इलाई लिली ऐंड कंपनी कीमत आधारित रणनीति से हटकर नई दिशा का संकेत दे रही है। भारत में शुक्रवार को सेमाग्लूटाइड की पेटेंट मियाद खत्म होने से पहले वह अपने उपचार टरजेपाटाइड को चिकित्सकीय रूप से बेहतर विकल्प के तौर पर पेश कर रही है। उम्मीद है कि पेटेंट खत्म होने से सस्ती जेनेरिक दवाओं की आवक काफी तेज हो जाएगी। जीएलपी-1 के इलाज तक लोगों की पहुंच बढ़ेगी तथा देश में मधुमेह और मोटापे के तेजी से बढ़ते बाजार में प्रतिस्पर्धा में और इजाफा हो जाएगा।
लिली इंडिया के अध्यक्ष और महाप्रबंधक विंसलो टकर ने कहा, ‘टरजेपाटाइड की खासियत इसके दोहरे तंत्र में है, जो जीआईपी और जीएलपी-1 दोनों रिसेप्टर्स को लक्ष्य करती है, जबकि सेमाग्लूटाइड केवल जीएलपी-1 रिसेप्टर को लक्ष्य बनाती है।’ उन्होंने कहा कि उनकी दवा के बेहतर क्लीनिकल परिणाम मिले हैं, विशेष रूप से वजन घटाने में, जिसे कंपनी प्रमुख प्रतिस्पर्धी लाभ के रूप में बता रही है।
कंपनी के बताए क्लीनिकल आंकड़ों से पता चलता है कि टरजेपाटाइड लेने वाले रोगियों ने औसतन 20.2 प्रतिशत से अधिक वजन घटाया, जबकि सेमाग्लूटाइड लेने वाले रोगियों ने लगभग 13 से 14 प्रतिशत वजन घटाया। इससे तेजी से प्रतिस्पर्धी होते बाजार में लिली की परिणाम आधारित स्थिति और मजबूत होती है।
यह रणनीति जीएलपी-1 क्षेत्र में चल रहे व्यापक बदलाव को दर्शाती है। जैसे-जैसे पहली पीढ़ी की चिकित्सा पद्धतियों का एकाधिकार समाप्त हो रहा है, नवाचार चक्र केवल मूल्य संबंधी प्रतिस्पर्धा के बजाय कई लक्ष्यों वाली दवाओं तथा अधिक शक्तिशाली इंक्रीटिन आधारित उपचारों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।
लिली अपनी बढ़ती हुई दवाओं के साथ इस रणनीति को आगे बढ़ा रही है। इसके बाद वाले चरण के पोर्टफोलियो में ओरल जीएलपी-1 दवा ऑर्फोर्ग्लिप्रोन और प्रायोगिक ट्राई-एगोनिस्ट रेटैट्रुटाइड शामिल हैं। इन दोनों का उद्देश्य दीर्घकालिक वजन प्रबंधन में प्रभावकारिता और सुविधा में सुधार करना है। नॉन-पेप्टाइड ओरल उपचार ऑर्फोर्ग्लिप्रोन को 40 से अधिक देशों के नियामकों के पास पेश किया जा चुका है। इस पर अमेरिका का निर्णय साल 2026 में आने की उम्मीद है। कंपनी ने कहा कि वह नियामकीय मंजूरी मिलने पर इस तरह के नवाचारों को भारत लाने की योजना बना रही है।
व्यावसायिक रणनीति के अलावा लिली अपने वैश्विक नवाचार तंत्र में भारत की भूमिका भी मजबूत कर रही है। उसका हैदराबाद का प्रौद्योगिकी और नवाचार केंद्र एआई, स्वचालन और डेटा साइंस पर केंद्रित है, जबकि बेंगलूरु केंद्र क्लीनिकल परीक्षणों, दवा विकास और डिजिटल परिवर्तन में सहयोग करता है। भारत का इस्तेमाल अब तेजी से क्लीनिकल अध्ययन के आखिरी चरणों के लिए भी किया जा रहा है, जिसमें यहां के अलग-अलग तरह के मरीजों की बड़ी संख्या से मदद मिल रही है।