अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार दबाव में बना हुआ है। मंगलवार को शुरुआती कारोबार में रुपया 96.62 के करीब पहुंच गया और कारोबार के दौरान 96.64 का स्तर भी छू लिया। पश्चिम एशिया में जारी तनाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और विदेशी निवेशकों की सतर्कता के बीच इस साल अब तक रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 7 फीसदी कमजोर हो चुका है। इससे यह उभरते बाजारों की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल हो गया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या रुपये की यह कमजोरी शेयर बाजार के लिए भी खतरे की घंटी है।
ब्रोकरेज फर्म एलारा कैपिटल की 18 साल के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट के मुताबिक शेयर बाजार के लिए रुपये का किसी खास स्तर, जैसे 96 या 100, पर पहुंचना सबसे बड़ी चिंता नहीं है। रिपोर्ट की लेखिका और एलारा कैपिटल की डिप्टी हेड ऑफ रिसर्च गरिमा कपूर का कहना है कि शेयर बाजार हर साल रुपये में होने वाली 2 से 3 फीसदी की सामान्य गिरावट को आसानी से स्वीकार कर लेता है। लेकिन जब रुपये के कमजोर होने की रफ्तार पिछले साल के मुकाबले अचानक तेज हो जाती है, तब बाजार इसे अर्थव्यवस्था में बढ़ते जोखिम का संकेत मानता है और इसका असर शेयरों पर भी दिखाई देता है।
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एलारा कैपिटल की रिपोर्ट के अनुसार, 2008 में रुपये की सालाना गिरावट करीब 7 फीसदी तक पहुंच गई थी, जबकि उससे पहले यह करीब 2 फीसदी थी। उसी दौरान निफ्टी का रिटर्न करीब 20 फीसदी से घटकर सिर्फ 4 फीसदी रह गया। बाद में जब विदेशी मुद्रा बाजार का दबाव कम हुआ और रुपये की गिरावट फिर करीब 2 फीसदी पर आ गई, तब निफ्टी का रिटर्न भी दोबारा करीब 20 फीसदी तक पहुंच गया। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि शेयर बाजार रुपये के स्तर से ज्यादा उसकी कमजोरी की रफ्तार पर प्रतिक्रिया देता है।
रिपोर्ट के सह लेखक सहर्ष कुमार के मुताबिक रुपये की तेज गिरावट का असर तीन बड़े रास्तों से शेयर बाजार तक पहुंचता है। पहला, आमतौर पर रुपये की तेज कमजोरी तब आती है, जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हों और भारत का चालू खाते का घाटा बढ़ रहा हो। दूसरा, डॉलर के मुकाबले रिटर्न कम होने से विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकाल सकते हैं। तीसरा, जिन कंपनियों का कच्चा माल विदेश से आता है, उनकी लागत बढ़ जाती है, जिससे उनके मुनाफे पर दबाव पड़ता है। यही वजह है कि रुपये की तेज गिरावट अक्सर कॉरपोरेट कमाई की गुणवत्ता को भी प्रभावित करती है।
इक्वियोनॉमिक्स रिसर्च के संस्थापक जी. चोक्कालिंगम का मानना है कि पश्चिम एशिया का संकट खत्म होने के बाद रुपये में मजबूती लौट सकती है। उनके मुताबिक अगर हालात सामान्य होते हैं तो कच्चे तेल की कीमतें फिर 60 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ सकती हैं। इससे भारत का विदेशी मुद्रा खर्च करीब 30 से 35 अरब डॉलर तक कम हो सकता है। तेल सस्ता होने से महंगाई घटेगी, कंपनियों की कमाई सुधरेगी और इसका सकारात्मक असर शेयर बाजार पर भी देखने को मिलेगा।
एलारा कैपिटल का मानना है कि लगातार दो साल रुपये में तेज गिरावट के बाद अगर अब इसकी कमजोरी की रफ्तार कम होती है तो इसे अर्थव्यवस्था के सामान्य होने का संकेत माना जाएगा। ब्रोकरेज का कहना है कि वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही और वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में कंपनियों के नतीजों का दायरा बेहतर हो रहा है। मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियों की कमाई में सुधार दिखाई दे रहा है और निफ्टी का वैल्यूएशन भी अपने लंबे समय के औसत के करीब पहुंच चुका है। ऐसे में जोखिम और रिटर्न का संतुलन पहले के मुकाबले बेहतर दिख रहा है। ब्रोकरेज का मानना है कि अगर रुपये पर दबाव कम होता है और वैश्विक हालात सामान्य रहते हैं तो विदेशी निवेशकों की भारतीय बाजार में वापसी भी हो सकती है।