रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के वैग्यानिकों ने मानव अपशिष्ट से उत्पन्न होने वाली मीथेन गैस से जैव शौचालयों को प्रकाशित करने का तरीका विकसित किया है।
ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश के सुझावों पर अमल करते हुये यह प्रमुख अनुसंधान एजेंसी अब अंधेरे में जैव शौचालयों का इस्तेमाल करने वालों को रौशनी मुहैया कराने की कोशिश में लगी है।
डीआरडीओ के अनुसंधान एवं विकास प्रमुख डॉ. डब्ल्यू सिल्वामूर्ति ने कहा मीथेन गैस के कम उत्पादन के कारण हम इसके उत्पादन के और साधन तलाश रहे हैं। सिर्फ एक ही जगह से इसके उत्पादन पर ध्यान देना कठिन है।
जयराम रमेश ने हाल ही में डीआरडीओ के ओडिशा की धमरा तट परियोजना का उद्घाटन किया था जहां खुले में शौच जाने की आदत को रोकने के लिये 1000 जैव शौचालयों का निर्माण किया जा रहा है।
उन्होंने अधिकारियों से डीआरडीओ द्वारा बनाये जा रहे इन ई-लू जैव शौचालयों की चौड़ाई बढ़ाने और हवादार बनाने को भी कहा था।
ग्रामीण विकास मंत्रालय ने इन जैव शौचालयों को 1000 ग्राम पंचायतों में बनाने के लिये 400 करोड़ रूपये के बजट की घोषणा की है।
सिल्वामूर्ति ने कहा जैव शौचालयों के अवशिष्ट से विशेष प्रक्रिया द्वारा निकलने वाला पानी सिंचाई के लिये उपयोग हो सकता है, हम सब्जियों को उगाकर ऐसा साबित भी कर चुके हैं। यह पानी जानवरों के पीने लायक भी है।
भाषा