दवा उद्योग पर चीनी बिजली की मार

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 11:56 PM IST

चीन में बिजली के संकट का असर भारत के दवा उद्योग पर पड़ रहा है। स्थानीय उद्योगों का मानना है कि अगर कुछ समय तक ऐसी स्थिति बनी रहती है तो दवा उद्योग पटरी से उतर सकता है। भारत के कारोबारी मोटे तौर पर अपनी बल्क ड्रग की कुल जरूरतों का 66-70 प्रतिशत चीन से आयात करते हैं।
दवा बनाने में कच्चे माल के रूप में काम आने वाली एक्टिव फार्मास्यूटिकल्स इन्ग्रेडिएंट्स (एपीआई) की कीमतें पहले ही बहुत ज्यादा बढ़ गई हैं और भारत में शिपमेंट पहुंचने में भी देरी हो रही है।
भारत की बड़ी दवा कंपनियों के संगठन इंडियन फार्मास्यूटिकल अलायंस (आईपीए) के महासचिव सुदर्शन जैन ने कहा कि एपीआई की कीमतों में बढ़ोतरी शुरू हो गई है। उन्होंने कहा कि ‘चीन से आने वाले पेंसिलीन जी की कीमतें महज एक महीने में 14 डॉलर प्रति यूनिट से बढ़कर 26 डॉलर प्रति यूनिट पहुंच गई हैं।’ जैन ने कहा कि भारत की इस तरह की फर्मेंटेशन आधारित एपीआई बनाने की बड़ी क्षमता नहीं है।
भारत के घरेलू दवा बाजार में आईपीए के सदस्यों की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत और दवा उत्पादों के भारत से निर्यात में हिस्सेदारी 80 प्रतिशत है।
जैन ने कहा कि आपूर्ति हो रही है, लेकिन शिपमेंट में देरी हो रही है। उन्होंने कहा, ‘बिजली की कमी की वजह से चीन के दवा उद्योग पर असर पड़ा है, साथ ही शिपिंग का भी मसला है। कंसाइनमेंट आ रहे हैं, लेकिन देरी से। सामान्यतया बड़ी दवा कंपनियां कच्चे माल का 3 महीने का बफर स्टॉक रखती हैं और उद्योग की कवायद है कि बड़े पैमाने पर भंडार रखा जाए, भले ही महंगे दाम पर खरीद करनी पड़े।’
देश की बड़ी दवा कंपनियों में से एक सिप्ला  इससे सहमत नजर आती है। सिप्ला के वैश्विक मुख्य वित्तीय अधिकारी केदार उपाध्याय ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा, ‘चीन में बिजली का संकट अगर जारी रहा तो भविष्य में भारत में एपीआई की आपूर्ति पर असर डाल सकता है। जिन इलाकों में बिजली की कमी गंभीर स्थिति में है, दुर्भाग्य से वह ऐसा प्रांत है, जहां से भारत के दवा निर्माता एपीआई मंगाते हैं।’ उन्होंने कहा कि चीन से आयात पर सिप्ला की निर्भरता 66 से 70 प्रतिशत है और मोटे तौर पर पूरे उद्योग को इतना आयात करना पड़ता है।
क्या कंपनियां वैकल्पिक स्रोतों की तलाश कर रही हैं, इस पर फर्मों का कहना है कि यह आसान नहीं है। उपाध्याय ने कहा, ‘एपीआई का वैकल्पिक स्रोत खोजना एक विकल्प हो सकता है, लेकिन यह आसान नहीं होगा। चीन में उत्पादन की मात्रा बहुत ज्यादा है, जिसका लागत में लाभ मिलता है और बेहतर तकनीक का भी मसला है। चीन के स्तर पर भारत को पहुंचने में वक्त लगेगा।’
गुजरात के मझोले स्तर के एक दवा उत्पादक ने कहा कि पैकेजिंग सामग्री, इंटरमीडिएटरीज, एपीआई आदि सहित कुल मिलाकर इनपुट लागत पिछले कुछ महीने में बढ़ी है। एपीआई की कीमत 25 से 40 प्रतिशत बढ़ी है। उद्योग के सूत्र ने कहा, ‘बड़े कारोबारी भारी मात्रा में खरीद कर भंडार बना सकते हैं वहीं छोटे ऐसा नहीं कर सकते। अगर यह स्थिति बनी रहती है तो हम सरकार से इस पर ध्यान देने की मांग करेंगे।’

First Published : October 27, 2021 | 11:10 PM IST