दिल्ली मेट्रो | फाइल फोटो
मनमोहन सिंह के बजट भाषण में आर्थिक उदारीकरण की घोषणा के पांच महीने बाद दिल्ली के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण अध्याय जुड़ा। संसद ने संविधान (69वां संशोधन) अधिनियम, 1991 पारित किया। इस बदलाव के तहत दिल्ली को विधानसभा के जरिए कुछ अधिक अधिकार और स्वायत्तता मिली। हालांकि, केंद्र सरकार ने कई महत्त्वपूर्ण विषयों को विधानसभा के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा। लंबे समय से दिल्ली में रह रहे लोग 1990 के दशक में तेजी से बदलते शहर को याद करते हैं।
उदारीकरण के बाद दिल्ली में निजी क्षेत्र की कई बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं शुरू हुईं। 2002 में दिल्ली में ‘दिल्ली मेट्रो’ शुरू हुई, जिसे भारत की उन गिनी चुनी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में माना जाता है, जो दुनिया की बेहतरीन मेट्रो सेवाओं को टक्कर देती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, दिल्ली मेट्रो ने दिल्ली के विकास की दिशा को पूरी तरह बदल दिया। साथ ही, इसने दूसरे भारतीय शहरों में भी शहरी परिवहन व्यवस्था विकसित करने का रास्ता दिखाया। इन शहरों ने दिल्ली मेट्रो रेल निगम के मार्गदर्शन में अपनी मेट्रो सेवाएं शुरू कीं।
इसके अलावा, 2002 में बिजली वितरण के निजीकरण जैसे कदम भी उठाए गए, जिन्हें विशेषज्ञ सफल मानते हैं। सैविल्स ग्रोथ हब्स इंडेक्स के अनुसार, 2033 तक दिल्ली दुनिया में सबसे तेजी से विकास करने वाले बड़े शहरों में तीसरे स्थान पर रहेगी। इससे आगे बेंगलूरु और हो ची मिन्ह सिटी हैं।
यह रैंकिंग बताती है कि पिछले तीन दशकों में दिल्ली की अर्थव्यवस्था कितनी मजबूत हुई है। वर्ष 1991-92 में दिल्ली की अर्थव्यवस्था करीब 17,004 करोड़ रुपये की थी। वर्ष 2025-26 में मौजूदा कीमतों पर यह बढ़कर करीब 13.3 लाख करोड़ रुपये हो गई।
एक शहरी नीति शोध संस्थान के अधिकारी के मुताबिक, वर्ष 1990-91 में दिल्ली की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से करीब 2.5 गुना थी और आज भी लगभग इसी स्तर पर है। वर्ष 2025-26 में दिल्ली की प्रति व्यक्ति आय करीब 5.3 लाख रुपये रही, जो देश में सबसे अधिक आय वाले राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में शामिल है।
आवास की समस्या बनी हुई है। लोगों की जरूरत के हिसाब से पर्याप्त मकान नहीं बन सके। जिससे दिल्ली में एक हिस्सा योजनाबद्ध तरीके से बसा, जबकि दूसरा हिस्सा बिना योजना के विकसित हुआ। कई बार इसका दुखद असर भी देखने को मिला है। हाल ही में सत्य निकेतन में इमारत गिरने की घटना में सात लोगों की मौत इसका उदाहरण है।
दिल्ली में बड़ा बदलाव वर्ष 1996 में सर्वोच्च न्यायालय के एमसी मेहता मामले के फैसले के बाद आया। ओलियम गैस रिसाव के बाद राजधानी से प्रदूषण फैलाने वाली 1,300 औद्योगिक इकाइयों को हटाया गया। जहां कई शहरों ने उदारीकरण के दौर में विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा दिया, वहीं दिल्ली सेवा क्षेत्र का बड़ा केंद्र बन गई। इससे शहर में ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी। आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली की अर्थव्यवस्था में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी वर्ष 1991-92 में 14 फीसदी से घटकर वर्ष 2025-26 में 3.7 फीसदी रह गई। वहीं इस दौरान सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़कर करीब 90 फीसदी हो गई।
