पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल बाजार में एक गहरी दरार को उजागर कर दिया है। दुनिया भर के वित्तीय बाजार इस समय अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत और 21 अप्रैल को खत्म होने वाली 14 दिन की युद्धविराम अवधि पर नजर बनाए हुए हैं। हालांकि हाल के संकेत सकारात्मक दिख रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान से जुड़ी किसी भी शांति प्रक्रिया को पूरा होने में लंबा समय लग सकता है। खाड़ी देशों और यूरोप के नेताओं ने भी संकेत दिया है कि अमेरिका-ईरान समझौते में कम से कम 6 महीने लग सकते हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के सकारात्मक बयान के बाद कच्चे तेल की कीमतों में थोड़ी नरमी आई थी। इजरायल और लेबनान के बीच 10 दिन के युद्धविराम की खबर से भी बाजार में उम्मीद बनी। लेकिन जमीन पर स्थिति अब भी चिंताजनक है। असली तेल सप्लाई पर दबाव बना हुआ है, जिससे यह साफ होता है कि राजनीतिक बयान और वास्तविक स्थिति में बड़ा अंतर है।
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के अनुसार, ईरान से जुड़े संघर्ष और होरमुज जलडमरूमध्य के बंद होने से करीब 13 मिलियन बैरल प्रति दिन तेल सप्लाई प्रभावित हुई है। 80 से ज्यादा ऊर्जा ढांचे को नुकसान पहुंचा है और कई जगहों पर इन्हें ठीक होने में 2 साल तक का समय लग सकता है। इससे साफ है कि सप्लाई की समस्या जल्द खत्म होने वाली नहीं है।
होरमुज जलडमरूमध्य, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल रास्तों में से एक है, अभी भी दबाव में है। पहले यहां से रोज 120 से 140 जहाज गुजरते थे, लेकिन संघर्ष के दौरान यह संख्या घटकर 10 से भी कम रह गई। अमेरिकी नौसेना की मौजूदगी के कारण टैंकरों की आवाजाही अब भी सामान्य नहीं हो पाई है।
इसका असर तेल की कीमतों पर साफ दिख रहा है। स्पॉट मार्केट में मिलने वाला कच्चा तेल फ्यूचर्स कीमत से 25 डॉलर से ज्यादा महंगा हो गया है।
सप्लाई रूट बाधित होने के कारण असली (फिजिकल) तेल की कीमत तेजी से बढ़ी है। फ्यूचर्स और असली डिलीवरी के बीच 30 से 40 डॉलर का अंतर बन गया है, जो बहुत दुर्लभ स्थिति है। अप्रैल 2026 में यह अंतर 30 से 35 डॉलर तक रहा, जबकि कुछ समय के लिए 50 डॉलर तक पहुंच गया। फोर्टीज ब्लेंड की कीमत भी 147 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो भारी कमी का संकेत है।
अमेरिका, जो दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक है, अभी भी अपनी जरूरत का करीब 30 प्रतिशत तेल आयात करता है। पश्चिम एशिया संकट के कारण अमेरिका के आयात में कमी और निर्यात में बढ़ोतरी हुई है। एशिया के देश, खासकर जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर, अब अमेरिकी तेल के बड़े खरीदार बनते जा रहे हैं।
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मिराए एसेट शेयरखान के रिसर्च एनालिस्ट मोहम्मद इमरान के मुताबिक, मौजूदा समय में तेल बाजार दो हिस्सों में बंटा हुआ नजर आ रहा है। एक तरफ फ्यूचर्स बाजार है, जो भविष्य में हालात सुधरने की उम्मीद पर आधारित है, जबकि दूसरी तरफ असली तेल बाजार है, जहां सप्लाई की कमी साफ दिख रही है। उनका मानना है कि जब तक होरमुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही सामान्य नहीं होती, तब तक कीमतों में यह अंतर बना रहेगा और बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।
मोहम्मद इमरान के अनुसार, अगर अप्रैल के अंत या मई की शुरुआत तक टैंकरों की आवाजाही शुरू होती है, तो कीमतों का अंतर तेजी से कम हो सकता है। हालांकि पूरी तरह सामान्य स्थिति आने में समय लगेगा और बाजार में स्थिरता तभी आएगी जब सप्लाई पहले के स्तर के करीब पहुंचेगी। तब तक तेल बाजार में अनिश्चितता बनी रहने की संभावना है।