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उदारीकरण के 35 साल: आईटी से लेकर खुदरा क्षेत्र में कोलकाता की बदली तस्वीर, मगर आ​र्थिक चुनौतियां बनी रहीं

सितंबर 1994 की बात है जब पश्चिम बंगाल की तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने आर्थिक मोर्चे पर अपने कामकाज से जुड़ी छवि बदलने की दिशा में कोशिश की थी

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ईशिता आयान दत्त   
Last Updated- August 20, 2026 | 11:56 PM IST

सितंबर 1994 की बात है जब पश्चिम बंगाल की तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने आर्थिक मोर्चे पर अपने कामकाज से जुड़ी छवि बदलने की दिशा में कोशिश की थी। भारत में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत के तीन वर्ष बीतने के बाद ‘लाइसेंस राज’ ढह रहा था। उस वक्त राज्य के मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने निजी निवेश के लिए द्वार खोलने पर हामी भरने के संकेत दिए। उनकी सरकार ने एक औद्योगिक नीति की घोषणा की जिसमें अर्थव्यवस्था और ‘पारस्परिक हित’ के लिए ‘चुनिंदा क्षेत्रों में नई तकनीक और निवेश’ का स्वागत किया गया।

छह वर्ष गुजरने के बाद अप्रैल 2000 में राज्य की सबसे बड़ी औद्योगिक परियोजना हल्दिया पेट्रोकेमिकल्स की शुरुआत हुई। निवेशकों के साथ कई समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर हुए मगर उनमें से बहुत कम संयंत्रों की स्थापना या नौकरियां देने के स्रोत के रूप में तब्दील हो पाए। उस समय तक पश्चिम बंगाल की छवि उग्र मजदूर संघों और औद्योगिक अशांति वाले राज्य के रूप में बन गई थी। राज्य को लेकर बने इस नकारात्मक माहौल की वजह से कई कंपनियों ने निवेश के लिए दूसरे राज्यों की तलाश शुरू कर दी थी। इस छवि को बदलना बहुत मुश्किल साबित हुआ।

मगर नवंबर 2000 में बुद्धदेव भट्टाचार्य के पद संभालने के बाद राज्य की छवि सुधरने लगी। अपने खास ‘अभी करो’ वाले अंदाज के साथ मुख्यमंत्री ने औद्योगीकरण को अपनी कार्य योजना में प्रमुखता से शामिल कर लिया। शहर में यह बदलाव साफ दिख रहा था। साल्ट लेक और राजारहाट में सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) कंपनियों के परिसर स्थापित हुए जबकि शानदार शॉपिंग मॉल और रेस्तरांओं ने कोलकाता के व्यावसायिक स्वरूप को बदलना शुरू कर दिया।

मध्य और उत्तरी कोलकाता अपनी औपनिवेशिक शिल्पकारी और पुराने व्यावसायिक इलाकों के लिए जाने जाते थे वहीं शहर के उत्तर-पूर्वी किनारों पर सॉल्ट लेक और राजारहाट नए कारोबार और सामाजिक केंद्र के तौर पर उभरे। उनके कांच और इस्पात के टावर पुराने इलाकों से बिल्कुल अलग दिखते थे।

उसके बाद पिछले 15 वर्षों में तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में बंगाल सिलिकन वैली टेक हब जैसी परियोजनाओं से राज्य के आईटी क्षेत्र को काफी बढ़ावा मिला। हालांकि, इनमें से ज्यादातर परियोजनाएं अब भी तैयार हो रही हैं। भले ही नए जमाने के दफ्तरों और जगह-जगह बने फ्लाईओवर ने शहर की शक्ल-सूरत बदल दी मगर कोलकाता की छवि में बदलाव बस कुछ समय के लिए ही दिखा। हालांकि, एक समय यह उम्मीद सच लग रही थी।

