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‘भुला दिए जाने के अधिकार’ पर नई बहस: क्या AI भी सीखी हुई निजी जानकारी भूल सकता है?

दिल्ली न्यायालय के निर्णय से ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या एआई तंत्र के ट्रेनिंग डेटा में मौजूद निजी जानकारियां हटाई जा सकती हैं या इन्हें हटाना मुमकिन हो सकता है?

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भाविनी मिश्रा   
Last Updated- July 06, 2026 | 10:51 PM IST

दिल्ली उच्च न्यायालय के इस निर्णय से एक नई बहस छिड़ गई है कि ‘भुला दिए जाने का अधिकार’ किसी व्यक्ति की निजता के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। इस आदेश से आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) के लिए एक नया कानूनी एवं नियामकीय पक्ष भी सामने आ गया है। उच्च न्यायालय के निर्णय से ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या एआई तंत्र के ट्रेनिंग डेटा में मौजूद निजी जानकारियां हटाई जा सकती हैं या इन्हें हटाना मुमकिन हो सकता है?

ट्रेनिंग डेटा प्रारंभिक जानकारियां होती हैं जिनका उपयोग मशीन लर्निंग और एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए किया जाता है।

उच्च न्यायालय का यह निर्णय 29 मई को ‘लक्ष्य सिंह यादव बनाम भारत संघ और अन्य’ मामले में आया था। यह आदेश लोगों को ऑनलाइन न्यायिक लेखा-जोखा (रिकॉर्ड) से अपनी निजी जानकारियां हटाने या छिपाने की मांग करने की इजाजत देता है। यह कदम उस स्थिति में उठाया जाएगा जब उन जानकारियों के लगातार उपलब्ध रहने से उनकी निजता, सम्मान या प्रतिष्ठा को बहुत नुकसान पहुंच रहा है।

हालांकि, ज्यादातर पारंपरिक सर्च इंजन के लिए यह फैसला लागू करना काफी आसान है मगर इससे एक अहम सवाल खड़ा हो गया है कि क्या एआई ढांचे के मामले में यह संभव है कि वे निजी जानकारियां हासिल करने या सीखने के बाद उन्हें भूल जाएं?

अधिकांश तकनीकी और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रक्रिया में एआई ढांचे की भूमिका न्यायालय का निर्णय लागू करने में बड़ी चुनौतियां खड़ी कर करती है।​

असल में भले ही एआई प्रणाली से जानकारियां हमेशा के लिए हटा दी जाएं मगर किसी एआई मॉडल से उन जानकारियों या मानकों को भूल जाने (अन-लर्न) के लिए कहना अक्सर तकनीकी रूप से मुश्किल होता है और कई मामलों में तो अभी यह मुमकिन ही नहीं है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इससे डेटा मिटाने के अधिकार और एआई विकास की तकनीकी हकीकत के बीच एक अनसुलझा तनाव पैदा होता है।

टेक्नॉलजी पॉलिसी एडवोकेसी संस्था ‘द डायलॉग’ के सहायक निदेशक कामेश शेखर ने कहा, ‘सूचना भंडार (डेटाबेस) और प्रोसेसिंग पाइपलाइन से निजी जानकारियां भले ही हटा दी जाएं मगर उन एआई मॉडल को लेकर काफी अनिश्चितता बनी हुई है जो ऐसे डेटा के साथ पहले ही प्रशिक्षित किए जा चुके हैं। एक बार जब कोई मॉडल निजी जानकारी से प्रारूप, संबंध या निष्कर्ष सीख लेता है तो मूल जानकारियां हटाने से मॉडल में समाहित जानकारियां अपने आप खत्म नहीं हो जाती।’

कानूनी जानकारों का कहना है कि इस फैसले का एआई कंपनियों पर बड़ा असर हो सकता है क्योंकि बड़े लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) प्रशिक्षित करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली जानकारियां केवल डेटाबेस में स्टोर नहीं होतीं बल्कि जटिल तंत्र में समा जाती हैं। ये तंत्र मूल स्रोत के हटाए जाने के बाद भी उन जानकारियों को दोबारा तैयार कर या उनसे अनुमान लगा सकते हैं।

ट्राइलीगल के पार्टनर निखिल नरेंद्रन ने कहा, ‘एआई के दौर में भुला दिए जाने के अधिकार का भविष्य इस बात पर अधिक निर्भर नहीं करेगा कि स्रोत से डेटा मिटा दिए जाएं। यह बात अधिक जरूरी है कि यह पक्का किया जाए कि डेटा हटाने के उपयुक्त अनुरोध के बाद भी एआई तंत्र व्यक्तिगत जानकारियां दोबारा तैयार न करें, उससे अनुमान न लगाए या उन्हें किसी को न दें।

पारंपरिक डेटाबेस के उलट एआई मॉडल जानकारियों को अरबों मानदंडों में विस्तारित कर देते हैं जिससे किसी खास जानकारी को चुनकर हटाना मुश्किल हो जाता है। इसे देखते हुए जानकारों का तर्क है कि ध्यान पूरी तरह डेटा हटाने के बजाय उन्हें लगातार सामने आने से रोकने पर केंद्रित होना चाहिए।

