इस सिद्धांत के पीछे विचार यह है कि मस्तिष्क में क्वांटम कंप्यूटर के लिए चेतना एक प्रोग्राम की तरह काम करती है। यह चेतना मृत्यु के बाद भी ब्रह्मांड में परिव्याप्त रहती है। उन्होंने मृत्यु का करीबी अनुभव करने वाले लोगों के अनुभवों पर आधार पर इसे समझाने का प्रयास किया है।
डेली मेल की खबर के अनुसार एरिजोना विश्वविद्यालय में एनेसथिएसिलोजी एवं मनोविग्यान विभाग के प्रोफेसर एमरेटस एवं चेतना अध्ययन केन्द्र के निदेशक डा. स्टुवर्ट हेमेराफ ने इस अद्र्ध धार्मिक सिद्धांत को आगे बढ़ाया है।
यह परिकल्पना चेतनता के उस क्वांटम सिद्धांत पर आधारित है जो उन्होंने एवं ब्रिटिश मनोविग्यानी सर रोजर पेनरोस ने विकसित की है। इस सिद्धांत में माना गया है कि हमारी आत्मा का मूल मस्तिष्क कोशिकाओं के अंदर बनी ढांचों में होता है जिसे माइक्रोट्यूबुल्स कहते हैं।
दोनों वैग्यानिकों का तर्क है कि इन माइक्रोट्यूबुल्स पर पड़ने वाले क्वांटम गुरूतत्वाकर्षण प्रभाव के परिणामस्वरूप हमें चेतनता का अनुभव होता है। वैग्यानिकों ने इस सिद्धांत को आर्केस्ट्रेड आब्जेक्टिव रिडक्शन :आर्च..ओर: का नाम दिया गया है।
जारी भाषा