बीएस बातचीत
प्रमुख वाहन कंपनी महिंद्रा ऐंड महिंद्रा के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी पवन गोयनका ने शैली सेठ मोहिले से बातचीत में कहा कि आगामी बजट मांग सृजन पर केंद्रित होना चाहिए। उनका कहना है कि विनिर्माण को कहीं अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए एक निश्चित रूपरेखा तैयार की जानी चाहिए। पेश हैं मुख्य अंश:
अर्थव्यवस्था के संबंध में वाहन बाजार की मांग को आप किस तरह देखते हैं?
कई लोगों का मानना था कि मांग त्योहारी सीजन के बाद बरकरार नहीं रहेगी लेकिन वह दमदार बनी रही। जाहिर तौर पर हम जो मांग देख रहे हैं वह ढांचागत है न कि अटकी हुई। सवाल यह है कि क्या यह बरकरार रहेगी अथवा कुछ ही महीनों में खत्म हो जाएगी। रोजगार, आय और अर्थव्यवस्था के बारे में लोगों की चिंताओं के बावजूद वाहन क्षेत्र की मांग अच्छी रही है। अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने के साथ ही मांग में भी तेजी आनी चाहिए। वाहनों की मांग अर्थव्यवस्था से जुड़ी हुई है। मुझे नहींं लगता है कि अगले 8 से 10 महीनों के दौरान मांग में कमी आएगी। मांग को प्रोत्साहन से मदद मिलेगी। हालांकि वस्तु एवं सेवा की दरों में कटौती की उम्मीद नहीं है लेकिन स्क्रैपेज नीति मांग सृजन और पर्यावरण की दृष्टि से उठाया गया एक सकारात्मक कदम हो सकता है। जिंस में तेजी के कारण वाहनों की कीमतों में किसी भी प्रकार की वृद्धि अथवा नियामकीय बदलाव के कारण मांग में कमी दिख सकती है। खरीदारों के लिए ईएमआई अधिक नहीं होना चाहिए। मुझे उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2021 के मुकाबले वित्त वर्ष 2022 में कुछ वृद्धि दिख सकती है।
पिछले कुछ वर्षों से निजी निवेश की रफ्तार सुस्त पड़ गई है। इसमें तेजी कब तक आने की उम्मीद है?
मांग के कारण ही निवेश होता है। यदि मांग बढ़ती है और उत्पाद एवं तकनीक में निवेश करने की जरूरत होती है तो कंपनियां निवेश करती हैं। ट्रैक्टर उद्योग का ही उदाहरण लेते हैं। यह उद्योग अपनी अधिकतम क्षमता पर परिचालन कर रहा है। आपने सभी ट्रैक्टर विनिर्माताओं को वित्त वर्ष 2022 और वित्त वर्ष 2023 तक क्षमता विस्तार के लिए निवेश की घोषणा करते सुना होगा। यह हजारों में नहीं बल्कि सैकड़ों करोड़ रुपये में हो सकता है। इसके विपरीत, वाहन उद्योग में फिलहाल काफी उत्पादन क्षमता है। इसलिए मैंने किसी को भी क्षमता विस्तार पर निवेश की घोषणा करते नहीं सुना है। लेकिन उत्पाद और तकनीक में बहुत अधिक निवेश दिख रहा है। उदाहरण के लिए, महिंद्रा ने उत्पाद एवं तकनीक में निवेश में कोई कटौती नहीं की है। हमारे पास तीन से चार साल तक परिचालन के लिए पर्याप्त क्षमता मौजूद है। कुछ अपवाद को छोड़कर अधिकतर कंपनियों की यही स्थिति है।
निवेश और मांग को पुनर्जीवित करने के लिए सरकार को क्या करना चाहिए?
मांग बढऩे पर निवेश करना पड़ता है। निवेश चक्र को पुनर्जीवित करने का एक उल्लेखनीय तरीका पीएलआई (उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन योजना) का तेजी से कार्यान्वयन हो सकता है। इससे विनिर्माण क्षेत्र में 20 से 25 फीसदी की वृद्धि हो सकती है। इसलिए प्रत्यक्ष निवेश के बजाय इसे बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
भारतीय विनिर्माण को कहीं अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने की जरूरत है क्योंकि इसके बिना निर्यात में कोई सार्थक वृद्धि नहीं हो सकती है। कुछ ऐसे कारक हैं जो प्रतिस्पर्धा को बढ़ाते हैं। बड़े पैमाने पर उत्पादन भी उसमें से एक है। मुझे उम्मीद है कि पीएलआई योजना कुछ चैंपियन तैयार करेगी। एक देश के रूप में हमें जिन मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है वे हैं बिजली, भूमि और श्रम लागत को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना। आगामी बजट में इस संबंध में कोई निश्चित घोषणा हो सकती है। इसे महज एक साल में नहीं किया जा सकता है बल्कि इसमें अगले कुछ साल लग सकते हैं। विनिर्माण को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है क्योंकि इसमें अगले पांच वर्षों के दौरान अर्थव्यवस्था में आधा लाख करोड़ जोडऩे की क्षमता है।
कई लोगों का मानना है कि आयात को विनियमित करने के लिए हालिया उपाय और शुल्क में वृद्धि उस देश के लिए अच्छा नहीं रहेगा जो विनिर्माण केंद्र बनने और अधिक निर्यात करने की इच्छा रखता हो। इस पर आप क्या कहेंगे?
मेरा मानना है कि इस तरह के उपाय लंअी अवधि के लिए अच्छे नहीं हैं। कभी-कभी वे मुक्त-व्यापार समझौतों का दुरुपयोग करते हुए भी आते रहे हैं। हो सकता है कि हालिया उपाय उन्हें सही करने के उद्देश्य से हो। उद्योग को प्रतिस्पर्धी बनने के लिए किसी भी तरह की सुरक्षा पर भरोसा नहीं करना चाहिए। आयात शून्य से न्यूनतम होना चाहिए न कि 15 से 21 फीसदी। श्रम, भूमि, लॉजिस्टिक्स और बिजली संबंधी अधिक लागत से उत्पादन लागत बढ़ती है। इससे समग्र विनिर्माण लागत 8 से 10 फीसदी बढ़ जाती है।