दिल्ली के विनिर्माण क्षेत्र में गिरावट की वजह सिर्फ प्रदूषण के कारण कारखानों को बाहर करना नहीं था। दिल्ली की पूर्व मुख्य सचिव शैलजा चंद्रा के मुताबिक, 1990 के दशक से पर्यावरण संबंधी नियम, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश, जमीन के इस्तेमाल की नीतियां और तेजी से बढ़ती आबादी वाले राष्ट्रीय राजधानी के बदलते स्वरूप ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई। इनके कारण खतरनाक, प्रदूषण फैलाने वाले और तय नियमों के अनुरूप नहीं चलने वाले उद्योग दिल्ली से बाहर चले गए।
चंद्रा के अनुसार शीला दीक्षित के कार्यकाल में दिल्ली को हरा-भरा बनाने और टिकाऊ शहरी विकास पर खास जोर दिया गया। ‘भागीदारी’ कार्यक्रम के जरिए लोगों और रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों (आरडब्ल्यूए) को शहर के प्रशासन में शामिल करने की कोशिश हुई। उन्हें सिर्फ नगर निगम की सेवाएं लेने वाले लोगों के रूप में नहीं देखा गया।
‘स्वच्छ दिल्ली, हरी दिल्ली’ का नारा भी हर जगह सुनाई देता था। चंद्रा कहती हैं कि करीब 10-12 साल तक यह नारा दिल्ली के लोगों की अपनी पहल बन गया था। दिल्ली सरकार के एक वरिष्ठ अधिकरी के मुताबिक 2013 में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद कम आय वाले लोगों की मांग को देखते हुए स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं को बेहतर बनाने पर ज्यादा जोर दिया गया।
दिल्ली ने तेजी से विकास किया है, लेकिन इसके पीछे एक बड़ी समस्या भी है। शहर आज भी दो हिस्सों में बंटा हुआ है, एक योजनाबद्ध और दूसरा अनधिकृत। विशेषज्ञों का कहना है कि अनधिकृत इलाकों के तेजी से बढ़ने से बड़ी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, दिल्ली समेत कई भारतीय शहरों ने यह सोचने की कोशिश नहीं की कि एक शहर वास्तव में कैसा होना चाहिए।
एक शहरी नीति विशेषज्ञ के अनुसार विकास की दौड़ में शहर को केवल सड़क, नाली, फ्लाईओवर, पानी और यातायात जैसी सुविधाओं का समूह मान लिया गया है। लेकिन शहर सिर्फ बुनियादी ढांचे से नहीं बनता। यह वह जगह है जहां लोग रहते हैं, पढ़ते हैं, काम करते हैं और अपना जीवन बिताते हैं।
भारत की वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा में भी इसी बात पर जोर दिया गया है और शहरों को देखने के नजरिये में बड़े बदलाव की जरूरत बताई गई है। समीक्षा में कहा गया है कि शहरों को केवल आंकड़ों के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी जगह के रूप में देखना चाहिए जहां लोग रहते और काम करते हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) दिल्ली के ट्रांसपोर्टेशन रिसर्च एंड इंजरी प्रिवेंशन सेंटर में प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस जगन शाह कहते हैं, ‘दिल्ली का विकास गैरकानूनी गतिविधियों के रूप में भी सामने आया है।’
दिल्ली में लंबे समय से आवास का विकास मुख्य रूप से सरकार और खासकर दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) से जुड़ा रहा है। डीडीए की स्थापना 1957 में हुई थी। लेकिन दिल्ली की कई मशहूर आवासीय कॉलोनियां एक अलग तरीके से विकसित हुई थीं।