तकनीक के मोर्चे पर बदलाव

वर्ष 2004 की बात है। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) की ओर से ‘ट्रांसफॉर्मेशनल लीडरशिप’ (बदलाव लाने वाले नेतृत्व) पर एक संवाद सत्र आयोजित किया गया था। विप्रो कोलकाता में एक सॉफ्टवेयर विकास केंद्र शुरू करने वाली थी और पश्चिम बंगाल में निवेश की संभावनाओं को लेकर माहौल में काफी उत्साह था। इस उत्साह का सबसे मजबूत इजहार विप्रो के चेयरमैन अजीम प्रेमजी के बयान से हुआ। प्रेमजी ने कहा,‘आपके मुख्यमंत्री बहुत अच्छा काम कर रहे हैं और आज वह देश के सबसे अच्छे मुख्यमंत्री हैं।’ इस बयान में उस उम्मीद की झलक मिलती थी जो भट्टाचार्य के कार्यकाल के दौरान परवान चढ़ी थी।

भट्टाचार्य के शुरुआती कार्यकाल में सेवा क्षेत्र आधारित अर्थव्यवस्था बनाने पर जोर दिया गया। हालांकि, राज्य की आईटी नीति उनके मुख्यमंत्री बनने से पहले ही जनवरी 2000 में आ गई थी मगर सरकार ने विदेश में अपनी बात रखने से पहले वर्ष 2003 और 2005 के बीच हैदराबाद, बेंगलूरु, चेन्नई, मुंबई और दिल्ली में लगभग 50 रोड शो आयोजित किए। 

आईटी विभाग के अधिकारी रविवार को भी कंपनियों के ई-मेल का तेजी से जवाब देते थे ताकि यह संदेश जाए कि पश्चिम बंगाल कारोबार को लेकर काफी गंभीर है। इन कोशिशों पर सबका ध्यान गया।

वर्ष 2004 में ‘द इकनॉमिस्ट’ पत्रिका ने वामपंथी-शासित कोलकाता में चल रहे सुधारों के दौर पर एक रिपोर्ट छापी थी। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेस (टीसीएस) और कॉग्निजेंट ने कोलकाता में अपना कारोबार फैलाया, इन्फोसिस ने बाजार परखना शुरू किया और कई आईटी और आईटी समर्थित सेवा कंपनियों ने शहर में अपने दफ्तर खोले।

कोलकाता में टीसीएस का सफर वर्ष 1976 में डलहौजी स्क्वैयर में किराए के एक दफ्तर से शुरू हुआ था। वर्ष 1998 से वर्ष 2008 तक कंपनी के कोलकाता संचालन के प्रमुख रहे अजयेंद्र मुखर्जी कहते हैं, ‘बाद में हम साल्ट लेक के सेक्टर 5 में चले गए और वर्ष 2000 की शुरुआत में अपने कामकाज को एक जगह समेटने का निर्णय लिया। हमने 40 एकड़ जमीन के लिए इस शर्त पर आवेदन किया कि उसे विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) का दर्जा मिले और प्रस्ताव मंजूर हो गया।’

उन्होंने कहा,‘जिस तेजी से हमारा कारोबार बढ़ रहा था और कोलकाता में जिस कदर प्रतिभाएं मौजूद थीं,  साथ ही वहां से काम को जिस गुणवत्ता के साथ पूरा किया जा रहा था उसे देखते हुए हमें लगा कि हमें यहीं अपने कारोबार का विस्तार करना चाहिए।’ टीसीएस कोलकाता में अपनी अलग-अलग जगहों पर 54,000 से अधिक आईटी पेशेवरों को रोजगार देती है। जब कंपनियों ने राज्य के निवेश प्रस्तावों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी तो सरकार ने सॉल्ट लेक से आगे बढ़कर राजारहाट की ओर कदम बढ़ाया जहां पश्चिम बंगाल आवासीय अवसंरचना विकास निगम ने रिहायशी, व्यावसायिक और औद्योगिक विकास के लिए जमीन के एक बड़े टुकड़े का अधिग्रहण किया था। पश्चिम बंगाल के अगले आईटी केंद्र के लिए मंच तैयार हो चुका था। आज सॉल्ट लेक और न्यू टाउन राजारहाट में कुल मिलाकर लगभग 3,00,000 आईटी पेशेवर काम करते हैं।