नरेंद्रन ने कहा, ‘अभी एआई मॉडल के लिए किसी खास डेटा पर प्रशिक्षित होने के बाद उसे पूरी तरह से भूल जाना मुमकिन नहीं है।’ उन्होंने कहा कि इसके बजाय सुरक्षा उपायों से यह पक्का किया जाना चाहिए कि ऐसी जानकारियां सार्वजनिक रूप से सामने न आए या दोबारा न तैयार की जाएं।

एसकेवी लॉ ऑफिस के पार्टनर अंशुल वर्मा ने कहा कि बहस इस पर होनी चाहिए कि पुरानी एवं मौजूदा जानकारियां हटाने के बजाय क्या एआई तंत्र को लोगों के बारे में जानकारियां दोबारा तैयार करने से रोका जा सकता है।

वर्मा ने कहा,‘एआई कंपनियों की कानूनी जिम्मेदारी केवल भविष्य के ट्रेनिंग सेट से डेटा हटाने तक सीमित नहीं रह सकती। उन्हें आउटपुट-लेवल फिल्टर लागू करने, ऑडिट योग्य अनुपालन का लेखा-जोखा रखने और जहां संभव हो वहां मशीन-अन-लर्निंग के तरीकों का मूल्यांकन करने जैसे कुछ अतिरिक्त कदम भी उठाने होंगे।’

मशीन ‘अन-लर्निंग’ यानी किसी मॉडल की खास डेटा पर निर्भरता कम करने की तकनीक एक संभावित समाधान के तौर पर सामने आई है। हालांकि, विशेषज्ञ आगाह करते हैं कि यह तकनीक अभी भी विकसित हो रही है और फिलहाल निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि प्रशिक्षण मॉडल से जानकारियां पूरी तरह हटा दी जाएंगी।

लॉ फर्म ‘कोचर ऐंड कंपनी’ के पार्टनर शिव सपरा ने कहा कि कई मामलों में नियमों का पालन करने के लिए कई तरह के उपायों की जरूरत (मूल डेटासेट हटाना, आउटपुट फिल्टर, मॉडल अद्यतन और ऑडिट ट्रेल्स) पड़ सकती है।

सपरा ने कहा,‘दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्णय केवल डेटा हटाने से हटकर नियंत्रित तरीके से जानकारी खोजने की क्षमता की ओर एक बदलाव है। वास्तविक मुद्दा यह है कि क्या व्यक्तिगत जानकारियां ट्रेनिंग वेट्स में शामिल कर ली गई हैं।’

यह फैसला मौजूदा डेटा सुरक्षा कानूनों की पूर्णता या पर्याप्तता पर भी सवाल उठाता है। डिजिटल निजी डेटा सुरक्षा (डीपीडीपी) अधिनियम (जो अब तक का देश का सबसे व्यापक डिजिटल निजता कानून है) सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारियों की कुछ श्रेणियों को इससे बाहर रखता है जिसमें न्यायिक कार्यवाही के जरिये बताई गई जानकारियां भी शामिल हैं।

‘ट्रेनिंग वेट्स’ वे संख्यात्मक मान होते हैं जो यह तय करते हैं कि कोई एआई मॉडल किसी जानकारी या इनपुट को कितना महत्त्व देता है।

नरेंद्रन ने कहा,‘दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा ‘भुला दिए जाने का अधिकार’ को मान्यता देना डीपीडीपी अधिनियम ढांचा और सूचनात्मक निजता की व्यापक संवैधानिक सुरक्षा के बीच एक संभावित अंतर को उजागर करता है।’

हालांकि, विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि मजबूत सुरक्षा उपायों की जरूरत हो सकती है मगर लेकिन वे आगाह करते हैं कि निजता के अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सार्वजनिक जवाबदेही, शोध और नवाचार के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदेश लागू करना एक कठिन चुनौती हो सकती है क्योंकि नियामकों के लिए यह पता लगाना मुश्किल हो सकता है कि क्या किसी मॉडल को किसी व्यक्ति के डेटा की मदद से प्रशिक्षित किया गया था या क्या डेटा हटाने का अनुरोध ठीक से लागू किया गया है।

रोजमर्रा के जीवन में एआई ढांचे के लगातार बढ़ती दखल के बीच दिल्ली उच्च न्यायालय यह निर्णय संकेत देता है कि निजी कानून का अगला चरण जानकारी हटाने के बजाय डिजिटल मेमरी (याददाश्त) की सीमा तय करने पर अधिक केंद्रित हो सकता है।

गांधी लॉ एसोसिएट्स के पार्टनर राहिल पटेल ने कहा कि भविष्य की बहस पूरी तरह डेटा हटाने के बजाय जवाबदेही पर केंद्रित होने की संभावना है। पटेल ने कहा,‘भुला दिए जाने के अधिकार की असली परीक्षा तब होगी जब न्यायालयों से यह कहा जाएगा कि वे इंटरनेट से जानकारी न हटाएं बल्कि एआई को वह बात भूलने के लिए कहें जो वह पहले ही सीख चुका है।’

First Published : July 6, 2026 | 10:45 PM IST