाले कहते हैं कि उन्हें आईटी और मानव संसाधन क्षेत्र का भी अच्छा अनुभव है।
दरअसल, सहायक कंपनी एलऐंडटी इन्फोटेक को भी वे अच्छी तरह चला रहे हैं। एलऐंडटी इन्फोटेक की स्थापना 1997 में की गई थी और इस समय इस संस्थान में करीब 10,000 कर्मचारी काम कर रहे हैं। कंपनी का सालाना कारोबार करीब 2,000 करोड़ रुपये का है।
कंपनी के ग्राहकों में कई नामी-गिरामी कंपनियां शामिल हैं, जिनमें हिताची, लाफार्ज और शेव्रॉन प्रमुख हैं। सत्यम में फर्जीवाड़े के खुलासे के बाद उन्होंने कंपनी के अधिग्रहण की बात तो की, लेकिन कंपनी की देनदारियों का वहन करने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया।
पिछले साल बिजनेस स्टैंडर्ड को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि वर्ष 1964 में जब वे असिस्टेंट इंजीनियर के पद के लिए एलऐंडटी में शामिल होना चाहते थे, तो उन्हें नहीं लिया गया और आज वे कंपनी के शीर्षस्थ पद पर आसीन हैं।
यह उनकी योग्यता और काबिलियत का ही परिणाम है। एलऐंडटी के तत्कालीन महाप्रबंधक दानिश ने उन्हें ओवर स्मार्ट करार दिया, लेकिन उनके बॉस ने नाइक को नौकरी दे दी। नाइक की प्रारंभिक शिक्षा गुजरात के उनके गांव खारेल में हुई और आगे की पढ़ाई उन्होंने आणंद के नजदीक वल्लभ विद्यानगर में की।
नाइक पढ़ाई में शुरू से ही तेज थे, लेकिन अंग्रेजी में वे थोड़े कमजोर थे। इसी कमजोरी की वजह से स्टील कंपनी मुकुंद में उन्हें नौकरी नहीं मिल पाई थी।