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कोलकाता के चमड़ा उद्योग पर दोहरी मार: अमेरिकी शुल्क की अनिश्चितता व पश्चिम एशिया युद्ध ने बढ़ाई टेंशन

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अमेरिकी शुल्क पर अनिश्चितता और पश्चिम एशिया युद्ध ने कोलकाता के चमड़ा निर्यात को संकट में डाल दिया है, जिससे माल ढुलाई महंगी और ऑर्डर रद्द हो रहे हैं

Last Updated- March 10, 2026 | 10:55 PM IST
leather industry
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

लगभग एक महीने पहले व्यापार करार पर अमेरिका के साथ भारत के संयुक्त बयान से कोलकाता के चमड़ा उद्योग (लेदर हब) पर दबाव कुछ हद तक कम हुआ था। व्यापार समझौते के तहत भारतीय उत्पादों के निर्यात पर अमेरिका में शुल्क 50 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी करने की बात कही गई थी। 

शुल्क घटने से भारतीय चमड़ा उत्पाद दुनिया के बड़े उपभोक्ता बाजार में प्रतिस्पर्धी स्थिति में आ गए और नए ऑर्डर मिलने की उम्मीद बढ़ गई। मगर अमेरिकी अदालत द्वारा ट्रंप प्रशासन के शुल्क आदेश को रद्द करने के बाद फिर से अनिश्चितता बढ़ गई है।

पूर्वी कोलकाता के बाहरी इलाके में स्थित बांतला में क्रिसेंट एक्सपोर्ट सिंडिकेट के कारखाने में इसके संकेत भी दिखने लगे। उत्पादन लाइन अमेरिकी बाजार के लिए हैंडबैग बनाने में व्यस्त हैं जिनकी आपूर्ति करीब दो महीने में होने वाली है। कुछ तैयार माल पहले से ही कार्टन में पैक किए गए हैं और वे अमेरिका भेजने के लिए तैयार हैं। इस बीच पश्चिम एशिया के संकट ने एक नई अनिश्चितता खड़ी कर दी। पहले से ही मुश्किलों का सामना कर रहे चमड़ा निर्यातकों के लिए अब नई चुनौती सामने आ गई है।

शुल्क पर अनिश्चितता

क्रिसेंट के कारखाने में ह्यूगो बॉस के वैश्विक बाजारों के लिए हैंडबैग और वॉलेट बनाए जाते हैं। क्रिसेंट एक्सपोर्ट सिंडिकेट के प्रबंध निदेशक एम अजहर ने कहा, ‘अमेरिका जाने वाली खेप रोक दी गई थी क्योंकि ऊंचे शुल्क ने यहां से निर्यात को अव्यावहारिक बना दिया था। इसलिए हमने खेपों को यूरोप के गोदामों में भेज दिया, जहां से उन्हें अमेरिका भेजा जा सकता था।’

उन्होंने कहा कि अब अमेरिका, कनाडा और अन्य बाजारों से नए ऑर्डर आ रहे हैं। अजहर ने कहा, ‘उत्पादन जारी है और लगभग दो महीनों में तैयार हो जाना चाहिए। इस बीच हमें उम्मीद है कि शुल्क पर स्पष्टता होगी।’ 

अदालत द्वारा शुल्क आदेश रद्द किए जाने के बाद व्हाइट हाउस ने 10 फीसदी का अधिभार लगा दिया और बाद में अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कहा कि शुल्क 15 फीसदी होगा। 

जेसी इंटरनैशनल के प्रबंध निदेशक केविन जुनेजा ने कहा, ‘इस बात की ज्यादा संभावना है कि शुल्क 15 फीसदी होने जा रहा है।’ शुल्क से पहले कंपनी का लगभग 30 फीसदी व्यवसाय अमेरिका से आता था।

जुनेजा ने कहा कि शुल्क पर अंतिम निर्णय का इंतजार है और अमेरिकी खरीदारों के साथ बातचीत चल रही है। उन्होंने कहा कि हाल तक चीजें ठप थीं मगर अब लोग बात करने के लिए तैयार हैं।

एडकॉन्स एक्सपोर्ट्स में अमेरिकी ब्रांड केनेथ कोल और नॉटिका के साथ भारतीय बाजार के लिए बातचीत शुरू हुई है। कंपनी पहले से ही एक और अमेरिकी ब्रांड टॉमी हिलफिगर के साथ काम कर रही है।

शुल्क के झटके से पहले एडकॉन्स आक्रामक रूप से अमेरिकी बाजार में विस्तार कर रहा थी जो उसके निर्यात का लगभग 7 फीसदी है। यूरोप इसका मुख्य बाजार बना हुआ है। हालांकि शुल्क पर अनिश्चितता से उसके विस्तार पर अचानक रोक लग गई।

एडकॉन्स एक्सपोर्ट्स के संस्थापक और प्रबंध निदेशक राणा राजर्षि दे ने कहा, ‘चीजें अब बदल रही हैं। लेकिन अमेरिकी खरीदार अभी भी बड़े ऑर्डर देने के बारे में सतर्कता बरत रहे हैं।’ उन्होंने कहा, ‘मांग है मगर खरीदार प्रस्तावित 15 फीसदी शुल्क पर स्पष्टता आने तक खरीदारी रोक रहे हैं।’

