ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से सूचीबद्ध वाहन कंपनियों पर दबाव बना हुआ है। आपूर्ति में व्यवधान, बढ़ती इनपुट लागत, मांग में उतार-चढ़ाव और मार्जिन को लेकर चिंता बढ़ रही हैं। इन चिंताओं का असर निफ्टी ऑटो इंडेक्स पर भी पड़ा है, जो महीने की शुरुआत से अब तक सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला सेक्टर सूचकांक रहा है। इसमें 14 फीसदी की गिरावट आई है जबकि बेंचमार्क निफ्टी 50 में केवल 7.8 फीसदी की फिसलन दर्ज की गई है।
थोक और खुदरा बिक्री में मजबूती के बावजूद निकट भविष्य की चिंताओं से बाजार का माहौल थोड़ा घबराहट वाला है। यात्री वाहनों को छोड़कर वाहन क्षेत्र के अधिकांश सेगमेंट ने अप्रैल 2025-फरवरी 2026 के दौरान दो अंकों में वृद्धि दर्ज की है। ऐक्सिस सिक्योरिटीज के संचित कारेकर ने इस महीने की शुरुआत में एक रिपोर्ट में बताया था कि उद्योग का समग्र दृष्टिकोण आशावादी बना हुआ है, जिसमें मजबूत मांग, जीएसटी दर में कमी और आयकर की स्थिर दर वित्त वर्ष 2026 में मांग को बढ़ाने वाले प्रमुख कारक हैं।
मैक्वेरी रिसर्च के अनुसार आगे ध्यान मांग और मार्जिन से उत्पन्न होने वाले आय जोखिमों पर रहेगा। ब्रोकरेज फर्म ने स्वस्थ मांग और स्थिर/सुधरते मार्जिन की उम्मीदों के आधार पर सकारात्मक रुख अपनाया है। लेकिन वृद्धि को लेकर अनिश्चितता और मार्जिन जोखिम को देखते हुए उसका अनुमान है कि निकट भविष्य में भारतीय ऑटो शेयरों का प्रदर्शन बाजारों से कमजोर रहेगा।
ईरान युद्ध का घरेलू बाजार और निर्यात दोनों पर दोहरा असर पड़ा है। घरेलू बाजार में ऑटो सेक्टर के सभी सेगमेंट में मजबूत बिक्री के साथ हालात स्थिर बने हुए है जबकि निकट भविष्य में निर्यात में मंदी की आशंका है।
अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच हालिया तनाव से अनिश्चितता और बढ़ गई है, खासकर पश्चिम एशिया और उत्तर अफ्रीका क्षेत्र में खासा निर्यात करने वाले ऑटो निर्माताओं के लिए।
कुल निर्यात के प्रतिशत के रूप में पश्चिम एशिया और उत्तर अफ्रीका क्षेत्र में अशोक लीलैंड की हिस्सेदारी 30 फीसदी, ह्युंडै मोटर इंडिया की 40 फीसदी, मारुति सुजूकी की 12 फीसदी, आयशर मोटर्स (रॉयल एनफील्ड) की 26 फीसदी और बजाज ऑटो की 10 फीसदी है।
एंटिक स्टॉक ब्रोकिंग के श्रीधर कल्लानी कहते हैं, निकट भविष्य में संघर्ष निर्यात की मात्रा पर असर डाल सकता है और इससे माल ढुलाई दरें बढ़ सकती हैं, कच्चे माल की लागत बढ़ सकती है और लॉजिस्टिक्स संबंधी अनिश्चितता के कारण आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो सकती है। बदलती स्थिति सुनियोजित आपूर्ति श्रृंखलाओं और निर्यात विविधीकरण में तेजी की आवश्यकता पर बल देती है। इस क्षेत्र में ब्रोकरेज फर्म मध्यम अवधि में अनुकूल जोखिम-लाभ अनुपात के कारण मारुति सुजूकी इंडिया, टीवीएस मोटर कंपनी और बजाज ऑटो को प्राथमिकता देती है।
घरेलू स्तर पर, ईरान का प्रभाव ऑटो कंपनियों और उनके आपूर्तिकर्ताओं दोनों पर पड़ेगा क्योंकि गैस इस क्षेत्र में विनिर्माण प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। पेंट कारखाने आमतौर पर पूरी क्षमता से संचालित होते हैं और इनमें गैस का उपयोग काफी ज्यादा होता है। इसके बाद फोर्जिंग, कास्टिंग और धातु
नोमूरा रिसर्च के कपिल सिंह और सिद्धार्थ बेरा का मानना है कि मारुति सुजूकी, टीवीएस और बजाज जैसी वाहन निर्माता कंपनियां और बालकृष्ण इंडस्ट्रीज, अपोलो टायर्स, उनो मिंडा और भारत फोर्ज जैसी कलपुर्जा आपूर्तिकर्ता अगर अपनी दैनिक आपूर्ति से ज्यादा गैस का उपभोग करती हैं तो गैस की कमी और हाजिर गैस की ऊंची कीमतों से ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं। टायर कंपनियां भी ऊर्जा का कच्चे माल के रूप में उपयोग करती हैं और कुछ हद तक कम गैस आपूर्ति संभाल सकती हैं।
नोमूरा की कवरेज में शामिल शेयरों ने भले ही इस जोखिम पर कोई प्रतिक्रिया न दी हो, लेकिन ब्रोकरेज फर्म का कहना है कि निवेशकों को अगले एक सप्ताह में एलएनजी आपूर्ति में कमी आने की स्थिति में उत्पादन पर पड़ने वाले संभावित असर पर नजर रखनी चाहिए। फर्म ने महिंद्रा ऐंड महिंद्रा और
टाटा मोटर्स कमर्शियल व्हीकल्स को खरीद की रेटिंग दी है।
जेपी मॉर्गन रिसर्च का मानना है कि मौजूदा भू-राजनीतिक संघर्ष और बढ़ती कमोडिटी कीमतों से भारतीय वाहन उद्योग के लिए उत्पादन में बाधा और लागत में वृद्धि का दोहरा खतरा पैदा हो रहा है।
उनका मानना है कि पेट्रोल पंपों पर सीएनजी की उपलब्धता में संभावित रुकावट इन वाहनों को लेकर उपभोक्ताओं की पसंद को प्रभावित कर सकती है। ब्रोकरेज फर्म का यह भी कहना है कि ईंधन और कमोडिटी की ऊंची लागत से मार्जिन पर असर पड़ सकता है जबकि उपभोक्ता के कमजोर सेंटिमेंट जीएसटी कटौती के बाद आई बहाली को नुकसान पहुंचा सकते हैं।