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E20 पेट्रोल से कार इंजन हुआ फेल तो क्या मिलेगा क्लेम? एक्सपर्ट से समझें इंश्योरेंस के असली नियम

एक्सपर्ट के मुताबिक, इंश्योरेंस कंपनी हर नुकसान को कवर नहीं करती, लेकिन समय पर क्लेम, कॉम्प्रिहेंसिव पॉलिसी और सही ऐड-ऑन की जानकारी आपको बड़े खर्च से बचा सकती है

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ऋषभ राज   
Last Updated- July 06, 2026 | 4:13 PM IST

कार खरीदना किसी भी मध्यमवर्गीय परिवार के लिए सिर्फ एक सपना पूरा होने जैसा नहीं, बल्कि वर्षों की बचत और मेहनत का सबसे बड़ा निवेश होता है। यही वजह है कि कार खरीदते ही ज्यादातर लोग यह मानकर निश्चिंत हो जाते हैं कि इंश्योरेंस हर मुश्किल में उनका साथ देगा। लेकिन क्या वाकई ऐसा है?

हाल के दिनों में E20 पेट्रोल को लेकर सोशल मीडिया पर चल रहे दावों ने हजारों कार मालिकों की चिंता बढ़ा दी है। दावा किया जा रहा है कि इथेनॉल मिले हुए पेट्रोल से इंजन खराब होने पर इंश्योरेंस कंपनियां क्लेम देने से इनकार कर रही हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि इंश्योरेंस आखिर किन नुकसान की भरपाई करता है और किन मामलों में आपकी जेब पर लाखों रुपये का बोझ पड़ सकता है?

दरअसल, स्टैंडर्ड इंश्योरेंस और उसके ऐड-ऑन कवर के बीच का फर्क समझना हर कार मालिक के लिए उतना ही जरूरी है, जितना सुरक्षित ड्राइविंग करना। यही फर्क तय करता है कि मुश्किल वक्त में आपका इंश्योरेंस ढाल बनेगा या सिर्फ एक कागजी दस्तावेज।

सबसे पहले इंश्योरेंस के नियमों को जानना जरूरी

इस पूरे मामले की असली बात इंश्योरेंस के नियमों में छिपी है, जिसे हर कार मालिक को समझना चाहिए। कार इंश्योरेंस का सीधा नियम है कि यह सिर्फ अचानक हुई घटनाओं, जैसे एक्सीडेंट, चोरी, आग या बाढ़ से हुए नुकसान का ही क्लेम देता है। लेकिन गाड़ी के नियमित रखरखाव, समय के साथ होने वाली घिसाई या किसी मैकेनिकल खराबी को सामान्य (स्टैंडर्ड) इंश्योरेंस पॉलिसी में कवर नहीं किया जाता। यानी अगर इंजन या किसी दूसरे पार्ट में धीरे-धीरे खराबी आती है, तो ऐसे मामलों में आमतौर पर बीमा कंपनी क्लेम नहीं देती।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, जो गाड़ियां काफी पुरानी हैं और E20 ईंधन के हिसाब से डिजाइन नहीं की गई हैं, उनमें लंबे समय तक इथेनॉल मिले पेट्रोल के इस्तेमाल से फ्यूल पाइप या रबर के कुछ पार्ट्स पर धीरे-धीरे असर पड़ सकता है। इंश्योरेंस की भाषा में इसे ‘कॉन्सिक्वेंशियल डैमेज’ कहा जाता है, यानी ऐसा नुकसान जो समय के साथ धीरे-धीरे होता है, न कि किसी अचानक हुई घटना की वजह से। इसी कारण स्टैंडर्ड कार इंश्योरेंस पॉलिसी में ऐसे मामलों में इंजन की मरम्मत का क्लेम आमतौर पर नहीं मिलता।

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क्या ‘कॉम्प्रिहेंसिव’ कवर पर भरोसा करना पड़ सकता है भारी?