बदलाव की बयार

अंबुजा नेवतिया समूह के चेयरमैन हर्षवर्द्धन नेवतिया ने कहा, ‘अगर आप शहर के नए हिस्से खासकर न्यू टाउन को देखें तो इसका विकास बहुत शानदार रहा है।’

उन्होंने कहा कि 300 वर्षों से अधिक पुराने इतिहास वाले इस शहर को आप नए सिरे से दोबारा नहीं बना सकते। निवतिया कहते हैं, ‘कोलकाता के कुछ हिस्सों में अवसंरचना से जुड़ी चुनौतियां हैं मगर यह भी शहर की खासियत का ही एक हिस्सा है।’

सॉल्ट लेक-न्यू टाउन राजारहाट गलियारा केवल एक तकनीकी केंद्र नहीं है। पिछले दो दशकों में यह एक आत्मनिर्भर शहरी ढांचे के तौर पर विकसित हुआ है जहां टेक पार्क और कंपनियों के मुख्यालयों के साथ ही रिहायशी इलाके, व्यावसायिक केंद्र, स्कूल, अस्पताल और मनोरंजन के केंद्र भी मौजूद हैं।

यह बदलाव शहर के उत्तर-पूर्वी इलाकों तक ही सीमित नहीं रहा है। कोलकाता के दूसरे हिस्सों में भी एक अलग तरह की चमक आई है।

नेवतिया ने बताया,‘पूरे शहर में खुदरा और मनोरंजन के कई विकल्प दिखाई दे रहे हैं। इसका मुख्य कारण मध्य और उच्च-मध्य वर्ग की खर्च करने लायक आय में बढ़ोतरी है। यह देश और शहर दोनों की आर्थिक तरक्की का स्वाभाविक नतीजा है।’

जैसे-जैसे कोलकाता का विकास हुआ वैसे ही इसके मुख्य केंद्र भी बदलते गए। पार्क स्ट्रीट अब शहर का एकमात्र खानपान का केंद्र नहीं रहा और न्यू मार्केट ने भी खरीदारों के लिए सबसे पसंदीदा जगह होने का अपना रुतबा खो दिया।

पूरे शहर में फैले रेस्तरां, मॉल और मनोरंजन केंद्रों ने कोलकाता में लोगों के रहने, काम करने और आराम करने के तौर-तरीके बदल दिए हैं। साथ ही, मेट्रो तंत्र के विस्तार ने कोलकाता के शहरी विकास की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई और शहर के बाहरी इलाकों तक विकास को रोशनी पहुंचाई है।

वर्ष 1997 में शहर में पहला पैंटालून्स स्टोर खुलने के साथ ही आधुनिक खुदरा कारोबार की शुरुआत हुई। वर्ष 2003 में पहले शॉपिंग मॉल के खुलने से खुदरा क्षेत्र में तेजी आई और जल्द ही प्रीमियम और महंगी जगहों की बाढ़ सी आ गई।

स्पेशियलिटी रेस्टोरेंट्स के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक अंजन चटर्जी उस वक्त को याद कर कहते हैं,‘जब हमने वर्ष 2000 में चीन के साथ कोलकाता में कदम रखा तो शहर में खानपान के क्षेत्र में खास गतिविधि नहीं दिख रही थी। यह बात थोड़ी हैरान करने वाली थी क्योंकि कोलकाता हमेशा से खाने-पीने के शौकीन लोगों की जगह रही है चाहे वह काठी रोल हो, बिरयानी हो या पार्क स्ट्रीट के रेस्तरां हों। मगर इसके अलावा ज्यादा कुछ नहीं था।’

