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IT सेक्टर में लेऑफ से मचे हाहाकार के बीच NITES की मांग: छंटनी की बजाय नई स्किल्स सिखाओ

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टेक सेक्टर में AI के कारण बढ़ती छंटनी पर 'नाइट्स' ने चिंता जताई है। संस्था ने कंपनियों से रिस्किलिंग और सरकार से मजबूत सुरक्षा कानून की मांग की है

Last Updated- April 05, 2026 | 5:51 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

IT सेक्टर के कर्मचारियों की संस्था नाइट्स (NITES) ने टेक कंपनियों से साफ अपील की है कि नौकरियां काटने की बजाय अपने स्टाफ को नई स्किल्स सिखाने पर ज्यादा पैसा और ध्यान लगाएं। साथ ही सरकार से मांग की है कि सफेदपोश यानी व्हाइट कॉलर वर्कर्स के लिए मजबूत सुरक्षा कवच बनाया जाए और लेऑफ के समय अनिवार्य सेवरेंस पैकेज जैसे नियम लागू किए जाएं। AI को लेकर कंपनियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं, जिसकी वजह से जॉब कटौती का सिलसिला चल रहा है और पूरे वर्कफोर्स में अनिश्चितता का माहौल बन गया है।

नाइट्स का कहना है कि टेक कंपनियों के मुनाफे अभी भी अच्छे-खासे हैं, फिर भी जॉब सिक्योरिटी कमजोर हो रही है। इससे कॉर्पोरेट की जिम्मेदारी और जवाबदेही पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

रिस्किलिंग पहले, छंटनी आखिरी विकल्प बने

नाइट्स के अध्यक्ष हरप्रीत सिंह सलूजा ने बताया कि कंपनियों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। अगर वे AI में भारी निवेश कर रही हैं तो अपने मौजूदा कर्मचारियों को रिस्किलिंग में भी पैसा लगाना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि लेऑफ को आखिरी विकल्प बनाना चाहिए, पहला नहीं।

सलूजा ने पॉलिसी बनाने वालों से तुरंत कदम उठाने की अपील की। उनका कहना है कि भारत में प्राइवेट सेक्टर के व्हाइट कॉलर कर्मचारियों के लिए अभी कोई मजबूत कानूनी सुरक्षा नहीं है। हमें लेऑफ के लिए साफ-साफ गाइडलाइंस चाहिए, अनिवार्य नोटिस पीरियड, उचित सेवरेंस पैकेज और बड़े पैमाने पर छंटनी में कंपनियों की जवाबदेही तय करनी चाहिए।

उन्होंने कर्मचारियों से भी अपील की कि वे अपने अधिकारों के बारे में जागरूक रहें और लगातार स्किल्स अपग्रेड करते रहें। नाइट्स अब आगे चलकर अनफेयर लेऑफ और जबरन इस्तीफे के खिलाफ पॉलिसी लेवल के बदलाव के लिए दबाव बनाएगी। सलूजा ने कहा कि वे सरकारी अधिकारियों के सामने ये मुद्दे पहले से उठा रहे हैं। अब मजबूत कानूनी फ्रेमवर्क और सख्ती के लिए और ज्यादा काम करेंगे।

टेक सेक्टर में AI के नाम पर छंटनी का तूफान

पिछले कुछ महीनों में टेक इंडस्ट्री में छंटनी की खबरें लगातार आ रही हैं। ओरेकल, गूगल और मेटा जैसी बड़ी कंपनियों ने हजारों पद काट दिए। शुरू में यह पेंडेमिक के दौरान ज्यादा भर्ती का सुधार था, लेकिन अब AI की तरफ शिफ्ट ने इसे और तेज कर दिया है।

लेऑफ्स ट्रैकिंग साइट लेऑफ्स.एफवाईआई के आंकड़ों के मुताबिक इस साल अब तक 70 से ज्यादा टेक कंपनियों ने ग्लोबली कुल 40,480 नौकरियां काट दी हैं। कई एक्सपर्ट्स कहते हैं कि AI को कटौती का आसान बहाना बनाया जा रहा है, जबकि असल में कॉस्ट कटिंग, इन्वेस्टरों का दबाव और पुरानी ओवरहायरिंग का करेक्शन भी बड़ा कारण है।

हाल ही में ओरेकल ने ग्लोबली हजारों जॉब्स काटे, जो हाल के सालों में टेक सेक्टर की सबसे बड़ी सिंगल-डे लेऑफ में से एक है। कंपनी के चेयरमैन लैरी एलिसन AI वर्कलोड के लिए बड़े डेटा सेंटर पर दांव खेल रहे हैं, फिर भी छंटनी हुई। रिपोर्ट्स कहती हैं कि भारत में ओरेकल ने करीब 12,000 स्टाफ को निकाला है और एक महीने में और कटौती की आशंका है। ग्लोबली कंपनी ने करीब 30,000 लोगों को बाहर किया। मई 2025 तक कंपनी के पास कुल 1,62,000 कर्मचारी थे।

सलूजा ने इसे स्ट्रक्चरल शिफ्ट बताया। उन्होंने कहा कि कंपनियां अब लीनर टीम्स, ज्यादा प्रोडक्टिविटी और कॉन्ट्रैक्ट या फ्लेक्सिबल हायरिंग की तरफ बढ़ रही हैं। लंबे समय की जॉब सिक्योरिटी कमजोर हो रही है, लेकिन नए रोल्स आएंगे। समस्या यह है कि ट्रांजिशन को जिम्मेदारी से हैंडल नहीं किया जा रहा।

मजबूत मुनाफे के बावजूद कर्मचारियों की जिंदगी उलट-पुलट

कई कंपनियां फाइनेंशियली मजबूत होने के बावजूद शेयरहोल्डर्स को ज्यादा रिटर्न देने और मार्केट को एफिशिएंट दिखाने के लिए हेडकाउंट घटा रही हैं। ब्लॉक कंपनी, जिसके प्रमुख जैक डोर्सी हैं, ने 4,000 से ज्यादा यानी करीब 40 प्रतिशत स्टाफ को निकाल दिया। पिंटरेस्ट, क्राउडस्ट्राइक और चेग जैसी कंपनियों ने भी AI अपनाने का हवाला देकर छंटनी की।

सलूजा ने कहा कि कंपनियां AI और हाई-ग्रोथ एरिया में रिसोर्सेज शिफ्ट कर रही हैं, लेकिन कर्मचारियों को बिना सपोर्ट के बाहर कर दिया जा रहा है। इस ‘6 एम ईमेल कल्चर’ ने पूरे सेक्टर में दहशत फैला दी है, जहां सुबह छह बजे ईमेल आता है और बैज डिएक्टिवेट हो जाता है, इससे पहले कर्मचारी लॉगिन भी नहीं कर पाता।

छंटनी का असर सिर्फ जॉब पर नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी पर पड़ रहा है। सलूजा ने बताया कि हमने एंग्जायटी, डिप्रेशन, कॉन्फिडेंस लॉस और फैमिली ब्रेकडाउन तक के केस देखे हैं। कई कर्मचारी लोन चुकाते हैं, परिवार संभालते हैं और महंगे शहरों में रहते हैं। फिर भी कंपनियां मेंटल हेल्थ सपोर्ट, करियर ट्रांजिशन या सम्मानजनक तरीके से छंटनी पर बहुत कम ध्यान दे रही हैं।

(PTI के इनपुट के साथ)

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First Published - April 5, 2026 | 5:40 PM IST

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