कार इंश्योरेंस के नियमों और क्लेम से जुड़ी शर्तों को लेकर डिजिट इंश्योरेंस के हेड (मोटर अंडरराइटिंग) आदित्य कुमार का कहना है कि भारत में थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस लेना कानूनन जरूरी है, लेकिन यह सिर्फ दूसरे व्यक्ति या उसकी संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई करता है। अगर आप अपनी कार को भी सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो केवल थर्ड-पार्टी कवर पर्याप्त नहीं है। इसके लिए ‘ओन डैमेज’ या ‘कॉम्प्रिहेंसिव’ इंश्योरेंस’ लेना जरूरी होता है।

कुमार बताते हैं, “कॉम्प्रिहेंसिव इंश्योरेंस आपकी कार को एक्सीडेंट, थर्ड-पार्टी नुकसान, बाढ़ या चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं, चोरी और आग जैसी कई परिस्थितियों में सुरक्षा देता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर तरह का नुकसान पॉलिसी में कवर होगा। स्टैंडर्ड कॉम्प्रिहेंसिव पॉलिसी में कुछ तय शर्तें और एक्सक्लूजन पहले से शामिल होते हैं। साथ ही, क्लेम के समय पार्ट्स पर डेप्रिसिएशन (मूल्यह्रास) भी लागू होता है, जिसकी वजह से मरम्मत का कुछ खर्च आपको अपनी जेब से भी उठाना पड़ सकता है।”

इंजन को कार का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है और इसकी मरम्मत पर सबसे ज्यादा खर्च आता है। कुमार के मुताबिक, कई मामलों में इंजन की कीमत कार की कुल कीमत का करीब 40% तक हो सकती है। आमतौर पर कॉम्प्रिहेंसिव इंश्योरेंस पॉलिसी इंजन के नुकसान का क्लेम तभी देती है, जब इंजन किसी सीधे एक्सीडेंट में क्षतिग्रस्त हुआ हो। लेकिन अगर ईंधन से जुड़ी किसी अंदरूनी समस्या के कारण इंजन सीज हो जाए या बाढ़ के पानी में खड़ी गाड़ी के इंजन में पानी घुसने से नुकसान हो, तो ऐसे मामलों में सामान्य तौर पर इंश्योरेंस कंपनी क्लेम नहीं देती।

गैराज के महंगे बिल से कैसे बचें?

अगर आप अपनी कार को बेहतर सुरक्षा देना चाहते हैं, तो सिर्फ स्टैंडर्ड इंश्योरेंस पॉलिसी पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। कुमार कहते हैं, “बड़े रिपेयर बिल से बचने के लिए पॉलिसी में जरूरत के हिसाब से कुछ ऐड-ऑन कवर शामिल करना समझदारी है। इनमें इंजन और गियर बॉक्स प्रोटेक्ट कवर सबसे अहम माना जाता है। यह पानी घुसने या ऑयल लीक होने जैसी वजहों से इंजन को हुए नुकसान का खर्च कवर करने में मदद करता है।”

वहीं, जीरो डेप्रिसिएशन कवर लेने पर क्लेम के समय प्लास्टिक, रबर और फाइबर जैसे पार्ट्स पर डेप्रिसिएशन नहीं काटा जाता, जिससे मरम्मत का ज्यादा खर्च इंश्योरेंस कंपनी वहन करती है।

इसी तरह, अगर कार चोरी हो जाए या पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाए, तो ‘रिटर्न टू इनवॉइस कवर’ के तहत आपको गाड़ी की पूरी ऑन-रोड कीमत मिल सकती है। इसमें रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन जैसे खर्च भी शामिल होते हैं। वहीं, ‘कंज्यूमेबल्स कवर’ मरम्मत के दौरान इस्तेमाल होने वाले इंजन ऑयल, कूलेंट जैसी चीजों का खर्च कवर करने में मदद करता है। 

इसके अलावा, ‘टायर प्रोटेक्ट कवर’ दुर्घटना के अलावा सामान्य इस्तेमाल के दौरान टायर फटने या कटने से होने वाले नुकसान से भी सुरक्षा देता है।

आदित्य कुमार के मुताबिक, कार मालिकों के लिए सबसे जरूरी बात यह समझना है कि जितनी महंगी कार होगी, उसके पार्ट्स और मरम्मत का खर्च भी उतना ही ज्यादा होगा। इसलिए सिर्फ इंश्योरेंस पॉलिसी होना ही पर्याप्त नहीं है। सही सुरक्षा के लिए यह जानना भी जरूरी है कि आपकी कार की उम्र क्या है, वह किस तरह के ईंधन के लिए बनी है और आपकी पॉलिसी में कौन-कौन से ऐड-ऑन शामिल हैं। सही कवर चुनकर ही आप गैराज के अचानक आने वाले भारी-भरकम बिलों से काफी हद तक बच सकते हैं।

First Published : July 6, 2026 | 3:56 PM IST