चटर्जी ने कहा कि तब से लेकर अब तक ‘कायापलट’ हो गई है।  उन्होंने कहा कि लोग अब अधिक मुखर हो गए हैं और नए तरह के खानपान के तरीके अपना रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह कहावत कि ‘कलकत्ता के लोग खाने के लिए जीते हैं’ पहले से कहीं अधिक सच साबित हो रही है।’ मगर कोलकाता आज भी कीमत को लेकर बहुत जागरूक है। चटर्जी कहते हैं,‘हम अपनी डिश की कीमत मुंबई या दिल्ली के बराबर नहीं रख सकते। अमीर वर्ग को छोड़कर मुंबई, दिल्ली, बेंगलूरु, चेन्नई, चंडीगढ़ या पुणे जैसे शहरों की तुलना में यहां लोगों की खर्च करने लायक आय बहुत कम है।’

आय का यह अंतर इस बात का अंदाजा देता है कि कोलकाता अपने समृद्ध अतीत से कितना दूर हो गया है। हालांकि, इसका पतन एक लंबी और उतार-चढ़ाव वाली प्रक्रिया थी जो दशकों तक लगातार मिली चुनौतियों के कारण हुई।

हाथ से निकले मौके

राजनीतिक विश्लेषक सव्यसाची बसु राय चौधरी ने कहा कि कोलकाता का सुनहरा दौर 19वीं सदी के आखिर से 20वीं सदी की शुरुआत तक रहा जब ब्रिटिश भारत की राजधानी होने के नाते यह एक फल-फूल रहा व्यावसायिक सेंटर बन गया था। फिर इसके फायदे कम होने लगे। बसु राय चौधरी ने बताया,‘दूसरे विश्व युद्ध ने शहर की स्थिति कमजोर कर दी। बंटवारे ने कच्चा जूट जैसे कच्चे माल की आपूर्ति बाधित कर दी और बड़ी संख्या में शरणार्थी आ गए। फ्रेट इक्वलाइजेशन यानी माल ढुलाई खर्च बराबर करने की नीति ने बंगाल की औद्योगिक बढ़त और कम कर दी। वर्ष 1960 और 1970 के दशक तक श्रमिकों की हलचल और मजदूरों के उग्र विरोध प्रदर्शन ने स्थिति और बिगाड़ दी।’

कोलकाता की खोई हुई शान वापस लाना अभी भी एक अधूरा काम है। फिर भी बहुत कम लोग इस बात से इनकार करते हैं कि ‘सिटी ऑफ जॉय’ भारत के सबसे रहने लायक बड़े शहरों में से एक है।

भारतीय सांख्यिकी संस्थान में अर्थशास्त्र के पूर्व प्राध्यापक अभिरूप सरकार ने कहा कि दूसरे बड़े शहरों की तुलना में कोलकाता रहने के लिए बहुत अच्छा शहर है। सरकार कहते हैं,‘सेक्टर 5 एक आईटी केंद्र बन गया है। यहां कैफे, अस्पताल और सड़कें हैं जो पहले नहीं थीं। बिजली की स्थिति में सुधार हुआ है और मेट्रो ने आवाजाही आसान बना दी है। ये बदलाव साफ तौर पर दिख रहे हैं।’ मगर एक चिंता जगाने वाला रुझान भी नजर आ रहा है। सरकार कहते हैं,‘शहर के कई प्रमुख शिक्षण संस्थानों की चमक फीकी पड़ गई है। नई पीढ़ी कोलकाता छोड़ रही है। यह पर्याप्त मौकों की कमी का संकेत है और आखिरकार इसका असर इस शहर की खुशहाली पर पड़ता है।’

कई लोगों का कहना है कि कोलकाता की ऊंची इमारतें अब ‘वर्टिकल ओल्ड-एज होम’ (बुजुर्गों के लिए बहु-मंजिला इमारतें) बन गई हैं। ये शहर में सही मौकों की कमी की याद दिलाती हैं।