उस समय निजी बिल्डर किसानों से जमीन खरीदकर वहां प्लॉट काटकर कॉलोनियां विकसित करते थे। इनमें डीएलएफ भी शामिल था। उसने पूर्वी दिल्ली में कृष्णा नगर से शुरुआत की और बाद में दिल्ली में 21 कॉलोनियां विकसित कीं। इनमें राजौरी गार्डन, ग्रेटर कैलाश, हौज खास, कैलाश कॉलोनी और पंजाबी बाग शामिल हैं।
हालांकि, डीडीए बनने के बाद यह व्यवस्था धीरे-धीरे खत्म हो गई। रियल एस्टेट क्षेत्र के वैकल्पिक निवेश फंड गोल्डन ग्रोथ फंड (जीजीएफ) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अंकुर जालान के मुताबिक, डीडीए ने जमीन जुटाने और मकानों की आपूर्ति में बड़ी भूमिका निभाई। इसके बाद निजी बिल्डरों के लिए खेती की जमीन खरीदकर वहां परियोजनाएं विकसित करने का रास्ता बंद हो गया। इससे बड़े स्तर पर निजी आवास परियोजनाओं की गुंजाइश खत्म हो गई।
कन्फेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (क्रेडाई) की दिल्ली इकाई के उपाध्यक्ष विनीत कंवर के अनुसार, दिल्ली विकास अधिनियम, 1957 ने भी निजी बिल्डरों के लिए बड़े भूखंड खरीदना मुश्किल बना दिया। उम्मीद थी कि डीडीए शहर में बढ़ती आवास की जरूरत को पूरा करेगा। लेकिन दिल्ली जितनी तेजी से बदल रही थी, उसकी औपचारिक आवास व्यवस्था उतनी तेजी से आगे नहीं बढ़ पा रही थी। आजादी और विभाजन के बाद बड़ी संख्या में लोग दिल्ली आए। इससे पहले से सीमित मकानों पर बहुत दबाव पड़ा।
नतीजा यह हुआ कि लोगों की जरूरत और योजनाबद्ध तरीके से उपलब्ध मकानों के बीच अंतर बढ़ता गया। इसी वजह से अनधिकृत कॉलोनियां बनने लगीं। डीडीए ने भी माना है कि पड़ोसी राज्यों से बड़ी संख्या में लोगों के दिल्ली आने के कारण वह पर्याप्त कम कीमत वाले मकान नहीं बना सका। इससे अनधिकृत कॉलोनियों का विस्तार हुआ।
सुधारों के बाद भी ये समस्याएं बनी रहीं। 1991 की जनगणना के अनुसार, उस समय दिल्ली की आबादी 94 लाख थी, जो 2011 तक बढ़कर करीब 1.7 करोड़ हो गई। अभी चल रही जनगणना के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, 2026 में दिल्ली की आबादी करीब 2.3 करोड़ हो सकती है।
शाह कहते हैं, ‘दिल्ली का विकास कुछ हद तक जमीन की कमी के कारण रुक गया। डीडीए ने रोहिणी, द्वारका और जनकपुरी जैसी जगहों को विकसित करने के बाद जितनी जमीन जुटाई जा सकती थी, उसकी सीमा लगभग पूरी हो गई है। इन इलाकों से आगे दिल्ली की जमीन ऐसी स्थिति में थी, जिसे न पूरी तरह शहरी जमीन कहा जा सकता था और न ही कृषि जमीन।’
शाह पहले आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत आने वाले राष्ट्रीय शहरी कार्य संस्थान (एनआईयूए) के निदेशक रह चुके हैं।
कोटला मुबारकपुर जैसे लाल डोरा इलाकों से शुरू होकर बड़े पैमाने पर जमीन पर अवैध प्लॉटिंग हुई। इससे पहले उत्तर दिल्ली के चंद्रावल में भी ऐसा हुआ था। इन इलाकों को धीरे-धीरे शहर में शामिल कर लिया गया और कृषि भूमि पर निर्माण हो गया। शहर ने इन जमीनों को तो अपने दायरे में ले लिया, लेकिन उन्हें योजनाबद्ध तरीके से विकसित नहीं किया।
चंद्रा कहती हैं, ‘अनधिकृत कॉलोनियां कई दशकों से चली आ रही एक व्यवस्था का नतीजा हैं। कई बार बस्तियां योजनाबद्ध विकास और बुनियादी सुविधाओं से पहले ही बसती चली गईं। जब किसी इलाके में बड़ी आबादी बस जाती है, तो उसे नियमित करना मुश्किल हो जाता है। इसका नतीजा यह है कि पानी, सीवर, जल निकासी और सड़कों जैसी सुविधाएं शहर के विकास के साथ चलने के बजाय उसके पीछे-पीछे चलती रहती हैं।’