आपूर्ति श्रृंखला में अड़चन

कलकत्ता लेदर कॉम्प्लेक्स (सीएलसी) से कुछ किलोमीटर दूर बसंती राजमार्ग पर अपने चमड़ा कारखाने में 36 वर्षीय उद्यमी इंद्रनाथ सेनगुप्ता अगस्त 2025 में आई बाधा को याद करते हैं, जब ट्रंप प्रशासन ने 25 फीसदी का अतिरिक्त शुल्क लगाया था जिससे भारतीय वस्तुओं पर कुल प्रभावी शुल्क 50 फीसदी हो गया था।

एएसजी कोम्पानेरो के निदेशक और सीईओ इंद्रनाथ सेनगुप्ता ने कहा, ‘हमारे व्यवसाय का 60 से 70 फीसदी निर्यात से आता है और उसमें अमेरिकी बाजार की हिस्सेदारी 40 फीसदी है। मगर शुल्क बढ़ने के बाद कारोबार रातोरात ठप हो गया।’

सेनगुप्ता ने कहा, ‘अमेरिकी स्टोरों ने ऑर्डर बीच में ही रद्द कर दिया और नए ऑर्डर वियतनाम ले गए। वे 50 फीसदी शुल्क को वहन करने को तैयार नहीं थे। इससे हमें कुछ काम कम करने के लिए मजबूर होना पड़ा।’ शुल्क के झटके का असर कामगारों पर भी पड़ा है।

चमड़ा निर्यात परिषद (सीएलई) के अध्यक्ष और जेसी ग्रुप के अध्यक्ष रमेश जुनेजा के अनुसार अमेरिकी शुल्क में वृद्धि से चमड़ा इकाइयों में ठेके पर काम करने वाले 10 से 15 फीसदी कामगारों पर असर पड़ा है। कोलकाता के चमड़ा उद्योग में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से लगभग 7,00,000 लोगों को काम मिला है। इनमें से अधिकांश बांतला में 1,100 एकड़ के कॉम्प्लेक्स में काम करते हैं। पिछले दो दशक में उद्योग लगातार बढ़ा है। टांगरा, टॉपसिया और तिलजला व्यापार के ऐतिहासिक केंद्र में उत्पादन की छोटी इकाइयां थीं जिसने हजारों वर्ग फुट में फैले बड़े कारखानों के लिए आधार तैयार किया।

एकीकृत परिसर में टैनरी, प्रसंस्करण और विनिर्माण इकाइयां हैं। हालांकि कुछ परिसर के बाहर भी हैं। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद 2000 के दशक की शुरुआत में टैनरी को बांतला में स्थानांतरित कर दिया गया था। लेकिन बांतला हो या पुराने क्लस्टर पश्चिम एशिया में युद्ध का असर कारोबार पर पड़ रहा है। यूरोप के लिए माल ढुलाई अब हवाई मार्ग के जरिये की जा रही है जिससे मालवहन लागत बढ़ रही है।

अजहर ने कहा, ‘हम पश्चिम एशिया के माध्यम से यूरोप में बहुत सारा माल हवाई मार्ग से भेजते थे। अब हम सीधे दिल्ली और मुंबई से माल भेज रहे हैं लेकिन माल ढुलाई दर महंगा हो गया है।’ समुद्री खेप कम प्रभावित हुई हैं क्योंकि वे स्वेज नहर से गुजरती हैं या जब आवश्यक हो, केप ऑफ गुड होप होते हुए लंबे मार्ग से जाती हैं। लेकिन यूरोप के लिए हवाई शिपमेंट बुरी तरह बाधित हुए हैं। डे ने कहा, ‘यूरोप के लिए हवाई शिपमेंट पूरी तरह से ठप हो गया है।’

कोलकाता से एडकॉन्स का पिछले सप्ताह का शिपमेंट 21 मार्च से पहले एयरकार्गो से भेजे जाने की उम्मीद नहीं है।

हवाई यात्रा में व्यवधानों के कारण सीएलई को इस महीने के अंत में अमेरिका और स्पेन में होने वाली क्रेता-विक्रेता बैठकों को भी स्थगित करना पड़ा। जुनेजा ने कहा, ‘हमने उन्हें रद्द कर दिया है क्योंकि लोग यात्रा नहीं कर सकते हैं।’

एक निर्यातक ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, ‘कोई भी यात्रा करने के मूड में नहीं है।’

युद्ध से भले ही मुश्किल हो रही हो लेकिन निर्यातकों को उम्मीद है कि संघर्ष जल्द ही खत्म हो जाएगा। वे अमेरिकी शुल्क पर स्पष्टता का भी इंतजार कर रहे हैं जो नए अवसरों के द्वार खोल सकता है।

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First Published - March 10, 2026 | 10:55 PM IST

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