बेंगलूरु की प्रमुख बायोफार्मास्युटिकल कंपनी बायोकॉन ने शुक्रवार को श्रीहंस तांबे को अपना मुख्य कार्याधिकारी और प्रबंध निदेशक नियुक्त किया। यह नियुक्ति 1 अप्रैल से होगी। अंजलि सिंह के साथ विशेष बातचीत में तांबे ने एकीकृत कंपनी के लिए तीन-सूत्री रणनीति बताई, जो लोगों, प्रौद्योगिकी और मरीजों तक पहुंच पर केंद्रित है। साथ ही उन्होंने क्षमता-आधारित बढ़ोतरी से संबंधित बदलाव का भी संकेत दिया। बातचीत के मुख्य अंश:
एकीकरण के बाद एमडी और सीईओ के तौर पर आपकी मुख्य प्राथमिकताएं क्या होंगी?
जब आप इस तरह का एकीकरण करते हैं, तो सबसे जरूरी चीज लोग होते हैं। यही हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता रहेगी। हमारे पास जेनेरिक्स और बायोसिमिलर्स, दोनों ही क्षेत्रों में बेहतरीन प्रतिभा है और हमारा ध्यान इस क्षमता को अपनी भविष्य की रणनीति के साथ जोड़ने पर है। दूसरी प्राथमिकता है विज्ञान के क्षेत्र में लंबे समय से चले आ रहे निवेश को मजबूत बनाना। इसके लिए हम सप्लाई चेन, कमर्शियल और सीआरएम जैसे कार्यों में मजबूत टेक्नॉलजी प्लेटफॉर्म तैयार करेंगे। इससे हम वैश्विक स्तर पर ज्यादा सटीकता, सक्रियता और एकरूपता के साथ काम कर पाएंगे।
क्या यह एकीकरण बायोसिमिलर्स के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर मजबूत पहल का संकेत है?
इस एकीकरण से हमारा पोर्टफोलियो और ज्यादा व्यापक होगा। हमें उन क्षेत्रों में कदम रखने का अवसर मिलेगा जिन्हें हमने अब तक नहीं खंगाला था। पहले, बायोसिमिलर्स और जेनेरिक्स अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते थे। अब, पेप्टाइड्स और इंसुलिन जैसे क्षेत्र स्पष्ट रूप से एक-दूसरे के पूरक बन गए हैं। हम ऑन्कोलॉजी, इम्यूनोलॉजी और डायबिटीज जैसे सामान्य चिकित्सा क्षेत्रों में भी सक्रिय हैं, जिससे हम बायोसिमिलर्स और जेनेरिक्स, दोनों का ही अधिक प्रभावी ढंग से लाभ उठा पाते हैं। इससे वैश्विक स्तर पर हमारी समग्र प्रतिस्पर्धी स्थिति और भी मजबूत होती है।
आपकी भारत को लेकर क्या रणनीति होगी?
हम हमेशा से भारत में सक्रिय रहे हैं, भले ही हमारे पास सीधा कमर्शियल फ्रंट-ऐंड न रहा हो। हम साझेदारियों के माध्यम से मरीजों की सेवा कर रहे हैं। बायोसिमिलर के क्षेत्र में, हमने एरिस लाइफसाइंसेज के माध्यम से भारत के कारोबार से राजस्व अर्जित किया है। फिलहाल अपना स्वयं का फ्रंट-एंड स्थापित करना तत्काल प्राथमिकता नहीं है, लेकिन विस्तारित पोर्टफोलियो को देखते हुए यह ऐसा विकल्प है जिसका हम आकलन कर सकते हैं।
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एकीकरण से खरीद और वितरण में क्या बदलाव आएंगे?
हम अपने रोगी पहुंच मॉडल पर पुनर्विचार कर रहे हैं। पारंपरिक रूप से जेनेरिक दवाएं वितरक-आधारित चैनल पर निर्भर करती थीं। लेकिन बायोलॉजिक्स में एक मजबूत वाणिज्यिक आधार के साथ, अब हमारे पास सीधे भुगतानकर्ताओं के साथ जुड़ने और एकीकृत वितरण नेटवर्क जैसी अस्पताल श्रृंखलाओं के साथ साझेदारी करने की क्षमता है। अमेरिका में सिविका आरएक्स जैसे सहयोग बताते हैं कि किफायत और लाभप्रदता कैसे दोनों को बरकरार रखा जा सकता है। हम ऐसे मॉडलों का विस्तार करना चाहते हैं।
क्या निर्माण को संयुक्त किया जाएगा? आपूर्ति श्रृंखला कैसे विकसित होंगी?
निर्माण काफी हद तक स्वतंत्र ही रहेगा जिसमें इंसुलिन और पेप्टाइड्स जैसे क्षेत्रों में ही सीमित ओवरलैप होगा। हालांकि, इस एकीकरण से हमें एक साझा सप्लाई चेन के बुनियादी ढांचे का लाभ उठाने में मदद मिलेगी। एकीकृत टेक्नॉलजी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करके लॉजिस्टिक्स, भंडारण और वितरण नेटवर्क एक ही इकोसिस्टम के भीतर काम कर सकते हैं, जिससे उत्पाद डिलिवरी में सटीकता और एकरूपता बेहतर होती है।
एकीकरण का पूंजी आवंटन और लंबी अवधि की रणनीति पर क्या असर पड़ता है?
एकीकरण का एक मुख्य फायदा यह है कि इससे पूंजी आवंटन का एक जैसा फ्रेमवर्क बन जाता है। पहले, फैसले अलग-अलग इकाइयों में बंटे होते थे। अब वे एक जगह लिए जाते हैं, जिससे रणनीतियों को तेजी से और ज्यादा तालमेल के साथ लागू करना मुमकिन हो पाता है। हमारा ध्यान जेनेरिक पर बायोसिमिलर को प्राथमिकता देने पर नहीं है, बल्कि उन क्षेत्रों में निवेश करने पर है जो हमें ‘लागत-आधारित कंपनी’ से बदलकर ‘क्षमता-आधारित संगठन’ बनने में मदद करें, जो विज्ञान, गुणवत्ता, रफ्तार और वैश्विक पहुंच के आधार पर मुकाबला करे।