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प्राइवेट थर्ड पार्टी आर्बिट्रेशन पर सलाह

आशिष आर्यन / नई दिल्ली June 30, 2019

अपने कानूनी खर्च में कमी लाने के लिए केंद्र सरकार ने वैकल्पिक विवाद समाधान के लिए प्राइवेट थर्ड पार्टी आबिट्रेटर्स की सेवाओं के इस्तेमाल पर विचार-विमर्श शुरू कर दिया है। सूत्रों ने बिजनेस स्टैंडर्ड को यह जानकारी दी। सूत्रों ने कहा, प्रायोगिक चरण में इन प्राइवेट आर्बिट्रेटर्स को सरकार अल्पावधि के आधार पर जल्द नियोजित कर सकती है। सरकार की भूमिका सिर्फ और सिर्फ प्राइवेट आर्बिट्रेशन सेंटर की शक्तियों की पहचान तक सीमित हो सकती है। सूत्रों ने कहा, यह कदम भारत की कारोबारी सहजता में रैंकिंग में सुधार के लिए भी उठाया जा रहा है। सूत्रों ने कहा, आर्बिट्रेशन की शक्तियों के साथ अर्धसरकारी या निजी निकाय की खातिर सरकार की नजर सिंगापुर इंटरनैशनल आर्बिट्रेशन सेंटर पर है और उसका इरादा इसे मॉडल के तौर पर अपनाने का है। सिंगापुर सेंटर को दुनिया भर में सबसे अच्छे आर्बिट्रेशन सेंटर के तौर पर जाना जाता है।
 
संपर्क प्रक्रिया के तहत विभिन्न राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों ने नानी पालकीवाला आर्बिट्रेशन सेंटर के प्रतिनिधियों से लाल बहादुर नैशनल एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन में इस महीने मुलाकात की। सूत्रों ने कहा कि इस बैठक में विभिन्न विचारों और संभावित समाधान पर विचार-विमर्श हुआ। इस बैठक में हिस्सा लेने वाले नानी पालकीवाला आर्बिट्रेशन सेंटर के निदेशक और वरिष्ठ वकील एन एल राजा ने कहा, इस उद्यम के जरिए सरकार की कोशिश अदालत में होने वाले कानूनी खर्च में यथासंभव कमी लाने की है। इस सेमिनार में अदालतों के बोझ को कम करने के तरीके तलाशने पर भी बात हुई, जो वैकल्पिक विवाद समाधान के जरिए हो सकता है।
 
उन्होंने कहा, जिन प्रस्तावों पर चर्चा हुर्ई उन पर हितधारकों ने सरकार से शुरुआती बुनियादी ढांचा मसलन आर्बिट्रेशन सेंटर के लिए इमारत उपलब्ध कराने का अनुरोध किया। अन्य सेवाओं मसलन कर्मचारियों आदि की जिम्मेदारी तीसरे पक्षकार पर छोड़ दी गई। इस बैठक में अन्य अनिवार्य संस्थागत आर्बिट्रेशन और मध्यस्थता पर भी चर्चा हुई। राजा ने कहा, समाधान के तौर पर वे इन सभी को अदालत के न्यायाधिकार क्षेत्र के बाहर ले जा सकते हैं और इसे वैकल्पिक विवाद समाधान की तरफ से भेज सकते हैं।
 
हितधारकों ने सुझाव दिया कि खास तौर से पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप वाली परियोजनाओं के मामले में सरकारी अनुबंधों के लिए समाधान की लंबी प्रक्रिया से हटने की खातिर शुरुआती चरण में ही समझौते पर हस्ताक्षर के दौरान आर्बिट्रेशन की संभावना की अनुमति दी जानी चाहिए।  उन्होंने कहा कि यह भी महत्वपूर्ण है कि सरकार को सेंटर के लिए आर्बिट्रेटर्स की नियुक्ति में कम से कम हस्तक्षेप करे ताकि गैर-सरकारी पक्षकारों खास तौर से विदेशी कंपनियों का भरोसा बढ़े। आर्बिट्रेशन की प्रक्रिया में कितना समय लगेगा और कितनी रकम खर्च होगी, इस पर अस्थिरता का मामला भी विदेशी कंपनियों को भारत में समझौते करने से रोकता है। हितधारकों ने सरकारी प्रतिनिधियों से ये बातें कही।
 
राजा ने कहा, हम नतीजे को नियंत्रित करने पर बात नहीं कर रहे। आपको प्रक्रिया पर नियंत्रण रखने में सक्षम होना चाहिए, इसका अनुमान भी होना चाहिए कि इसमें कितना समय लगेगा। हमारी कानूनी व्यवस्था की खामी यह है कि यह काफी जर्जर है। अगर आप संस्थागत आर्बिट्रेशन अपनाते हैं तो आगे की राह काफी स्पष्ट होती है। उन्होंने कहा, निर्माण परियोजनाओं से संबंधित विवाद का सामना करने वाली राज्य सरकारों ने भी ऐसे अनुबंध पर हस्ताक्षर के समय संस्थागत थर्ड पार्टी आर्बिट्रेशन की भूमिका तय करने में दिलचस्पी दिखाई थी। राजा ने कहा, उत्तर प्रदेश सरकार ने ट्रिब्यूनल बनाया, जो ऐसी निर्माण परियोजनाओं से निपटेगा ताकि आर्बिट्रेशन के चलते देरी न हो। लेकिन ऐसे ट्रिब्यूनल पर एक बार फिर सरकार का नियंत्रण होता है। ऐसे में एक से डेढ़ साल की देरी होती है।
Keyword: private third party, govt,,
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