दिल्ली में करीब 1,731 अनधिकृत कॉलोनियां हैं, जिनमें लगभग 45 लाख लोग रहते हैं। इनमें से कई लोग केंद्र की प्रधानमंत्री अनधिकृत कॉलोनियां दिल्ली आवास अधिकार योजना के तहत जमीन का कानूनी मालिकाना हक और उस पर कर्ज लेने का अधिकार पाने के पात्र हैं।
पूर्व अधिकारियों का कहना है कि लगातार आने वाली सरकारों ने अनधिकृत कॉलोनियों को सिर्फ बढ़ने ही नहीं दिया, बल्कि उनका विस्तार भी होने दिया। इसकी वजह यह थी कि इन कॉलोनियों में रहने वाले लोगों के वोट से राजनीतिक दलों को फायदा मिलता था।
अब दिल्ली मास्टर प्लान 2047 के तहत करीब 1,511 अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की तैयारी है। जमीन की कमी के कारण निजी बिल्डरों ने दिल्ली से बाहर एनसीआर के नोएडा, गुरुग्राम, गाजियाबाद और फरीदाबाद जैसे शहरों का रुख किया। इन इलाकों में बड़े भूखंड आसानी से उपलब्ध थे और वहां निजी बिल्डरों के लिए कॉलोनी और आवासीय परियोजनाएं विकसित करना आसान था।
शाह के मुताबिक, दिल्ली में अनधिकृत बस्तियां बनने की एक वजह शहर का औद्योगिक इतिहास भी है। 1996 से पहले ओखला, खैबर पास और मायापुरी जैसे इलाकों में उद्योग और मिलें थीं, लेकिन इन जगहों पर मजदूरों के लिए मकान बनाने की कोई योजना नहीं थी। इसलिए मजदूरों ने अनधिकृत कॉलोनियों और शहरी गांवों में रहना शुरू कर दिया। उद्योग वहां से चले जाने के बाद भी ये लोग वहीं बसे रहे।
दिल्ली के सामने एक बड़ी चुनौती प्रदूषण की है। इससे निपटने के लिए अब तक बहुत कम समाधान मिल पाए हैं। ज्यादातर दिनों में यहां की हवा की गुणवत्ता बेहद खराब से लेकर खतरनाक स्तर तक रहती है। शहर का यह पर्यावरण संकट शायद किसी भी दूसरी समस्या से ज्यादा दिल्ली की छवि को नुकसान पहुंचाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, दिल्ली लगातार आठ वर्षों से दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी हुई है।
अध्ययनों के अनुसार, प्रदूषण के कारण दिल्ली में लोगों की औसत उम्र करीब 8.2 साल कम हो रही है। बिना किसी नियंत्रण के बढ़ते निजी वाहनों ने दिल्ली की सड़कों पर दबाव बढ़ा दिया है। वाहन क्षेत्र ने एनसीआर की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में मदद की है, लेकिन इसके साथ लोगों का रोजाना लंबा सफर भी बढ़ा है। कई लोग हर दिन दो से तीन घंटे तक सफर करने को मजबूर हैं। आर्थिक समीक्षा में इसे ‘उत्पादकता पर लगने वाला कर’ बताया है।
चंद्रा कहती हैं, ‘मौजूदा सरकार लोगों की आवाजाही बेहतर करने की कोशिश कर रही है, लेकिन फ्लाईओवर बढ़ाने से निजी कारों पर निर्भरता भी बढ़ सकती है। किसी एक वाहन से कितना भी कम प्रदूषण हो, जब सीमित सड़क पर बहुत ज्यादा वाहन होंगे तो जाम लगेगा, वाहन ज्यादा देर तक खड़े रहेंगे, ईंधन की खपत बढ़ेगी और प्रदूषण भी ज्यादा होगा।’
मेट्रो बेहद सफल रही है, लेकिन आर्थिक और अन्य व्यावहारिक कारणों से आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए अभी भी इसका इस्तेमाल आसान नहीं है। इसके मुकाबले शहर में आखिरी छोर तक और लंबी दूरी की यात्रा की जरूरत पूरी करने में बसों की अहम भूमिका है, लेकिन इन पर उतना ध्यान नहीं दिया गया, जितना जरूरी था।
