बिजनेस स्टैंडर्ड - रसूखदार पार्टी अध्यक्ष की वापसी का दौर
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रसूखदार पार्टी अध्यक्ष की वापसी का दौर

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  September 03, 2017

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष अमित शाह के आवास पर बहुत तड़क-भड़क नजर नहीं आती। उनका घर काफी हद तक पुराने राजनेताओं के घर जैसा दिखता है। वह आगंतुकों से कमरे में रखे सोफे के बीचोबीच बैठकर बात करते हैं। उनकी पीठ दीवार की ओर और चेहरा आगंतुक की ओर होता है। कमरे की दीवार पर दो चित्र लगे हैं: एक तो कौटिल्य अथवा चाणक्य का और दूसरा सावरकर का। दोनों उनकी राजनीति को निर्धारित करते हैं। कौटिल्य से उनकी राजनीतिक शैली को और सावरकर से उनकी हिंदूवादी राष्ट्रवादी विचारधारा को समझा जा सकता है। 

 
शाह इन दोनों तस्वीरों के बीच एक और तस्वीर लगा सकते हैं। यह किसी पक्केकांग्रेसी की होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि उनकी राजनीति की शैली और अपनी पार्टी पर उनकी प्रभुता सन 1963 से 1967 तक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे के कामराज की याद दिलाती है। उस दौर में कामराज के पास भी ऐसी ही अभूतपूर्व शक्ति थी। कैबिनेट के मंत्री उनके कार्यालय में पहुंचते, अपना रिपोर्ट कार्ड बांचते और पार्टी के काम के लिए समय देने की खातिर इस्तीफा देने की पेशकश भी करते। स्पष्ट कर दें कि यहां हम केवल पूर्णकालिक पार्टी अध्यक्षों की बात कर रहे हैं। क्योंकि कांग्रेस में ऐसे प्रधानमंत्री भी रहे हैं जो पार्टी अध्यक्ष भी थे। या ऐसे पार्टी अध्यक्ष भी रहे जिनके कार्यकाल में प्रधानमंत्री सीमित अधिकार रखते थे। अन्य पूर्णकालिक पार्टी अध्यक्षों में देवकांत बरुआ, चंद्रशेखर (जनता) तथा अन्य लोग भी जिन्होंने भाजपा में वाजपेयी के  कार्यकाल में अध्यक्ष पद संभाला, उनके पास सीमित अधिकार रहे और वे कोई अलग प्रभाव नहीं छोड़ सके।
 
शाह की शक्ति विशिष्ट है क्योंकि नरेंद्र मोदी का उदय उनकी वजह से नहीं हुआ है। बल्कि इसके उलट शाह ही मोदी की व्यक्तिगत पसंद बनकर उभरे। आप चाहे जितनी कोशिश कर लें, आपको ऐसा एक भी उदाहरण नहीं नजर आएगा जहां शाह ने मोदी के उद्देश्यों के खिलाफ काम किया हो। वर्ष 2013 में जब भाजपा ने उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया था तो मैंने अपने एक आलेख में सवाल उठाया था कि आखिर पार्टी ने ऐसा क्यों किया? परंतु उन्होंने प्रदेश की 80 में से 73 (दो सहयोगियों सहित) सीटें जीतकर मुझे गलत साबित किया। मुझसे चूक यह हो गई थी कि मैंने अनुमान लगाया था कि भाजपा अटल बिहारी वाजपेयी की छवि देखते हुए एक और राजग सरकार बनाने की राह पर है या ऐसी इच्छा रखती है। मुझे लगा था कि पार्टी का रुख नरम हिंदुत्व का समावेशी रुख होगा और वह मध्यमार्गी यथास्थिति से छेड़छाड़ नहीं करेगी। उसी मान्यता के आधार पर मैंने यह अनुमान लगाया था कि शाह उत्तर प्रदेश के लिहाज से सही चयन नहीं हैं। बहरहाल आगे चलकर राजनीति ने जो करवट ली उसमें मेरा अनुमान गलत साबित हुआ।
 
बाद की राजनीति ने भी इसे साबित किया कि मेरा अनुमान किस कदर गलत था। वाजपेयी सरकार के खांचे की सरकार बनाने के बजाय मोदी-शाह का नजरिया अलग है। वे विशुद्ध रूप से भाजपा और आरएसएस की सरकार बनाना चाहते थे। एक समझ यह भी थी कि वाजपेयी सरकार शायद ही भाजपा की सरकार थी क्योंकि उसमें बहुत बड़ी तादाद में अन्य दलों के मंत्री थे। यह बात केवल जॉर्ज फर्नांडिस को रक्षा मंत्रालय देने पर लागू नहीं थी बल्कि जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा, रंगराजन कुमारमंगलम, अरुण शौरी तथा अन्य नेता जो आरएसएस की विचारधारा के नहीं थे, उनको भी बाहरी ही माना गया। फिलहाल उस सरकार को न तो सही मायने में विचारधारा का प्रतिनिधि माना जा सकता है और न ही पार्टी का। मौजूदा सरकार में अगर पार्टी के भीतर जरूरी काम करने की प्रतिभा नहीं है तो वह बाहर उसकी तलाश करने की इच्छुक भी नहीं है। पार्टी उन्हीं लोगों को सत्ता सौंपेगी जो विशुद्ध रूप से उसके वैचारिक साथी हों या जिन्होंने दशकों तक सेवा की हो। शाह इसी रुख पर काम करते रहे हैं।
 
