राष्ट्रपति ने न्यायिक सक्रियता और न्यायपालिका की व्यापक भूमिका की धारणा का जिक्र करते हुए कहा कि इस व्यापक भूमिका की धारणा ने शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांतों से भटकने पर कई बार विरोध का सामना किया है। बहरहाल, इस तरह की सक्रियता ने कुछ ऐसे सकारात्मक योगदान दिये हैं, जिन पर सवाल नहीं उठाये जा सकते।
मुखर्जी ने न्यायिक सुधार की हालिया प्रवृतियां: एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार को संबोधित करते हुए कहा, लेकिन, मैं यहां एक एहतियाती बात कहना चाहूंगा कि प्रत्येक लोकतंत्र में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच एक सूक्ष्म अंतर मौजूद है। राज्य के ये तीनों अंग अपनी जो भूमिका निभा रहे हैं उसमें व्यवधान नहीं आना चाहिए।
उन्होंने कहा कि शासन के इन तीनों अंगों को अपनी सीमाएं नहीं लांघनी चाहिए या ऐसी भूमिका नहीं निभानी चाहिए जिसकी संविधान उन्हें इजाजत नहीं देता है।