प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
भारत की वृद्धि गाथा अब नए और बड़े बदलाव के दौर में पहुंच चुकी है। उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना (पीएलआई), नैशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन (एनआईपी), पीएम गति शक्ति, सार्वजनिक परिसंपत्ति से कमाई और डिजिटल इंडिया स्टैक जैसे कदमों ने लगातार तेज आर्थिक विकास की मजबूत नींद रख दी है। अगले चरण में अब भारत को अपने तीन सबसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों मानव विकास, ऊर्जा प्रणाली और डिजिटल बुनियादी ढांचा में बड़े बदलाव के लिए निवेश लगातार बढ़ाना होगा।
इसमें चीन का अनुभव बहुत काम आर सकता है। चीन का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 2007 से 2014 के बीच 3.5 लाख करोड़ डॉलर से बढ़कर 10.5 लाख करोड़ डॉलर हो गया था। इस दौरान वहां सकल पूंजी निर्माण जीडीपी का औसतन 44 से 45 प्रतिशत रहा और 2011 में तो 46.6 प्रतिशत तक पहुंच गया था। चीन की घरेलू बचत दर तो इससे भी ज्यादा थी और 2008 में उसके जीडीपी के रिकॉर्ड 52 प्रतिशत पर पहुंच गई थी। निवेश के मुकाबले बचत ज्यादा होने से चीन दूसरे देशों को पूंजी देने की स्थिति में आ गया।
दिलचस्प है कि इस दौरान चीन के जीडीपी में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का हिस्सा 2.4 प्रतिशत से घटकर 1.2 प्रतिशत रह गया था। पूंजी खाते पर सख्त सरकारी नियंत्रण की वजह से विदेशी पोर्टफोलियो निवेश भी काफी कम था। ध्यान देने वाली बात यह है कि जिस भारी निवेश के दम पर चीन ने तेज रफ्तार वाला 40,000 किलोमीटर लंबा रेल नेटवर्क खड़ा किया, दुनिया का सबसे बड़ा विनिर्माण केंद्र बनाया और नवीकरणीय ऊर्जा उद्योगों पर दबदबा कायम किया, उस निवेश का इंतजाम असल में उसने लगभग पूरी तरह देसी संसाधनों से किया था।
चीन की वित्तीय व्यवस्था ने बैंक जमाओं पर मिलने वाले ब्याज को महंगाई दर से कम रखा। साथ ही उसने अपनी मुद्रा युआन की विनिमय दर भी उसके असली मूल्य से कम रखी। मजदूरी में उत्पादकता के मुकाबले कम रफ्तार से बढ़ोतरी हुई। चूंकि चीन का पूंजी खाता पूरी तरह बंद था, इसलिए वहां के नागरिक अपनी बचत को बाजार कीमतों पर बाहर नहीं लगा सकते थे। वहां की सरकारी बैंकिंग प्रणाली ने जनता की इसी बचत को नियंत्रित ब्याज दरों पर बुनियादी ढांचे और सरकारी कंपनियों में लगा दिया। लेकिन वित्तीय मदद देने का यह तरीका भारत में मुमकिन नहीं है।
हमारा पूंजी खाता बचत को बाजार से तय कीमत पर निकालने देता है। हम बैंकों की जमा दर जबरन कम रखने की कोशिश करेंगे तो लोग बचत को बैंक में रखने के बजाय सोने, रियल एस्टेट या विदेशी संपत्तियों में लगाने लगेंगे। हमारे देश का मध्यवर्गीय बचतकर्ता लंबे अरसे तक नकारात्मक रिटर्न को भी स्वीकार नहीं करेगा।
वृद्धि का जो मॉडल देश में उपभोक्ता खर्च बढ़ने के भरोसे चल रहा हो, वह परिवारों की आमदनी का हिस्सा दबाकर रखने की रणनीति के साथ नहीं रह सकता। फिर भी भारत को मानव, ऊर्जा प्रणाली और डिजिटल बुनियादी ढांचे में जरूरी बदलाव के लिए कुल निवेश को जीडीपी के 32 प्रतिशत से बढ़ाकर 38-40 प्रतिशत करना ही होगा। यह अतिरिक्त निवेश घरेलू बचत या विदेशी पूंजी के भरोसे मुश्किल लग रहा है।
2000 के दशक के आखिरी वर्षों में भारत की सकल घरेलू बचत दर औसतन 36 से 38 प्रतिशत थी, जो पिछले पांच वर्षों में घटकर 30-31 प्रतिशत पर आ गई है। साथ ही परिवारों पर कर्ज का बोझ बढ़कर जीडीपी का 41 प्रतिशत हो गया है, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। भारतीय परिवारों को जैसे-जैसे औपचारिक ऋण उपलब्ध हो रहा है, वैसे-वैसे पहले से ज्यादा बचत मकान, वाहन और दूसरे खर्चों में खप रही है।
