बिजनेस स्टैंडर्ड - विरल आचार्य ने दिया इस्तीफा
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विरल आचार्य ने दिया इस्तीफा

व्यक्तिगत कारणों का दिया हवाला, अध्यापन के लिए लौटेंगे अमेरिका
तमाल बंद्योपाध्याय / मुंबई 06 24, 2019

23 जनवरी, 2017 को संभाला था यह पद

बिजनेस स्टैंडर्ड विरल आचार्य ने दिया इस्तीफाआर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय रिजर्व बैंक के सबसे कम उम्र के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने अपना कार्यकाल समाप्त होने से छह महीने पहले ही इस्तीफा दे दिया है। आचार्य ने 23 जनवरी, 2017 को यह पद संभाला था और उनका कार्यकाल तीन साल के लिए था। फरवरी, 2020 में उन्हें सीवी स्टार प्रोफेसर ऑफ इकनॉमिक्स के रूप में न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी स्टर्न स्कूल ऑफ बिजनेस (एनवाईयू स्टर्न) लौटना था, लेकिन वह इस साल अगस्त में ही वहां जा रहे हैं।

इस घटनाक्रम से परिचित लोगों ने कहा कि आचार्य ने रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की इस महीने हुई बैठक से कुछ हफ्ते पहले ही त्यागपत्र दे दिया था। जुलाई खत्म होने से कुछ दिन पहले ही वह पदमुक्त हो जाएंगे। आचार्य ने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा कि 'अपरिहार्य व्यक्तिगत कारणों' से वह रिजर्व बैंक छोड़ रहे हैं। ज्यादा जोर देने पर उन्होंने कहा, 'स्कूल में मेरे एक शिक्षक ने एक बार मुझसे कहा था, 'जब तुम्हारा काम खुद बोले तो बीच में दखल मत दो।'

रिजर्व बैंक के सबसे वरिष्ठ डिप्टी गवर्नर एन विश्वनाथन का कार्यकाल भी जुलाई के पहले हफ्ते में ही समाप्त हो रहा है। लेकिन उन्हें एक और कार्यकाल मिलने की संभावना है क्योंकि कहा जा रहा है कि गवर्नर शक्तिकांत दास केंद्रीय बैंक के शीर्ष स्तर पर स्थायित्व चाहते हैं। दास को बैंक की कमान संभाले अभी सात महीने भी नहीं हुए हैं और ऐसे में एक साथ दो नए डिप्टी गवर्नर लाना संभवत: सही नहीं होगा। विश्वनाथन का उत्तराधिकारी तलाशने की कवायद पहले ही शुरू हो गई थी, जिसे अब रोका जा रहा है। दिल्ली में मामले की जानकारी रखने वाले एक व्यक्ति ने बताया, 'विश्वनाथन का पद पर बरकरार रहना लगभग निश्चित है - उनका कार्यकाल 1 या 2 साल बढ़ेगा।'

पिछले साल 10 दिसंबर को ऊर्जित पटेल ने रिजर्व बैंक के गवर्नर पद से इस्तीफा दिया था। उसके बाद से ही बैंकिंग उद्योग के गलियारों में यह चर्चा आम थी कि आचार्य अपना कार्यकाल पूरा नहीं करेंगे। उस दिन केंद्रीय बैंक की वेबसाइट पर एक बयान था, जिसमें कहा गया था कि पटेल ने 'व्यक्तिगत कारणों' से इस्तीफा दिया है। उन्होंने सितंबर, 2016 में रघुराम राजन का कार्यकाल समाप्त होने के बाद तीन साल के लिए रिजर्व बैंक (आरबीआई) के 24वें गवर्नर का पद संभाला था।

