बुधवार को मुकेश अंबानी की यह घोषणा कि सऊदी अरामको के साथ प्रस्तावित सौदे में देरी होगी, इससे इस बात की चिंता पैदा हुई है कि क्या रिलायंस इंडस्ट्रीज और सऊदी अरामको सौदे की संभावना अब कम हो रही है।
आरआईएल के चेयरमैन व प्रबंध निदेशक अंबानी ने बुधवार को शेयरधारकों को सूचित किया कि ऊर्जा बाजार में अपरिहार्य परिस्थितियों और कोविड-19 के हालात के कारण सौदे पर मूल समयसीमा के मुताबिक प्रगति नहीं हुई। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कह दिया कि हमारी इक्विटी की जरूरतें अभी पूरी हो गई है। एक साल पहले अगस्त में जब अंबानी ने पहली बार आरआईएल में सऊदी अरामको के निवेश के इरादे का ऐलान किया था तो आरआईएल के कर्ज मुक्त बनने के लक्ष्य के लिए यह सौदा अहम था। 12 महीने में ही विक्रेता और खरीदार की जरूरतें और विकल्प दोनों बदल गए हैं। आरआईएल का अब कर्ज मुक्त होने का दावा है और उसे नकदी की दरकार शायद नहीं होगी। सऊदी अरामको के लिए भारत पेट्रोलियम की हिस्सेदारी बिक्री भारत में र्ईंधन की बढ़ती मांग में भागीदारी के लिए एक अन्य विकल्प मुहैया कराती है।
एक विश्लेषक ने कहा, सौदे पर अंबानी की टिप्पणी अरामको के लिए संदेश है और आरआईएल अब इस सौदे के लिए ज्यादा व्यग्र नहीं है। चार महीने में ही आरआईएल ने राइट्स इश्यू, जियो प्लेटफॉर्म में गूगल व फेसबुक के निवेश और खुदरा र्ईंधन कारोबार में बीपी की तरफ से निवेश के चलते कुल 2.12 लाख करोड़ रुपये जुटा लिए हैं। अंबानी में अपने भाषण मेंं कहा कि यह कंपनी के शुद्ध कर्ज (मार्च तक) 1.61 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है।
विश्लेषक ने कहा, हालांकि अगर अरामको का सौदा होता है तो मिलने वाली नकदी से तब मदद मिलेगी जब आरआईएल के इनविट प्लान को किसी तरह का झटका लगता है। वहां भी सौदा अभी पूरा नहीं हुआ है। आरआईएल ने अपने दूरसंचार टावर और फाइबर परिसंपत्तियां (संबंधित देनदारी समेत) पिछले साल दो अलग-अलग इनविट में हस्तांतरित कर दी थी।
सौदे में सऊदी अरामको की दिलचस्पी को लेकर स्थिति ज्यादा स्पष्ट नहीं है, क्योंकि इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
विश्लेषक ने कहा, ‘वर्क फ्रॉम होम (डब्ल्यूएफएच) प्रवृत्ति से गतिशीलता संबंधी जरूरत बदली है और इलेक्ट्रिक कारें प्रौद्योगिकी के लिहाज से तेजी से प्रगति कर रही हैं। इससे जीवाश्म ईंधन जरूरतों में गिरावट बढ़ सकती है। अरामको जैसी तेल कंपनी को भी जोखिम से मुक्त किए जाने की जरूरत है।’ गुरुवार को ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि सऊदी अरामको ने अपने परिचालन में कार्बन की तीव्रता कम करने का लक्ष्य रखा है। वहीं बीपीसीएल के लिए हिस्सेदारी बिक्री प्रक्रिया ने तेल उत्पादक को भारत की ईंधन मांग का लाभ उठाने के लिए अन्य विकल्प प्रदान किया है।
ऐंटीक स्टॉक ब्रोकिंग में विश्लेषक नितिन तिवारी ने कहा, ‘कोविड और ईंधन मांग पर उसका प्रभाव अल्पावधि है और सऊदी अरामको जैसी कंपनियां दीर्घावधि परिदृश्य के आधार पर निर्णय लेती हैं। भारत अरामको जैसी तेल कंपनी के लिए अभी भी आकर्षक बाजार बना हुआ है। हालांकि बीपीसीएल के साथ, अरामको के पास भारत में चयन के विकल्प भी हैं।’ इस बीच, आरआईएल द्वारा सौदे को आसान बनाने के लिए अन्य नियामकीय मंजूरियों के साथ आगे बढऩे की संभावना है।