उपलब्ध ताजा आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022-23 में दिल्ली में 7,100 से ज्यादा बसें थीं। दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) और दिल्ली इंटीग्रेटेड मल्टी-मोडल ट्रांजिट सिस्टम (डीआईएमटीएस) के जरिए इन बसों से रोज करीब 42 लाख यात्री सफर करते थे। दिल्ली से कम आबादी वाले पेइचिंग में 27,000 से ज्यादा बसें हैं।
दिल्ली में प्रदूषण की समस्या उन इलाकों में जारी अवैध गतिविधियों से भी बढ़ रही है, जहां पहले औद्योगिक इकाइयां थीं या जो पूरी तरह अनधिकृत आवासीय इलाके हैं। शहरी नीति विशेषज्ञ कहते हैं, ‘शहर अपनी तेजी से बढ़ती आबादी के हिसाब से योजना बनाने में नाकाम रहा है और इसका खामियाजा लोगों को भुगतना पड़ रहा है। यह स्थिति टिकाऊ नहीं है। कोई भी शहर लंबे समय तक ऐसी स्थिति में नहीं रह सकता, जहां कुछ लोगों के पास निजी संपन्नता हो, जबकि सार्वजनिक सुविधाएं बदहाल हों।’
चंद्रा के मुताबिक, सरकारों ने दिल्ली के लिए कई मास्टर प्लान बनाए हैं। इनमें सबसे नया मास्टर प्लान पिछले महीने ही जारी किया गया है। लेकिन इन योजनाओं में शहर की क्षमता के हिसाब से बुनियादी ढांचे की जरूरतों पर बहुत कम चर्चा की गई है। आदर्श रूप से ऐसी योजनाओं में पानी की पाइपलाइन, सीवर और जल निकासी जैसी बुनियादी सुविधाओं की जरूरत को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
इतिहासकार स्वप्ना लिडल ने अपनी किताब कनॉट प्लेस ऐंड द मेकिंग ऑफ न्यू दिल्ली में बताया है कि नई दिल्ली के निर्माण के समय ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर के बीच शहर की वास्तुकला को लेकर लंबे समय तक चर्चा हुई थी। शहरी नियोजन के विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कई दशकों से दिल्ली की योजना बनाते समय इस तरह की गंभीर सोच नहीं दिखाई दी कि शहर का स्वरूप और यहां रहने का अनुभव कैसा होना चाहिए?
एक विशेषज्ञ के मुताबिक, अगली पीढ़ी के सुधारों की सफलता का जवाब एक आसान सवाल में छिपा है। अगर लोगों में प्रतिभा है और वे मेहनत करने को तैयार हैं, तो क्या दिल्ली उन्हें आगे बढ़ने का बराबर मौका दे सकती है? हालांकि नया मास्टर प्लान इसमें बदलाव की शुरुआत कर सकता है। बिल्डरों का मानना है कि दिल्ली मास्टर प्लान (एमपीडी) 2047 में पुराने इलाकों के पुनर्विकास, शहर के पुनरुद्धार, ट्रांजिट-ओरिएंटेड डेवलपमेंट (टीओडी), लैंड पूलिंग और जमीन के बेहतर इस्तेमाल पर जोर दिया गया है। इससे दिल्ली के आवास बाजार में निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए ज्यादा अवसर पैदा हो सकते हैं।
रियल एस्टेट कंपनी एलिगेंस इन्फ्रा के सह- संस्थापक रवि कांत कहते हैं, ‘अब बड़ी संभावना इस बात में है कि जमीन की कमी पर ही ध्यान देने के बजाय पहले से बसे और कम इस्तेमाल हो रहे इलाकों की क्षमता का बेहतर इस्तेमाल किया जाए।’ इस योजना में 1,511 अनधिकृत कॉलोनियों में बने आवासीय भवनों को ‘जहां हैं, जैसे हैं’ के आधार पर नियमित करने का प्रावधान है। इसके लिए अलग से लेआउट प्लान की जरूरत नहीं होगी। इससे इन कॉलोनियों को नियमित करने की प्रक्रिया आसान हो सकती है।
एमपीडी में परिवहन व्यवस्था में बड़े सुधारों का भी सुझाव दिया गया है। इनमें यातायात जाम के लिए शुल्क लगाना, पार्किंग शुल्क को जरूरत और समय के हिसाब से बदलना और बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (बीआरटीएस) को फिर शुरू करना शामिल है। हालांकि, विशेषज्ञ इन वादों को लेकर अभी भी आशंकित हैं क्योंकि इन्हें लागू करने की कोई तय समयसीमा नहीं बताई गई है।