विदेशी पूंजी की अपनी सीमाएं हैं। ‘कैंब्रिज एसोसिएट्स’ के इन्फ्रास्ट्रक्चर बेंचमार्क के मुताबिक अमेरिकी फंडों के लिए डॉलर में माध्य शुद्ध आंतरिक रिटर्न (आईआरआर) लगभग 10 प्रतिशत रहता है। भारत पर केंद्रित कोई अच्छा बुनियादी ढांचा फंड बेहतरीन प्रदर्शन करे तो रुपये में 15 से 18 प्रतिशत रिटर्न दे सकता है। मगर रुपये की कीमत में गिरावट और शुल्क को गिन लें तो असली रिटर्न 8-9 प्रतिशत ही बचता है। इसलिए विदेशी पूंजी सार्थक योगदान तो कर सकती है मगर अपने दम पर इतना बडा अंतर नहीं पाट सकती।
फिर हमारी अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से और इतने बड़े पैमाने पर लंबे समय के लिए पूंजी कैसे जुटाए? चुनौती ऐसे पेशेवर, पारदर्शी और स्वैच्छिक जरिये तैयार करने की है, जिनके जरिये लंबी अवधि की घरेलू बचत का इस्तेमाल लंबी अवधि की राष्ट्रीय संपत्तियां तैयार करने में किया जा सके।
चार संस्थागत उपाय निवेश को तेज कर सकते हैं। पहला, मौजूदा पूंजी से परे बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय बुनियादी ढांचा संस्थान बनाया जाए। इसके लिए सार्वजनिक पूंजी, संपत्ति मुद्रीकरण से मिले धन और विनियमित दीर्घकालिक संस्थाओं द्वारा वाणिज्यिक शर्तों पर स्वैच्छिक भागीदारी की मदद ली जा सकती है। इसे सिंगापुर के टेमासेक और जीआईसी की तरह पूरी आजादी मिलनी चाहिए। इसका प्रबंधन निजी क्षेत्र की तरह पेशेवर लोगों के हाथ में हो, इसकी जवाबदेही संसद के प्रति हो और यह निजी पूंजी के साथ मिलकर निवेश करने के कड़े नियमों का पालन करे। इस संस्थान का लक्ष्य 15 से 20 साल की लंबी अवधि के लिए निवेश होना चाहिए।
दूसरा, लंबी अवधि की बचत संभालने वाले नियामक निवेश के मौजूदा नियमों में ढील देने पर विचार कर सकते हैं। वे नई आ रही रकम का 10 से 15 प्रतिशत हिस्सा लंबी अवधि के इक्विटी और इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड में लगाने दे सकते हैं, जो फिलहाल एक अंक में सिमटा है। यह निवेश पूरी तरह से नियमों के दायरे में और पेशेवर तरीके से चलने वाले फंड में होगा, जिनकी स्वतंत्र निवेश समितियां होंगी, पारदर्शी पैमाने होंगे और नियामक द्वारा तय जोखिम सीमाएं होंगी।
तीसरा, विकास वित्त संस्थानों की साझेदारी में एक ‘वित्तीय सहायता की मिश्रित सुविधा’ तैयार की जाए, जिसमें कम ब्याज वाली रियायती पूंजी और व्यावसायिक पूंजी आएगी। इसमें व्यवस्था ऐसी हो कि डॉलर में मिलने वाले रिटर्न का अंतर 200 से 300 आधार अंक कम हो जाए। इससे उन वैश्विक पेंशन और बीमा फंडों का रास्ता साफ हो जाएगा, जो अभी उभरते बाजारों के ढांचे में आंतरिक बाधाकारी दरों के कारण रकम नहीं लगा पा रहे हैं। ज्यादातर रकम देश के भीतर से ही आएगी मगर इससे विदेशी निवेश की रफ्तार भी बढ़ सकेगी।
चौथा, लंबी अवधि के ग्रीन और इन्फ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड के लिए मजबूत और व्यापक बाजार तैयार किया जाए। इन बॉन्ड पर सही कर छूट मिले तो भारतीय परिवार अपनी बचत का एक हिस्सा बैंक में जमा करने के साथ इनमें भी लगाने लगेंगे।
भारत का कायाकल्प संभव है। सवाल सिर्फ रफ्तार और बड़े लक्ष्यों का है। लंबी अवधि के लिए निवेश वाले संस्थान खड़े करके ही हम इस दशक में युवा आबादी, जलवायु और तकनीकी के अवसरों का पूरा फायदा उठा सकेंगे।
(लेखक एवरस्टोन ग्रुप के अध्यक्ष और लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में विजिटिंग प्रोफेसर हैं। वह केंद्रीय मंत्री और लोक सभा सदस्य भी रह चुके हैं। लेख में निजी विचार हैं)