आरबीआई अधिनियम के तहत केंद्रीय बैंक में अधिकतर चार डिप्टी गवर्नर हो सकते हैं। उनमें से एक वाणिज्यिक बैंकर होता है (इस समय आईडीबीआई बैंक के पूर्व प्रमुख एमके जैन हैं) और बाकी तीन में से एक डिप्टी गवर्नर अर्थशास्त्री ही होना चाहिए। हालांकि यह जरूरी नहीं है कि 'अर्थशास्त्री' डिप्टी गवर्नर केंद्रीय बैंक के बाहर से ही हो, लेकिन मौद्रिक नीति का जिम्मा संभालने वाले इस पद पर पिछले कुछ समय से बाहरी लोग ही आए हैं। आचार्य से पहले पटेल ही इस पद पर थे। पटेल से पहले सुबीर गोकर्ण, राकेश मोहन और वाईवी रेड्डी ने यह जिममेदारी संभाली थी। रेड्डी से पहले मौद्रिक नीति के प्रभारी डिप्टी गवर्नर एसएस तारापोर थे, जो शुरू से ही रिजर्व बैंक में रहे थे।

अभी यह नहीं पता कि आचार्य की जगह कौन लेगा। दो नामों की चर्चा हो रही है। एक नाम वित्त मंत्रालय में प्रधान आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल का है और दूसरा नाम माइकल पात्र का है, जो आरबीआई के कार्यकारी निदेशक तथा मौद्रिक नीति समिति के सदस्य हैं। इससे पहले राकेश मोहन ने डिप्टी गवर्नर का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही पद छोड़ा था। मई, 2009 में जब वह स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी गए तो उनके कार्यकाल का एक साल बाकी रह था। वाईवी रेड्डी के बाद आरबीआई के गवर्नर बनने की होड़ में मोहन को सबसे आगे माना जा रहा था। लेकिन वह पिछड़ गए और अमेरिकी वित्त बैंक लीमन ब्रदर्स के दिवालिया होने से हफ्ता भर पहले ही वित्त सचिव डी सुब्बाराव को केंद्रीय बैंक की कमान थमा दी गई।

आचार्य के इस्तीफे का कारण अलग है। जिस समय सरकार और बैंकिंग नियामक के बीच तनाव बढ़ रहा था तो आरअीबाई की स्वायत्तता की खातिर उन्होंने पटेल के साथ मिलकर बड़ा मोर्चा खोल दिया था। आचार्य ने सरकार की ओर से दखल के 'विनाशकारी' परिणाम होने की चेतावनी दी थी। मुंबई में अक्टूबर के अंतिम हफ्ते में एडी श्रॉफ मेमोरियल लेक्चर देते समय आचार्य ने कहा था, 'जो सरकारें केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करतीं, उन्हें कभी न कभी वित्तीय बाजारों की नाराजगी झेलनी होगी, आर्थिक लपटें उठेंगी और वे उस दिन के लिए पछतावा करेंगी, जिस दिन उन्होंने एक अहम नियामकीय संस्था को कमजोर किया था।'

सरकार तथा केंद्रीय बैंक के बीच रिश्ते तेजी से बिगड़ने का सबूत आचार्य के भाषण के कुछ दिन बाद मिला, जब तत्कालीन आर्थिक मामलों के सचिव एवं आरबीआई के निदेशक मंडल के सदस्य सुभाष चंद्र गर्ग ने ट्वीट किया: 'इस हफ्ते रुपया डॉलर की तुलना में 73 रुपये से नीचे है, ब्रेंट क्रूड 73 डॉलर प्रति बैरल से कम है, बाजार 4 फीसदी से अधिक चढ़े हैं और बॉन्ड प्रतिफल 7.8 फीसदी से कम है। बाजारों की नाराजगी?'