टीसीएस के पूर्व वरिष्ठ कार्याधिकारी मुखर्जी के मुताबिक कोलकाता ने कई अहम मौके गंवा दिए। उन्होंने कहा कि शहर में आईटी क्षेत्र का विकास मुख्य रूप से टीसीएस और दूसरी कंपनियों की वजह से हुई जिन्होंने बाद में इसमें बड़ा योगदान दिया मगर पिछले दो दशकों में हैदराबाद, पुणे और चेन्नई ने कोलकाता को पीछे छोड़ दिया है। मुखर्जी ने कहा,‘कोलकाता के पास इन शहरों से आगे निकलने का हरमौका था।’

पीछे छूटने का यह एहसास केवल तकनीक तक ही सीमित नहीं है। क्रेडाई पश्चिम बंगाल के अध्यक्ष सुशील मोहता ने कहा कि आर्थिक सुधारों की धीमी रफ्तार ने शहर के रियल एस्टेट बाजार को सीमित कर दिया है।

मोहता कहते हैं, ‘रियल एस्टेट कारोबार का विकास सीधे तौर पर लोगों की क्रय क्षमता से जुड़ा है। रेरा पंजीकृत परियोजनाओं में लगभग 25-30 फीसदी खरीदार एनआरआई या कोलकाता से बाहर रहने वाले लोग हैं। बाजार में पैसा तो खूब आ रहा है मगर यह शहर की आर्थिक तेजी नहीं दिखाता है।’

मोहता का कहना है कि राजारहाट और सॉल्ट लेक जैसे व्यावसायिक इलाके बनने के बावजूद कोलकाता अभी भी बेंगलूरु, पुणे और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) से पीछे है।

निवेश की लंबी डगर

पश्चिम बंगाल में निवेश का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है। वर्ष 2000 तक (जब ज्योति बसु ने पद छोड़ा था) कुल निवेश 17,000 करोड़ रुपये था।

जब मई 2011 में भट्टाचार्य ने पद छोड़ा तो पश्चिम बंगाल निवेश के लिए सबसे पसंदीदा जगह बन गया था। उद्योग संवर्द्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग (डीपीआईआईटी) के आंकड़ों के मुताबिक जनवरी और मई 2011 के बीच पश्चिम बंगाल में 3 लाख करोड़ रुपये मूल्य के निवेश प्रस्ताव आए थे जो ओडिशा, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक से भी अधिक थे। केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार (वर्ष 2004 से 2008) की अहम सहयोगी पार्टी के तौर पर वाम मोर्चा के रसूख ने भी निवेश प्रस्ताव हासिल करने में मदद की।

ममता बनर्जी सरकार के पिछले पांच वर्षों यानी 2021 से दिसंबर 2025 तक पश्चिम बंगाल को कुल 60,058 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव मिले। डीपीआईआईटी के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2024 में 39,306 करोड़ रुपये के प्रस्तावित निवेश के साथ पश्चिम बंगाल देश में पांचवें स्थान पर रहा। निवेश के आंकड़े पूरी कहानी नहीं बताते। जैसा हर्षवर्द्धन नेवतिया ने कहा, ‘हर शहर एक इंसान की तरह होता है। उसकी अपनी खूबियां और कमियां होती हैं। कोलकाता एक मिलनसार, मानवीय और रहने लायक शहर के तौर पर विकसित हुआ है।’

कुछ मायनों में यह शहर के अतीत की याद दिलाता है। बसु राय चौधरी ने कहा,‘कोलकाता कभी बहुत विविध संस्कृतियों वाला शहर था जिस पर यूरोप की भी छाप दिखती थी। चौरंगी, पार्क स्ट्रीट और फ्री स्कूल स्ट्रीट औपनिवेशिक गलियारे का हिस्सा थे, और अंग्रेज अधिकारियों के चले जाने के काफी समय बाद भी शहर की वास्तुकला, खानपान और जीवन-शैली पर उनकी छाप बनी रही। साथ ही, ओडिशा और बिहार से आए प्रवासियों ने शहर को एक नई पहचान दे दी।’अपनी आर्थिक बढ़त खोने के बावजूद कोलकाता ने ‘जियो और जीने दो’ की भावना बरकरार रखी है।

First Published : August 20, 2026 | 11:46 PM IST