जमीन से जुड़े नए-नए विवाद आए दिन सामने आ रहे हैं, इसलिए सरकार ने भूमि अधिग्रहण के बारे में अपने विधेयक का मसौदा आज सार्वजनिक कर दिया। इस विधेयक में पहली बार राहत और पुनर्वास से संबंधित शर्तें भी शामिल करने की बात कही गई है।
उम्मीद की जा रही है कि भूमि अधिग्रहण पर एक के बाद एक सिर उठाते विवादों पर राष्टï्रीय भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास तथा पुनस्र्थापना विधेयक 2011 के मसौदे के बाद विराम लग जाएगा। ये विवाद उन लोगों की वजह से उठ रहे हैं, जिनकी जमीन समुचित मुआवजा दिए बगैर ही ले ली गई है।
मसौदे में गांव और शहरों की जमीन के बीच फर्क कर दिया गया है और दोनों के लिए अलग-अलग कीमत तय करने की बात है। इसमें कहा गया है कि शहरी जमीन के मालिक को उसकी जमीन की बाजार में चल रही कीमत से दोगुनी रकम दी जानी चाहिए। गांव की जमीन अधिग्रहीत किए जाने पर बाजार मूल्य की 6 गुना कीमत देने की बात इसमें है।
इसके अलावा मसौदा 100 एकड़ से अधिक जमीन गंवाने वाले को राहत और पुनर्वास की सुविधाएं देने की वकालत भी करता है। विधेयक के मुताबिक किसी भी जमीन पर कब्जा उसी सूरत में किया जा सकता है, जब उसके 80 फीसदी मालिक इसके लिए राजी हो जाएं।
नए विधेयक के मुताबिक सरकार अब निजी कंपनियों के लिए या निजी उद्देश्य के लिए जमीन का अधिग्रहण नहीं कर सकती है। इसी तरह कई फसलें उगाने वाली जमीन का अधिग्रहण सार्वजनिक उद्देश्य के लिए भी नहीं किया जा सकता। यमुना एक्सप्रेसवे और उसके नजदीक की टाउनशिप के लिए ऐसी ही जमीन का अधिग्रहण किया गया है। लेकिन इसमें सार्वजनिक उद्देश्य की परिभाषा नहीं बदली गई है और रियल एस्टेट पार्क के निर्माण समेत सभी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को इसके दायरे में रखा गया है।
नर्मदा बचाओ आंदोलन के मधुकर कुमार कहते हैं कि मौजूदा कानूनों के मुताबिक कोरियाई कंपनी पोस्को की परियोजना और भट्टïा पारसौल में नियमों का उल्लंघन किया गया है, लेकिन विधेयक के मुताबिक दोनों पूरी तरह कानूनी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि विधेयक के मुताबिक सरकार को बांध निर्माण जैसे अपने कामों के लिए जमीन पर कब्जा करते वक्त 80 फीसदी किसानों की रजामंदी की दरकार नहीं होगी।
ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश इस मामले में औद्योगिक विकास और भू-स्वामियों के अधिकारों के बीच संतुलन साधना चाहते हैं। इस मसौदे पर टिप्पणी के लिए 30 अगस्त तक का समय दिया गया है। लेकिन रमेश ने साफ किया कि विधेयक संसद में पेश करने का समय अभी उन्होंने तय नहीं किया है।
विधेयक में भू-स्वामियों के साथ उसका इस्तेमाल करने वालों को भी मुआवजा देने की बात है। उसमें यह भी कहा गया है कि निजी क्षेत्र यदि अधिग्रहण में सरकार का हस्तक्षेप चाहता है तो भी उसे जमीन की पूरी कीमत देनी होगी। इसमें जमीन गंवाने वाले परिवार को 20 साल तक 3,000 रुपये महीना मुआवजा दिया जाएगा। शहरीकरण के लिए जमीन गंवाने वालों को विकसित भूमि का 20 फीसदी हिस्सा भी दिया जाएगा। हालांकि किसान चाहते हैं कि जमीन उनके हाथ में ही रहे और उसे वे पट्टïे पर सौंपें।
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