इस दृष्टि से देखा जाए तो भाजपा/राजग की यह सरकार पिछली सरकार से एकदम अलग है। अब भाजपा के पास अपना बहुमत है लेकिन आप यह भी मानेंगे कि अगर लालकृष्ण आडवाणी या किसी अन्य पुराने भाजपा नेता के हाथ में कमान होती तो यह सरकार इस कदर वैचारिक प्रतिबद्धता पर निर्भर नहीं होती। मोदी ने अपने युवा समर्थक और आरएसएस प्रचारकों को हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र की कुर्सी सौंपकर इरादे साफ कर दिए। हालांकि राजनीतिक रूप से उनका कद बहुत बड़ा नहीं था। इसके बाद शाह अपनी पसंद के साथ आगे बढ़े जिनमें गुजरात में विजय रूपानी, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ और राष्ट्रपति के रूप में रामनाथ कोविंद जैसे नाम शामिल हैं। इनमें से किसी मामले में प्रधानमंत्री की अवहेलना नहीं की गई। बस शुरुआती चयन शाह का था जिन्होंने इसे पार्टी से छिपाकर रखा।
 
सन 1963 में गांधी जयंती के दिन कामराज ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देकर उथल-पुथल मचा दी थी। उन्होंने कहा कि वह पार्टी के लिए काम करना चाहते हैं। उनके बाद पांच केंद्रीय मंत्रियों और पांच अन्य मुख्यमंत्रियों ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इस दौरान मोरारजी देसाई और जगजीवन राम जैसे नेताओं की कुर्सी गई। यह एक बड़ी आंतरिक सफाई थी जिसे कामराज योजना का नाम दिया गया हालांकि उस वक्त वह पार्टी के प्रमुख भी नहीं थे।
 
अब यह बात लोगों की स्मृतियों से ओझल हो गई है लेकिन यह कथित स्वैच्छिक परंपरा स्टालिन के समय से चली आ रही है। इस वाकये ने लंबे समय तक राजनीतिक कार्टून बनाने वालों और व्यंग्य लेखकों को व्यस्त रखा। वह नेहरू के पराभव का दौर था और वह उनसे इतने प्रभावित (या शायद असुरक्षित) हुए कि उन्होंने कामराज को पार्टी प्रमुख बनने को कहा। कामराज का प्रभाव नेहरू के निधन के बाद सामने आया जब पहले लाल बहादुर शास्त्री और फिर इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं। इस तरह उन्होंने मोरारजी देसाई की आकांक्षाओं को ध्वस्त कर दिया। वर्ष 1963 से 1967 तक एक से एक रसूखदार कांग्रेसी नेता उनके पीछे-पीछे घूमा करते थे ताकि वे उनपर कुछ उपकार कर दें। बदले में वह कहते, 'देखते हैं।Ó
 
हम यह तो नहीं जानते कि ऐसे मौकों पर शाह की पसंदीदा पंक्ति कौन सी है लेकिन उनके बाकी के काम बिल्कुल कामराज की शैली के ही हैं। मंत्रीगण उनके समक्ष पंक्तिबद्घ खड़े रहते हैं, जबकि उनको प्रधानमंत्री के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। वह उनसे स्वैच्छिक इस्तीफा देने को कह सकते हैं ताकि वे पार्टी के काम में लग सकें। वे मुस्कराते हुए बाहर आते हैं और कहते हैं कि वे पार्टी के वफादार हैं। उनका दिल भले ही रो रहा हो लेकिन वे कुछ कहने की स्थिति में नहीं रहते। वे अब इस उम्मीद में हैं कि मोदी और शाह की जोड़ी 2024 तक बरकरार रहेगी। उनको उम्मीद है कि कभी न कभी शाह, पार्टी के लिए उनके योगदान को मान्यता देंगे और उनको वापस मंत्रिमंडल में शामिल किया जाएगा। 
 
लगभग आधी सदी से दिल्ली ने कोई ताकतवर पार्टी अध्यक्ष नहीं देखा था। उसे इस नई स्थिति से सहज होने में वक्त लग रहा है। शाह ने कई अन्य अहम बदलाव भी किए हैं। भाजपा की संसदीय दल की बैठक अब पार्टी कार्यालय में होती है और उसमें शामिल होने प्रधानमंत्री को वहां आना पड़ता है। जबकि इससे पहले लंबे समय से चली आ रही परंपरा के मुताबिक यह बैठक प्रधानमंत्री आवास पर, उनकी सुविधा के मुताबिक होती थी। मंत्रिमंडल, मुख्यमंत्रियों और यहां तक कि शक्तिशाली सरकारी विभागों के प्रमुखों और एजेंसियों तक को यह भलीभांति पता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय के अलावा सत्ता कहां है। वे भी उसी के मुताबिक खुद को समायोजित कर रहे हैं।
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