आचार्य ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), बंबई से पढ़ाई की है। वहां एक संबोधन में उन्होंने कमजोर बैंकों पर कथित त्वरित सुधार कार्रवाई (पीसीए) की पुरजोर वकालत की थी। उनकी दलील थी कि पीसीए नहीं होता तो कुछ बैंकों को और भी ज्यादा घाटा होता और पुनर्पूंजीकरण के लिए करदाताओं की और भी रकम लगानी पड़ती। पीसीए और अन्य प्रावधान कमजोर बैंकों को नए कर्ज देने से रोकते हैं। वास्तव में पीसीए उन विषयों में से एक है, जिस पर पटेल की अगुआई वाले केंद्रीय बैंक और सरकार की बनती नहीं थी। इसके अलावा इस बात पर भी विवाद था कि रिजर्व बैंक को कितनी पूंजी और भंडार (रिजर्व) अपने पास रखना चाहिए और कितना सरकार को दे देना चाहिए। नकदी की कमी से जूझ रही गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को पूंजी प्रदान करने के मसले पर भी दोनों में टकराव था। भुगतान और निपटान कानूनों में बदलाव पर एक सरकारी समिति की सिफारिशों पर आरबीआई की 'नाखुशी' भी जगजाहिर थी।

हालत यह हो गई थी कि सरकार ने आरबीआई अधिनियम की धारा 7 के तहत मिले अधिकार आजमाने की धमकी तक दे डाली। उस धारा के तहत सरकार केंद्रीय बैंक को निर्देश दे सकती है कि उसे क्या करना है और क्या नहीं। परिणाम यह हुआ कि बोर्ड की आम बैठकें भी लंबी और कड़वाहट भरी हो गईं।

रिजर्व बैंक और सरकार के बीच टकराव में कुछ नया नहीं है, लेकिन इतना ज्यादा टकराव पहले कभी नहीं हुआ। इसके कारण दिसंबर में पटेल ने रिजर्व बैंक छोड़ दिया और अब आचार्य ने भी इस्तीफा दे दिया। नए गवर्नर शक्तिकांत दास टकराव में यकीन नहीं करते और सलाह-मशविरा कर काम करना उनकी आदत है।

आचार्य आरबीआई में अलग किस्म के व्यक्ति रहे हैं। औपचारिक बैठक नहीं हो तो वह सूट-टाई में दफ्तर नहीं जाते। वह दक्षिण मुंबई की मशहूर नेपियन सी रोड में बने डिप्टी गवर्नर आवास में नहीं रहते, उसके बजाय वह पश्चिमी उपनगर विले पारले में अपने माता-पिता और भाई के परिवार के साथ रहते हैं। वह अक्सर दफ्तर में ही नहा लेते हैं। वह परेल में अशोक टावर्स या बॉम्बे जिमखाना में लॉन टेनिस खेलते हैं और जब अमेरिका में रहने वाला उनका बेटा मुंबई आता है तो पड़ोस के बच्चों के साथ फुटबॉल खेलते हैं।

आचार्य को अक्सर 'गरीबों का राजन' कहा जाता है। एनवाईयू स्टर्न में पढ़ते समय 1998 में उन्होंने भारतीय फिल्मी संगीत का एक बैंड शुरू किया था, जिसे उन्होंने आईआईटी बंबई में होने वाले संगीत कार्यक्रम की तर्ज पर सुरबहार का नाम दिया। डिप्टी गवर्नर के तौर पर उनका काम मौद्रिक नीति तैयार करना था, लेकिन पटेल के जाने तक उन्होंने बैंकिंग संकट पर तथा तंत्र को साफ करने पर ध्यान दिया। जून, 2017 में इस समाचार के लेखक के साथ साक्षात्कार में जब उनसे पूछा गया कि मौका मिले तो क्या वह तीन साल के बाद भी रिजर्व बैंक में रहना चाहेंगे तो उन्होंने कहा: 'फिलहाल मैं तीन साल के काम पर ध्यान दे रहा हूं। मेरी पत्नी से मेरी यही बात हुई है। वह बेटे के साथ अमेरिका में ही रहेंगी। मैं इससे आगे की नहीं सोच रहा हूं।'

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